लड़कियों की शादी के लिए न्यूनतम उम्र तय करना इस्लाम के खिलाफ नहीं, शीर्ष इस्लामी अदालत ने सुनाया फैसला

लड़कियों की शादी के लिए न्यूनतम उम्र तय करना इस्लाम के खिलाफ नहीं: पाकिस्तानी इस्लामी अदालत

लड़कियों की शादी के लिए न्यूनतम उम्र तय करना इस्लाम के खिलाफ नहीं,  शीर्ष इस्लामी अदालत ने सुनाया फैसला
Modified Date: November 29, 2022 / 07:47 pm IST
Published Date: October 29, 2021 2:21 pm IST

इस्लामाबाद, 29 अक्टूबर (भाषा) पाकिस्तान की शीर्ष इस्लामी अदालत ने फैसला सुनाया है कि लड़कियों की शादी के लिए न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित करना इस्लाम की शिक्षाओं के खिलाफ नहीं है। उसने एक याचिका को खारिज कर दिया जिसमें बाल विवाह निरोधक कानून की कुछ धाराओं को चुनौती दी गई थी। इस फैसले से बाल विवाह पर एक विवाद सुलझ सकता है, जो कट्टरपंथी मुसलमानों के इस आग्रह से उपजा है कि इस्लाम ने शादी के लिए कोई उम्र तय करने की अनुमति नहीं दी है।

मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद नूर मिस्कनजई की अध्यक्षता वाली संघीय शरीयत न्यायालय (एफएससी) की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने बृहस्पतिवार को बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम (सीएमआरए) 1929 की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। ‘डॉन’ अखबार की खबर में कहा गया है कि एफएससी ने याचिका को खारिज कर दिया और स्पष्ट रूप से घोषित किया कि इस्लामी राज्य द्वारा लड़कियों की शादी के लिए कोई न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित करना इस्लाम के खिलाफ नहीं है।

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न्यायमूर्ति डॉ सैयद मोहम्मद अनवर द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया, ”याचिका की जांच करने के बाद, हमारा विचार है कि याचिका गलत है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है।” दस पन्नों के फैसले में, एफएससी ने माना कि विवाह के लिए लड़कियों और लड़कों दोनों के लिए अधिनियम द्वारा निर्धारित न्यूनतम आयु सीमा गैर-इस्लामी नहीं है।

सीएमआरए की धारा 4 में बाल विवाह के लिए एक साधारण कारावास की सजा का प्रावधान है, जिसकी अवधि छह महीने तक हो सकती है और 50,000 पाकिस्तानी रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। जबकि धारा 5 और 6 में बच्चे का निकाह करने और बाल विवाह की अनुमति देने या उसे बढ़ावा देने की सजा की व्याख्या की गई है।

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निर्णय बताता है कि शिक्षा का महत्व आत्म-व्याख्यात्मक है और शिक्षा की आवश्यकता सभी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है, चाहे वह किसी भी लिंग का हो। फैसले में कहा गया है, ”इसीलिए इस्लाम में हर मुसलमान के लिए शिक्षा हासिल करना अनिवार्य है, जैसा कि एक हदीस में कहा गया है कि ‘हर मुसलमान के लिए ज्ञान हासिल करना अनिवार्य है’।” फैसले में कहा गया है कि एक स्वस्थ विवाह के लिए न केवल शारीरिक स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिरता आवश्यक कारक हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और बौद्धिक विकास भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें शिक्षा के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि शिक्षा महिला सशक्तिकरण के लिए मौलिक है क्योंकि यह किसी व्यक्ति और फलस्वरूप किसी भी राष्ट्र की भावी पीढ़ी के लिए के विकास की कुंजी है। खबर के मुताबिक जॉर्डन, मलेशिया, मिस्र और ट्यूनीशिया जैसे कई इस्लामी देश ऐसे हैं जहां पुरुष और महिला के लिए शादी की न्यूनतम उम्र तय है।

 


लेखक के बारे में

डॉ.अनिल शुक्ला, 2019 से CG-MP के प्रतिष्ठित न्यूज चैनल IBC24 के डिजिटल ​डिपार्टमेंट में Senior Associate Producer हैं। 2024 में महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय से Journalism and Mass Communication विषय में Ph.D अवॉर्ड हो चुके हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से M.Phil और कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर से M.sc (EM) में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। जहां प्रावीण्य सूची में प्रथम आने के लिए तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा के हाथों गोल्ड मेडल प्राप्त किया। इन्होंने गुरूघासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर से हिंदी साहित्य में एम.ए किया। इनके अलावा PGDJMC और PGDRD एक वर्षीय डिप्लोमा कोर्स भी किया। डॉ.अनिल शुक्ला ने मीडिया एवं जनसंचार से संबंधित दर्जन भर से अधिक कार्यशाला, सेमीनार, मीडिया संगो​ष्ठी में सहभागिता की। इनके तमाम प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में लेख और शोध पत्र प्रकाशित हैं। डॉ.अनिल शुक्ला को रिपोर्टर, एंकर और कंटेट राइटर के बतौर मीडिया के क्षेत्र में काम करने का 15 वर्ष से अधिक का अनुभव है। इस पर मेल आईडी पर संपर्क करें anilshuklamedia@gmail.com