लाहौर, 30 अगस्त (भाषा) पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने कहा है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ “अत्यधिक बल प्रयोग” किया। आयोग ने चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं, जो हिंसा और बड़े पैमाने पर धांधली के आरोपों से घिरी रही।
एचआरसीपी के तथ्य अन्वेषण मिशन की ओर से शनिवार को जारी रिपोर्ट में पीओके में अशांति के लिए क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर लंबे समय से की जा रही शिकायतों, संस्थाओं पर अविश्वास और शासन व्यवस्था की कमियों को जिम्मेदार ठहराया गया है।
इसमें कहा गया है, “अत्यधित बल प्रयोग सहित सरकार के टकराव वाले रवैये ने ध्रुवीकरण को और बढ़ाया है और जनता का भरोसा कम किया है।”
एचआरसीपी ने बताया कि उसके मिशन को हिंसा के स्तर और सुरक्षा बलों के आचरण के बारे में बहुत विरोधाभासी जानकारी मिली।
पीओके की तथाकथित विधानसभा की 45 सीट के लिए 27 जुलाई से 10 अगस्त के बीच तीन चरण में चुनाव कराया गया।
‘जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (जेएएसी) पीओके में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 विवादित सीट को लेकर जून से विरोध-प्रदर्शन कर रही है। जेएएसी का आरोप है कि सत्ता प्रतिष्ठान इन सीट का इस्तेमाल अपनी पसंद के प्रधानमंत्री को बैठाने के लिए करता है, ताकि वह पीओके की तथाकथित सरकार का नेतृत्व कर सके।
सरकार और जेएएसी के बीच बातचीत 30 मई को बेनतीजा रही थी, जिसके बाद पांच जून को संगठन पर आतंकवाद-रोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगा दिया गया था।
जेएएसी के मुताबिक, 27 जुलाई को पहले चरण के चुनाव के दौरान हुई हिंसा में 40 से ज्यादा लोग मारे गए थे। उसका दावा है कि जून के पहले हफ्ते से अब तक लगभग 400 प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। हालांकि, संघीय सरकार ने इस दावे को खारिज कर दिया है।
एचआरसीपी ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ “जानलेवा और अत्यधिक” बल प्रयोग के आरोपों पर विशेष चिंता जताई। उसने कहा कि आयोग को परिवारों से कई शिकायतें मिली हैं, जिनमें आरोप लगाया गया है कि सुरक्षा बलों ने कई प्रदर्शनकारियों को मार डाला या गंभीर रूप से घायल कर दिया।
एचआरसीपी ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ आतंकवाद-रोधी और निवारक हिरासत संबंधी प्रावधानों के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई।
उसने कहा, “बड़े पैमाने पर सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, लंबे समय तक संचार पर रोक, प्रमुख राजनीतिक दलों का बहिष्कार, चरणों में मतदान और सात निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान टालने जैसे कदमों ने चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े किए हैं।”
भाषा पारुल नरेश
नरेश