क्या आप कृत्रिम मेधा से तैयार लेख को पहचान सकते हैं? शायद संभव है

Ads

क्या आप कृत्रिम मेधा से तैयार लेख को पहचान सकते हैं? शायद संभव है

  •  
  • Publish Date - August 25, 2026 / 02:59 PM IST,
    Updated On - August 25, 2026 / 02:59 PM IST

(सेलेस्टे रोड्रिग्ज लौरो, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय)

सिडनी, 25 अगस्त (द कन्वरसेशन) कृत्रिम मेधा (एआई) धीरे-धीरे हमारे लिखने के तरीके को बदल रहा है। बात सिर्फ लेखन शैली बदलने की नहीं रही है बल्कि लिखित भाषा की पूरी बनावट ही वास्तव में बदल रही है।

यह केवल कोई नयी प्रौद्योगिकी नहीं है।

यह कोई अस्थायी चलन भी नहीं है।

यह एक ऐसी क्रांति है, जिसे नकारना मुश्किल है।

क्या इस लेख की शुरुआत आपको एआई से लिखी हुई लगी? अगर हां, तो ऐसा क्यों लगा?

सच यह है कि इसे एआई ने नहीं लिखा था। मैंने इसे जानबूझकर उस तरह की कृत्रिम भाषा की नकल करते हुए लिखा था, जैसा किसी ‘लार्ज लेंग्वेज मॉडल’ (एलएलएम) द्वारा शब्दों को व्यवस्थित करके तैयार किए गए पाठ में दिखाई देता है।

इस तरह का लेखन अचानक हर जगह नजर आने लगा है—विज्ञापनों पर क्लिक बटोरने के लिए बनाई गई घटिया वेबसाइटों पर, लोगों का ध्यान खींचने वाली सोशल मीडिया पोस्ट में और यहां तक कि किताबों की पांडुलिपियों में भी। अपराध कथाएं लिखने वाले लेखक जेरी फलाडे को हाल में दो करोड़ डॉलर से अधिक का पुस्तक सौदा गंवाना पड़ा, क्योंकि उनके अपने साहित्यिक एजेंटों ने कहा कि वे यह विश्वसनीय रूप से तय नहीं कर पा रहे थे कि उनकी पांडुलिपि आखिर तैयार कैसे हुई। इसी तरह के संदेह के चलते प्रकाशन संस्था हैशेट ने इस साल मार्च में डरावनी कहानी पर आधारित उपन्यास ‘शाइ गर्ल’ को भी प्रकाशन से हटा लिया।

सृजनात्मक एआई के आने से पहले हम आम तौर पर यह मान सकते थे कि लिखी हुई सामग्री किसी इंसान ने तैयार की है। अब ऐसा मान लेना संभव नहीं है। तो फिर एआई से लिखे गए पाठ को पहचाना कैसे जाए?

इसका कोई एक पक्का संकेत नहीं है। इसके बजाय कुछ रुझान जरूर दिखाई देते हैं—कुछ खास शब्द, वाक्य बनाने के तरीके और लेखन की कुछ ऐसी आदतें, जो एआई से तैयार किए गए पाठ में लगातार नजर आती हैं। एलएलएम को भी बहुत तेजी और कुशलता से लगातार अपडेट किया जाता है। इसलिए जो बात आज कृत्रिम लेखन की पहचान बन रही है, जरूरी नहीं कि कुछ महीनों बाद भी वही संकेत बनी रहे।

‘क्वाइटली’, ‘क्वाइट’ और ‘जेन्युइनली’

‘क्वाइटली’ ऐसा ही एक महत्वपूर्ण संकेत है। दिसंबर 2021 के बाद से गूगल ट्रेंड्स पर इस शब्द को खोजने में लगातार बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, यह आंकड़ा लेखन में इस शब्द के इस्तेमाल के बजाय इसकी खोज को मापता है, इसलिए इसे प्रमाण नहीं, महज एक संकेत माना जा सकता है।

इस दौरान एक बड़ा बदलाव जरूर आया कि लोगों ने एलएलएम की मदद से लिखना शुरू कर दिया। और ऐसा लगता है कि ये मॉडल औसत मानव लेखक की तुलना में ‘क्वाइट’ और ‘क्वाइटली’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं।

‘जेन्युइनली’ शब्द की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, हालांकि इसके पीछे ठोस शोध के बजाय अनुभवजन्य आधार ज्यादा है। मुझे क्लॉड सहित एआई से तैयार सामग्री में यह शब्द जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होता दिखाई देता है। आम बातचीत में लिखने वाला कोई व्यक्ति इसका इतना इस्तेमाल करेगा, इसकी मैं उम्मीद नहीं करता। अभी तक इस खास शब्द को लेकर कोई ठोस वैज्ञानिक अध्ययन भी नहीं हुआ है।

हालांकि, इस प्रवृत्ति का एक दस्तावेजी प्रमाण जरूर मौजूद है। वर्ष 2022 के बाद वैज्ञानिक लेखन में कुछ शब्दों का इस्तेमाल अचानक बहुत बढ़ गया है। ‘डेल्व’, ‘मेटिक्युलस’, ‘अंडरस्कोर’, ‘बोस्ट’ और ‘इंट्रिकेट’ जैसे शब्द पहले की तुलना में पबमेड के शोध-सारांशों में कहीं अधिक दिखाई देने लगे हैं। शोधकर्ताओं ने इसे सीधे चैटजीपीटी जैसी भाषा से जोड़ा है।

इनमें से कोई भी शब्द अकेले इस बात का प्रमाण नहीं है कि लेखन एआई ने किया है। लेकिन जब ‘क्वाइटली’, ‘जेन्युइनली’, ‘डेल्व’ और ‘मेटिक्युलस’ जैसे शब्द उसी तरह के सधे हुए वाक्य-विन्यास के साथ बार-बार दिखाई देने लगते हैं, तो लेखन किसी व्यक्ति की अपनी आवाज के बजाय एलएलएम की साझा ‘भाषाई शैली’ जैसा लगता है।

अपनी अलग ‘भाषाई शैली’

“यह X नहीं, बल्कि Y है” जैसी वाक्य संरचना भी इसी साझा शैली का हिस्सा है। इसके साथ ही एआई को किसी बात को तीन के समूह में रखने की शैली भी पसंद है।

यह किसी मामूली दावे को तुरंत बढ़ाकर बहुत बड़ा निष्कर्ष बना देने की प्रवृत्ति भी दिखाता है। मसलन: “यह लेख भाषा को देखने का एक उपयोगी नजरिया पेश करता है। यह मूल रूप से हमारे लिखने के अर्थ को समझने के तरीके को बदल देता है।”

मानव लेखक इस शैली का इस्तेमाल हमेशा से करते आए हैं, लेकिन सृजनात्मक एआई इस पैटर्न को असाधारण नियमितता के साथ दोहराता है।

फिर आता है एम डैश (—), जिसे एआई की पहचान बताने वाले सबसे पुराने और सबसे ज्यादा मजाक उड़ाए गए संकेतों में माना जाता है। हालांकि, यह संकेत भी ज्यादा भरोसेमंद साबित नहीं हुआ। एक लेखक ने एक ही निर्देश छह अलग-अलग चैटबॉट को दिया तो 573 शब्दों के जवाब में चैटजीपीटी ने आठ एम डैश लगाए, जबकि जेमिनी और मेटा एआई ने एक भी नहीं लगाया।

इससे एक बात फिर स्पष्ट होती है—अलग-अलग संकेत भरोसेमंद नहीं होते, लेकिन जब ऐसे कई संकेत एक साथ दिखाई देने लगें तो उनकी अहमियत बढ़ जाती है।

जरूरत से ज्यादा लंबा लेखन

सृजनात्मक एआई के इस्तेमाल का एक और संकेत पाठ की असामान्य लंबाई हो सकता है।

‘द अटलांटिक’ की एक पत्रकार ने बताया कि जोहान्सिबर्ग में एक वाहन चालक द्वारा उन्हें टक्कर मारने के बाद उसका व्यवहार घबराया हुआ और असंगत था। लेकिन केवल आधे घंटे बाद उसी व्यक्ति की ओर से बेहद सलीके से लिखा गया एक लंबा संदेश आया। बाद में जब पत्रकार ने एक ऐसे मैकेनिक से संपर्क किया, जिसके संदेश पहले छोटे और संक्षिप्त हुआ करते थे तो उसका जवाब भी उसी खास एआई जैसी भाषा में आया।

मानवीय भाषा पर मेहनत और समय का दबाव रहता है। सृजनात्मक एआई इस लागत का बड़ा हिस्सा खत्म कर देता है। वास्तविक स्थिति में कोई व्यक्ति शायद इतना ही संदेश भेजेगा-“माफ करना, देर हो रही है। ट्रैफिक जाम है। 20 मिनट में पहुंचता हूं।”

एआई इसे तुरंत एक ऐसे पूरे लेख में बदल सकता है, जिसमें अचानक यातायात जाम पर विस्तार से बताया जाए, सच्चे मन से खेद जताया जाए और सामने वाले को उसके धैर्य के लिए धन्यवाद दिया जाए।

इस लंबे संस्करण में जरूरी नहीं कि कोई बात गलत हो। समस्या बस यह है कि जब समय की कमी हो, तब वह स्थिति की जरूरत से कहीं ज्यादा भाषाई मेहनत कर रहा होता है।

एआई पहचानने के खतरे

कुछ लोगों का मानना है कि एआई पहचानने वाले सॉफ्टवेयर यह पता लगा सकते हैं कि कोई पाठ एआई ने लिखा है या इंसान ने। लेकिन ये प्रणालियां अभी भी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं हैं और मौजूदा पक्षपात को और बढ़ा सकती हैं।

स्टैनफोर्ड के एक अध्ययन में 2023 में पाया गया कि सात लोकप्रिय एआई पहचान प्रणालियों ने गैर-मातृभाषी अंग्रेजी लेखकों द्वारा लिखे गए औसतन 61 प्रतिशत निबंधों को गलती से एआई-निर्मित बता दिया। इनमें से एक प्रणाली ने तो 97 प्रतिशत निबंधों को एआई से लिखा हुआ बताया।

इसके बाद एआई पहचान तकनीक में सुधार हुआ है और हाल के शोध से तस्वीर कुछ अधिक जटिल सामने आती है। मौजूदा पहचान प्रणालियां कुछ परिस्थितियों में बेहतर काम कर सकती हैं, लेकिन उन्हें चकमा देना अब भी संभव है और वे आज भी ऐसे लेखन को एआई-निर्मित बता सकती हैं, जिसे वास्तव में इंसान ने लिखा हो।

इसी बीच सवाल अब केवल एआई से लिखे पाठ की पहचान तक सीमित नहीं रह गया है। यूरोपीय संघ अब एआई से तैयार की गई सभी सामग्री पर उसके एआई-निर्मित होने का उल्लेख या डिजिटल चिह्न लगाने की मांग कर रहा है।

क्या एलएलएम हमारे लिखने का तरीका बदल रहे हैं?

नेचर ह्यूमन बिहेवियर में प्रकाशित एक नए अध्ययन में 8.8 लाख से अधिक रेडिट पोस्ट, समाचार लेखों और अकादमिक लेखों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि एलएलएम के प्रसार का संबंध लेखन शैली में कम होती विविधता से है।

किसी चीज को किसने लिखा है, यह मायने रखता है। क्योंकि भाषा इस बात पर निर्भर करती है कि उसे कहने वाला कौन है। क्या वह भरोसेमंद है? क्या उसे विषय की जानकारी है? क्या उसमें हास्यबोध है? क्या वह कम उम्र का है? क्या वह वास्तव में इंसान है?

एक और वजह है—भाषाई कौशल और रचनात्मकता। इंसान समस्याओं को हल करने और रचनात्मक ढंग से सोचने में माहिर हैं। इन क्षमताओं की झलक हर व्यक्ति की अपनी भाषा की उन खासियतों में दिखाई देती है—कोई अनपेक्षित शब्द, कोई अनूठी तुलना या वाक्य बनाने का ऐसा अलग अंदाज, जो अलग-अलग लेखकों में कभी-कभार दिखाई दे सकता है, लेकिन कृत्रिम लेखन की तरह बड़े पैमाने पर एक साथ नहीं।

द कन्वरसेशन

खारी नरेश

नरेश