स्पेगेटी की फसल से लेकर फर्जी खबर तक: क्यों अप्रैल फूल के मजाकों के सुनहरे दिन अब खत्म हो गए हैं

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स्पेगेटी की फसल से लेकर फर्जी खबर तक: क्यों अप्रैल फूल के मजाकों के सुनहरे दिन अब खत्म हो गए हैं

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  • Publish Date - April 1, 2026 / 05:44 PM IST,
    Updated On - April 1, 2026 / 05:44 PM IST

(फोबे हार्ट, सहायक प्रोफेसर, फिल्म स्क्रीन एंड एनिमेशन, क्वींसलैंड यूनिसर्विटी ऑफ टेक्नोलॉजी)

ब्रिस्बेन, एक अप्रैल (द कन्वरसेशन) ‘अप्रैल फूल’ दिवस बड़ा दिलचस्प दिन है। सदियों से जारी यह परंपरा लोगों को शरारती मजाक करने की खुली छूट देती है। कुछ मजाक बेहद हल्के-फुल्के और आनंद देने वाले होते हैं, तो कुछ ऐसे भी होते हैं जो दुख और नुकसान पहुंचा सकते हैं, खासकर जब वे बड़े पैमाने पर किए जाएं।

मजाक दो तरह के हो सकते हैं, कुछ ऐसे जो लोगों को खुशी और आनंद देते हैं, और कुछ ऐसे जो किसी को चोट पहुंचा सकते हैं या नुकसान कर सकते हैं। इन दोनों के बीच बहुत बारीक अंतर होता है। अगर यह सीमा पार हो जाए, खासकर मीडिया और राजनीति जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

शरारतों की दिलचस्प शुरुआत :

इतिहासकारों का मानना है कि यह शरारती परंपरा 1500 के दशक में फ्रांस में शुरू हुई, जब जूलियन कैलेंडर (जिसमें नया साल एक अप्रैल से शुरू होता था) की जगह ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू किया गया।

लेकिन हर किसी तक यह बदलाव नहीं पहुंचा। जो लोग एक अप्रैल को ही नया साल मनाते रहे, उन्हें ‘‘अप्रैल फूल’’ कहा जाने लगा और अक्सर उन्हें बेवकूफ बनाने के लिए छोटे-मोटे कामों पर भेजा जाता था।

लोककथाविद नैन्सी कैसल मैकएंटायर के अनुसार, ऐसे मजाकों में किसी को ‘‘बाएं हाथ का पेचकस’’, ‘‘पट्टियों वाला पेंट’’, ‘‘भाप की बाल्टी’’ या ‘‘कबूतर का दूध’’ लाने भेजना शामिल था यानि ऐसी चीज़ें जो होती ही नहीं।

समय के साथ ये मजाक और भी बड़े और चतुर होते गए।

20वीं सदी में जब टीवी और रेडियो आए, तो सरकारों और उद्योगों ने झूठ और धोखे के लिए मीडिया को जवाबदेह बनाना शुरू किया। इसके बावजूद कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ने ‘अप्रैल फूल’ दिवस पर मज़ाक करना जारी रखा।

ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (बीबीसी) अपने शानदार मजाकों के लिए मशहूर था। 1957 में उसके कार्यक्रम ‘पैनोरमा’ में एक रिपोर्ट दिखाई गई, जिसमें दावा किया गया कि स्विट्ज़रलैंड में किसान पेड़ों से ‘स्पेगेटी’ (एक प्रकार का पास्ता) तोड़ रहे हैं।

इसे टीवी पर किया गया पहला अप्रैल फूल मजाक माना जाता है।

जब ‘ओपेरा हाउस’ डूबने लगा :

ऑस्ट्रेलिया में ‘एबीसी’ ने भी एक अप्रैल को जनता को हल्के-फुल्के अंदाज में चौंकाने की परंपरा शुरू की। 1970 में उसके कार्यक्रम ‘दिस डे टूनाइट’ में ‘‘डायल-ओ-फिश’’ नामक एक काल्पनिक मशीन दिखाई गई, जो मछली पकड़ने में मदद करने का दावा करती थी।

फिर एक मज़ाक में यह खबर चलाई गई कि सिडनी ओपेरा हाउस समुद्र में डूब रहा है और इसमें गोताखोरों के दृश्य भी दिखाए गए, जिससे यह काफी असली लगा।

1975 में तो और भी दिलचस्प मज़ाक किया गया ‘‘मैट्रिक टाइम’’ का। इसमें कहा गया कि अब एक मिनट में 100 सेकंड, एक घंटे में 100 मिनट और दिन में 20 घंटे होंगे।

दर्शकों की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही। कुछ हंसे, कुछ नाराज़ हुए और कई लोग भ्रमित भी हो गए।

खास बात यह थी कि ये मज़ाक नुकसानदायक नहीं थे और सच्चाई जल्दी सामने आ जाती थी।

अब हंसी कम, संदेह ज़्यादा :

डिजिटल क्रांति के बाद सब कुछ बदल गया। पहले लोग टीवी और रेडियो पर आने वाली खबरों पर भरोसा करते थे, लेकिन अब हर कोई मोबाइल से खबर बना और प्रसारित कर सकता है।

आज के दौर में फर्जी खबर, डीपफेक और अधूरी जानकारी के बीच अप्रैल फूल का मज़ाक कई बार उल्टा पड़ जाता है।

उदाहरण के लिए, पिछले साल ब्रिटिश टीवी प्रस्तोता जॉर्जिना बर्नेट ने अप्रैल फूल पर गर्भवती होने की झूठी खबर पोस्ट की, जिससे कई लोग आहत हो गए, खासकर वे जो संतान पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

उसी दिन क्वींसलैंड के एक नेता ने यह मज़ाक किया कि ब्रिस्बेन शहर ने पास के इलाके को अपने में मिला लिया है। लोगों ने इसे गंभीरता से लिया और तीखी प्रतिक्रिया दी।

ऐसी दुनिया में मज़ाक/शरारतें जहां सच से ज्यादा भावनाएं और भ्रम असर डालते हैं :

आज के समय में सत्ता, सुरक्षा या पहचान से जुड़े मज़ाक अक्सर लोगों को पसंद नहीं आते, खासकर जब वे किसी प्रभावशाली व्यक्ति या संस्था से आए हों।

अब लोग अधिक जागरूक हैं। वे जानते हैं कि दुनिया में असमानता, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और गलत सूचनाएं मौजूद हैं। इसलिए अब लोग झूठ या असंवेदनशीलता को जल्दी पहचानते हैं और उसका विरोध भी उतनी ही तेजी से करते हैं।

द कन्वरसेशन गोला नरेश

नरेश