एआई की मदद से रेडियो स्पेक्ट्रम की कमी दूर करने की कोशिश, साझा इस्तेमाल से बढ़ेगी उपलब्धता

एआई की मदद से रेडियो स्पेक्ट्रम की कमी दूर करने की कोशिश, साझा इस्तेमाल से बढ़ेगी उपलब्धता

एआई की मदद से रेडियो स्पेक्ट्रम की कमी दूर करने की कोशिश, साझा इस्तेमाल से बढ़ेगी उपलब्धता
Modified Date: September 9, 2026 / 03:37 pm IST
Published Date: September 9, 2026 3:37 pm IST

( आयलिन येनेर, द ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी )

कोलंबस, नौ सितंबर (द कन्वरसेशन) जब भी कोई व्यक्ति फोन कॉल या वीडियो कॉल या वीडियो स्ट्रीम करता है या वाई-फाई से जुड़ता है तो उसका उपकरण हवा के जरिए अदृश्य संकेत भेजता और प्राप्त करता है। इसी तरह बेबी मॉनिटर, गैराज का दरवाजा खोलने वाले उपकरण, जीपीएस, मौसम पर नजर रखने वाले उपग्रह और विमानों की सुरक्षित आवाजाही में मदद करने वाले रडार भी इसी अदृश्य संसाधन यानी रेडियो स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल करते हैं।

स्मार्टफोन, वीडियो स्ट्रीमिंग और अरबों जुड़े हुए उपकरणों की बढ़ती संख्या के कारण वायरलेस डेटा की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे उपलब्ध रेडियो स्पेक्ट्रम की कमी महसूस होने लगी है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह कमी स्थायी नहीं है। विद्युत इंजीनियरों और शोधकर्ताओं का एक क्षेत्र इस समस्या के समाधान के लिए काम कर रहा है।

इसका एक संभावित समाधान ‘डायनेमिक स्पेक्ट्रम शेयरिंग’ यानी गतिशील स्पेक्ट्रम साझा उपयोग है। इसका मूल विचार यह है कि किसी रेडियो आवृत्ति को हमेशा के लिए एक ही उपयोगकर्ता के लिए आरक्षित रखने के बजाय कई उपयोगकर्ताओं को नियमों के तहत उसी आवृत्ति का इस्तेमाल करने दिया जाए ताकि उनके संकेत आपस में बाधित न हों।

रेडियो स्पेक्ट्रम विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम का वह हिस्सा है, जिसकी आवृत्ति माइक्रोवेव, प्रकाश और एक्स-रे से कम होती है। इसे अलग-अलग आवृत्तियों वाली अदृश्य सड़कों के विशाल नेटवर्क की तरह समझा जा सकता है, जिनके जरिए संकेत हवा में यात्रा करते हैं। टेलीविजन प्रसारण, हवाई यातायात नियंत्रण, मोबाइल फोन और दूर स्थित तारों की निगरानी जैसी सेवाएं इसी अदृश्य नेटवर्क के अलग-अलग हिस्सों का इस्तेमाल करती हैं।

ये संचार मार्ग बहुत कम आवृत्तियों से लेकर रेडियो तरंगों से आगे दिखाई देने वाले प्रकाश की आवृत्तियों तक फैले हुए हैं। अधिक आवृत्ति वाले संकेत कम दूरी तक जाते हैं, लेकिन वे अधिक डेटा ले जाने में सक्षम होते हैं। चूंकि भौतिक विज्ञान के कारण स्पेक्ट्रम की मात्रा सीमित है, इसलिए सरकारें लंबे समय से अलग-अलग उपयोगकर्ताओं को विशेष लाइसेंस देकर इसके इस्तेमाल को नियंत्रित करती रही हैं।

यह व्यवस्था दशकों तक ठीक चली क्योंकि उपलब्ध स्पेक्ट्रम मांग के अनुरूप था। लेकिन कई अध्ययनों में यह सामने आया कि लाइसेंस प्राप्त स्पेक्ट्रम का बड़ा हिस्सा काफी समय तक खाली रहता है। उदाहरण के लिए, सैन्य रडार प्रणाली कुछ स्थानों पर केवल कुछ निश्चित समय में ही सक्रिय होती है।

यही वजह है कि कुछ आवृत्ति मार्गों पर भारी भीड़ है, जबकि आसपास के कुछ हिस्से लगभग खाली पड़े रहते हैं।

—– रेडियो यातायात नियंत्रण की जरूरत —–

गतिशील स्पेक्ट्रम साझा उपयोग को सफल बनाने के लिए ऐसे रेडियो उपकरणों की जरूरत है जो पुराने निश्चित आवृत्ति वाले उपकरणों की तुलना में अधिक लचीले हों।

आज के स्मार्टफोन और वायरलेस उपकरणों में सॉफ्टवेयर आधारित रेडियो तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसमें उपकरणों की काम करने वाली आवृत्तियों को हार्डवेयर में स्थायी रूप से तय करने के बजाय सॉफ्टवेयर के जरिए बदला जा सकता है। इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे कोई वाहन खुद-ब-खुद लेन बदल सकता हो।

इस तकनीक से स्पेक्ट्रम साझा उपयोग का एक नया ढांचा तैयार हो सकता है। इसमें सबसे ऊपर वे उपयोगकर्ता होते हैं जिनके पास किसी आवृत्ति के इस्तेमाल का प्राथमिक अधिकार होता है, जैसे सेना या लाइसेंस प्राप्त प्रसारक। इसके बाद अन्य उपयोगकर्ता तब उस स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल कर सकते हैं जब प्राथमिक उपयोगकर्ता उसका उपयोग नहीं कर रहे हों। प्राथमिक उपयोगकर्ता के लौटने पर अन्य उपयोगकर्ताओं को तुरंत हटना पड़ता है।

घर के वाई-फाई नेटवर्क में इस तरह के साझा उपयोग का उदाहरण पहले से मौजूद है। लैपटॉप, मोबाइल फोन और स्मार्ट टीवी जैसे कई उपकरण एक ही स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल करते हैं। वे संकेत भेजने से पहले जांचते हैं कि चैनल खाली है या नहीं और भीड़ बढ़ने पर अपनी गति को समायोजित कर लेते हैं।

अमेरिका में इसका एक बड़ा उदाहरण ‘सिटिजंस ब्रॉडबैंड रेडियो सर्विस’ (सीबीआरएस) है, जो 3.5 गीगाहर्ट्ज बैंड में काम करती है। इसमें अमेरिकी संघीय संचार आयोग ने तीन स्तरों वाली व्यवस्था बनाई है। सबसे ऊपर अमेरिकी नौसेना के रडार जैसे प्राथमिक उपयोगकर्ता हैं, दूसरे स्तर पर शुल्क देकर प्राथमिकता वाला उपयोग हासिल करने वाले संगठन हैं और तीसरे स्तर पर आम उपयोगकर्ता आते हैं।

एक केंद्रीय कंप्यूटर प्रणाली वास्तविक समय में नौसेना के रडार की गतिविधियों पर नजर रखती है और अन्य उपयोगकर्ताओं के लिए स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल का प्रबंधन करती है। जब किसी क्षेत्र में नौसेना इसका उपयोग नहीं कर रही होती है तो अस्पताल, कारखाने, गोदाम और संस्थान अपने निजी वायरलेस नेटवर्क चला सकते हैं। जरूरत पड़ने पर वे कुछ ही सेकंड में पीछे हट जाते हैं।

— हस्तक्षेप की समस्या दूर करने में एआई की भूमिका —

स्पेक्ट्रम के साझा उपयोग में सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती संकेतों का आपस में टकराना यानी हस्तक्षेप है। जब कई उपकरण अलग-अलग शक्ति और डेटा जरूरतों के साथ एक ही क्षेत्र में काम करते हैं तो संकेतों के बीच टकराव रोकना कठिन हो जाता है।

शोधकर्ता अब इस समस्या के समाधान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का सहारा ले रहे हैं। एआई पुराने नियम आधारित सिस्टम की तुलना में बदलती परिस्थितियों को तेजी से समझ सकता है और यह तय कर सकता है कि कौन सा उपकरण कब और कितनी शक्ति के साथ संकेत भेजे।

हालांकि, इसके साथ नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। इनमें उपग्रहों और जमीन आधारित नेटवर्क के बीच एक ही आवृत्ति के साझा उपयोग की जरूरत भी शामिल है।

रेडियो स्पेक्ट्रम का प्रबंधन भले ही आम लोगों के रोजमर्रा के मुद्दे जैसा न लगे, लेकिन इसका असर मोबाइल पर वीडियो की गति, कारखानों में स्वचालन और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की विश्वसनीयता तक पड़ता है।

भविष्य की वायरलेस तकनीकें, जैसे बिना चालक वाली कारें और दूर से की जाने वाली सर्जरी, पर्याप्त स्पेक्ट्रम उपलब्धता पर निर्भर करेंगी। विशेषज्ञों के अनुसार, गतिशील स्पेक्ट्रम साझा उपयोग ही ऐसा तरीका है, जिससे मौजूदा व्यवस्थाओं को बदले बिना अधिक लोगों और सेवाओं के लिए जगह बनाई जा सकती है।

रेडियो तरंगों की उपलब्धता सीमित है, लेकिन बेहतर प्रबंधन और एआई जैसी तकनीकों की मदद से इनका इस्तेमाल पहले की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावी तरीके से किया जा सकता है।

द कन्वरसेशन मनीषा नरेश

नरेश


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