यूरोप की वनाग्नि के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बिना फटे बम बने नया खतरा

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यूरोप की वनाग्नि के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बिना फटे बम बने नया खतरा

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  • Publish Date - August 8, 2026 / 05:21 PM IST,
    Updated On - August 8, 2026 / 05:21 PM IST

(सारा नजेरी, लंदन विश्वविद्यालय और क्रिस्टीना ग्रीन, एरिजोना विश्वविद्यालय)

लंदन, आठ अगस्त (द कन्वरसेशन) जर्मनी के पूर्वोत्तर हिस्से में स्थित म्यूरित्ज राष्ट्रीय उद्यान में जुलाई में जब वनाग्नि भड़की तो यह कोई सामान्य अग्निशमन अभियान नहीं था। दमकलकर्मियों के साथ बम निरोधक दलों को भी काम करना पड़ा, क्योंकि जंगल की जमीन के नीचे शीत युद्ध के दौर के गोला-बारूद दबे हुए हैं। विस्फोट के खतरे के कारण कुछ हिस्सों तक दल सीधे नहीं पहुंच सके।

इसके कुछ ही समय बाद दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस के गिरोंड क्षेत्र में वनाग्नि ने 42,000 हेक्टेयर इलाके को अपनी चपेट में ले लिया। ले पोर्ज गांव के आसपास खेतों में फैली आग ने द्वितीय विश्व युद्ध के समय जमीन में दबे गोला-बारूद को सामने ला दिया। उस जमीन से कम से कम 75 गोले बरामद किए गए।

आग के दौरान इनमें से कई गोले फट गए और एक गोला मकान की दीवार को भेदता हुआ निकल गया। हालांकि मकान को पहले ही खाली करा दिया गया था। स्थानीय मेयर मार्शल जानीनेत्ती ने कहा कि प्रशासन के पास इस बात का कोई रिकॉर्ड ही नहीं था कि वहां गोला-बारूद दबा हुआ है।

ये घटनाएं एक स्पष्ट समस्या की ओर इशारा करती हैं। यूरोप में 20वीं सदी के युद्धों के समय का भारी मात्रा में दबा हुआ विस्फोटक मौजूद है और महाद्वीप की वनाग्नि इतनी विकराल, इतनी गर्म और इतनी लंबे समय तक धधकती रही है कि वह इन विस्फोटकों तक पहुंच रही है।

जमीन में दबी युद्ध सामग्री हमेशा खतरा बनी रहती है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में उनके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होती, इसलिए उनमें विस्फोट होने की आशंका कम रहती है। वनाग्नि के दौरान गर्मी और दबाव के कारण स्थिति बदल जाती है। विस्फोटक सामग्री एक निश्चित तापमान सीमा से अधिक गर्म होने पर आग पकड़ सकती है या विस्फोट कर सकती है। पुरानी युद्ध सामग्री अक्सर निर्माण के समय की तुलना में अधिक अस्थिर भी हो जाती है, क्योंकि दशकों तक जंग लगने से उसके खोल और फ्यूज अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।

पत्तियों और जमीन की ऊपरी सतह पर कुछ मिनटों की आग आमतौर पर इतनी गर्म नहीं होती कि विस्फोट हो सके। लेकिन कई घंटे या कई दिनों तक धधकती आग जमीन में इतनी गर्मी पहुंचा सकती है कि दबे हुए गोला-बारूद में सीधे विस्फोट हो जाए।

ब्रिटेन के नॉर्थ यॉर्कशायर में 2025 में लैंगडेल मूर में लगी आग के दौरान भी ऐसा कई बार देखने को मिला। छह सप्ताह तक धधकती रही इस आग की लपटें जब गहरी पीट मिट्टी तक पहुंचीं, तो द्वितीय विश्व युद्ध के समय जमीन में दबे 20 से अधिक गोले फट गए।

आग ऐसे गोला-बारूद को भी सामने ले आती है जिस तक गर्मी सामान्य परिस्थितियों में नहीं पहुंच पाती। वनस्पति और ऊपरी मिट्टी के नष्ट हो जाने से नीचे दबे गोले और बारूदी सुरंगें स्पष्ट तौर पर दिखने लगती है। ले पोर्ज में भी यही हुआ। आग बुझाने के बाद दल ने प्रभावित खेतों से 75 ऐसे गोले बरामद किए, जिनके वहां दबे होने की जानकारी स्थानीय प्रशासन को नहीं थी।

इसके पीछे काम करने वाला भौतिक विज्ञान केवल वनाग्नि तक सीमित नहीं है। वर्ष 2018 और 2019 की गर्मियों के दौरान इराक में गोला-बारूद के छह अलग-अलग भंडारों में विस्फोट हुए थे, जब वहां तापमान अक्सर 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता था। ये कोई आग की घटना नहीं थी, लेकिन सिर्फ लंबे समय तक बनी रही अत्यधिक गर्मी के कारण ये विस्फोट हुए। इसी तरह की स्थिति को 2020 में जॉर्डन में एक हथियार भंडार में हुए विस्फोट से भी जोड़ा गया है।

यूरोप में दबा हुआ गोला-बारूद

दोनों विश्व युद्धों और करीब चार दशक लंबे शीत युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए विस्फोटक हथियारों के अवशेष आज भी यूरोप में बड़ी मात्रा में जमीन के नीचे दबे हैं। इनमें से बहुत-सा गोला-बारूद उन इलाकों में मौजूद है, जहां अब अक्सर वनाग्नि की घटनाएं सामने आती हैं। ये मुख्यतः जंगलों, दलदली जमीन और झाड़ियों से ढके वे क्षेत्र हैं, जहां कभी सैन्य गतिविधियां हुआ करती थी और बाद में ऐसे ही छोड़ दिया गया।

पूर्वोत्तर जर्मनी के जंगलों के कई हिस्से शीत युद्ध के दौरान सोवियत और पूर्वी जर्मनी के सैन्य प्रशिक्षण क्षेत्र थे जिनमें अब प्राकृतिक संरक्षित क्षेत्र और यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल भी शामिल हैं।

जर्मनी की युद्ध सामग्री निस्तारण सेवा ‘म्यूनिशन्स बर्गुंग्सडिएंस्ट’ इन इलाकों में एक-एक क्षेत्र को साफ करती है, क्योंकि यहां इतना बड़े पैमाने पर गोला-बारूद दबा है कि पूरे इलाके को एक साथ साफ करना संभव नहीं है।

उत्तरी फ्रांस और बेल्जियम में किसान आज भी हर वसंत के मौसम में खेतों में प्रथम विश्व युद्ध के समय के गोले निकालते हैं। जमीन से निकलने वाले इन पुराने गोलों की इस लगातार होती बरामदगी को वहां ‘लौह फसल’ कहा जाता है। फ्रांस के वर्दां शहर के आसपास का ‘जोन रूज’ इसका सबसे भयावह उदाहरण है। 1918 के युद्धविराम के एक सदी से अधिक समय बाद भी इसके कुछ हिस्सों को आधिकारिक तौर पर रहने योग्य नहीं माना जाता।

दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस में भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भीषण लड़ाई हुई थी और वहां बड़ी मात्रा में युद्ध सामग्री जमा की गई थी। ब्रिटेन में नॉर्थ यॉर्क मूर जैसे दलदली और ऊंचे मैदानी इलाकों का इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान टैंकों के प्रशिक्षण के लिए किया गया था। वहां गहरी पीट मिट्टी में गोला-बारूद दबा रह गया, जो अब तेजी से आग की चपेट में आने लगा है।

इन इलाकों में अब जंगल की आग पहले से कहीं ज्यादा भीषण होती जा रही है। वर्ष 2026 में स्पेन और फ्रांस में लगी विनाशकारी वनाग्नि यूरोप में बढ़ते संकट की झलक भर है। लगातार पड़ रही गर्मी, कम बारिश और मिट्टी में नमी की कमी ने आग के लिए बेहद अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर दीं।

इसका जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख कारण है। जलवायु परिवर्तन के अनुमान बताते हैं कि यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। तापमान बढ़ने और बारिश के ‘पैटर्न’ में बदलाव के साथ भीषण वनाग्नि की आशंका लगातार बढ़ती जाएगी।

हालांकि, यूरोप में बढ़ती वनाग्नि की घटनाओं के लिए केवल जलवायु ही जिम्मेदार नहीं है। उत्तर अमेरिका और यूरोप में आग लगने की घटनाओं और उनकी तीव्रता में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है, जबकि दुनियाभर में वनाग्नि के कुल मामले घट रहे हैं। इसके पीछे आबादी के बदलते स्वरूप के साथ जमीन के इस्तेमाल और उसके प्रबंधन में आए बदलाव भी महत्वपूर्ण हैं।

मसलन, अफ्रीका में घास के मैदानों के छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने और खेती के तौर-तरीकों में बदलाव से वनाग्नि की घटनाओं में कमी आई है। यूरोप में इसके ठीक उलट स्थिति है। महाद्वीप के कुछ हिस्सों में ग्रामीण इलाकों से आबादी के पलायन के कारण वनस्पति तेजी से बढ़ी है और यह वनस्पति भीषण वनाग्नि भड़काने के लिए ईंधन का काम करती है।

द कन्वरसेशन

खारी माधव

माधव