होर्मुज और बाब-अल-मंदेब पर तीन औपनिवेशिक शक्तियों ने कायम किया प्रभुत्व और फिर गंवाया

होर्मुज और बाब-अल-मंदेब पर तीन औपनिवेशिक शक्तियों ने कायम किया प्रभुत्व और फिर गंवाया

होर्मुज और बाब-अल-मंदेब पर तीन औपनिवेशिक शक्तियों ने कायम किया प्रभुत्व और फिर गंवाया
Modified Date: September 25, 2026 / 05:44 pm IST
Published Date: September 25, 2026 5:44 pm IST

इब्राहिम अल मराशी, कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी

सैन मार्कोस (अमेरिका), 25 सितंबर (द कन्वरसेशन) होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य पिछले कुछ महीनों में भू-राजनीतिक खींचतान के केंद्र में रहे हैं। इन संकरे समुद्री मार्गों पर नियंत्रण से अरब सागर और लाल सागर से हिंद महासागर तक समुद्री यातायात प्रभावित होता है और वैश्विक व्यापार के एक महत्वपूर्ण हिस्से पर असर पड़ता है।

हालांकि, इन जलडमरूमध्य को लेकर संघर्ष नया नहीं है। आधुनिक समुद्री व्यापार के विस्तार के साथ ही क्षेत्र से बाहर की शक्तियों ने समुद्र के रास्ते पश्चिम एशिया में अपना प्रभाव या प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की है।

—– चीन ने कूटनीति और नौसैनिक शक्ति से बनाई मौजूदगी —–

मिंग चीन इसका शुरुआती उदाहरण है। 1405 में चीनी मुस्लिम एडमिरल और राजनयिक झेंग हे ने हिंद महासागर में अपने सात अभियानों में से पहला अभियान शुरू किया। 300 से अधिक जहाजों के बेड़े के साथ वह करीब 1414 में होर्मुज पहुंचे और इसके बाद यमन के अदन तथा बाब-अल-मंदेब के रास्ते लाल सागर तक गए।

चीन ने इन क्षेत्रों में उपनिवेश स्थापित करने के बजाय नौसैनिक शक्ति, कूटनीति और व्यापार के जरिये अपनी मौजूदगी मजबूत की। झेंग हे की यात्राओं के बाद मिंग राजवंश की प्राथमिकताएं बदल गईं और 1430 के दशक में ये अभियान बंद हो गए।

आज चीन झेंग हे की यात्राओं को पश्चिम एशिया के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों के संदर्भ में पेश करता है और पाकिस्तान के ग्वादर जैसे बंदरगाहों में अपने आधुनिक निवेश को इस पुराने रिश्ते की निरंतरता बताता है।

—– पुर्तगाल का नौसैनिक प्रभुत्व —–

यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के 16वीं सदी में आगमन के साथ इन समुद्री मार्गों पर नियंत्रण के प्रयास अधिक आक्रामक हो गए। पुर्तगालियों ने भारी तोपों से लैस समुद्री जहाजों के जरिये अपनी नौसैनिक शक्ति बढ़ाई।

ए डी अल्बुकर्क ने 1513 में लाल सागर के प्रवेश द्वार पर नियंत्रण के लिए अदन पर हमला किया, लेकिन वह शहर पर कब्जा नहीं कर सका। हालांकि, 1515 में उसने होर्मुज पर कब्जा कर लिया और व्यापारियों के लिए ‘कार्ताज’ नामक अनुमति व्यवस्था लागू की, जिसके तहत फारस की खाड़ी और हिंद महासागर से होकर गुजरने के लिए शुल्क देना पड़ता था।

ईरान के सफवीद शासन और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाजों ने 1622 में मिलकर पुर्तगालियों को होर्मुज से बाहर कर दिया। इसके बाद क्षेत्र में ओटोमन, सफवीद, ओमानी, डच और ब्रिटिश शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी।

—– ब्रिटेन और डचों का बढ़ता प्रभाव —–

डच ईस्ट इंडिया कंपनी 1614 में इस क्षेत्र में पहुंची और यमन के मोखा बंदरगाह पर अपनी स्थिति मजबूत की। पुर्तगालियों के हटने के बाद डचों ने बांदर अब्बास में ब्रिटिश व्यापारियों से प्रतिस्पर्धा की। उन्होंने यमन से अरबिका कॉफी के पौधे इंडोनेशिया के जावा द्वीप पहुंचाकर बड़े पैमाने पर उनकी खेती शुरू की और कॉफी व्यापार में अपना प्रभाव बढ़ाया।

लेकिन 1839 में ब्रिटेन द्वारा अदन पर कब्जा किए जाने के बाद शक्ति संतुलन उसके पक्ष में हो गया। ब्रिटेन ने दक्षिण यमन के स्थानीय शासकों और कबीलों के साथ समझौते किए और बाब-अल-मंदेब पर व्यावहारिक नियंत्रण स्थापित किया।

अदन नौसैनिक जहाजों के लिए कोयला भरने का केंद्र और संचार केंद्र बन गया तथा टेलीग्राफ केबल के जरिये भारत से जुड़ गया। 1869 में स्वेज नहर खुलने के बाद बाब-अल-मंदेब और लाल सागर ब्रिटेन के लिए और महत्वपूर्ण हो गए, क्योंकि यही मार्ग भारत तक पहुंचने का सबसे छोटा समुद्री रास्ता था।

—– अमेरिका के लिए इतिहास का सबक —–

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद खाड़ी क्षेत्र में ब्रिटेन की जगह अमेरिका ने ले ली। अमेरिकी सैन्य अड्डों, विमानवाहक पोत समूहों और हथियारों की बिक्री का संबंध खाड़ी के तेल से जुड़ा था। 1980 में राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने कहा था कि खाड़ी पर नियंत्रण स्थापित करने की किसी भी सोवियत कोशिश का सैन्य बल से विरोध किया जाएगा।

करीब 45 साल बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने प्रभावी रूप से कार्टर सिद्धांत को कमजोर कर दिया है। होर्मुज में अमेरिकी नौसैनिक जहाज नौवहन की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मौजूद हैं, लेकिन फरवरी 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच हुआ युद्ध ही समुद्री परिवहन के लिए मौजूदा जोखिम बढ़ने का एक कारण बना।

इतिहास से यह भी पता चलता है कि क्षेत्र से बाहर की किसी शक्ति का समुद्री प्रभुत्व स्थायी नहीं होता। चीन ने अपने बेड़े वापस ले लिए, पुर्तगाल ने होर्मुज गंवा दिया, डचों ने अपना ध्यान जावा पर केंद्रित किया और ब्रिटेन को अंततः अदन छोड़ना पड़ा।

तकनीकी बदलाव, अत्यधिक विस्तार और स्थानीय गठबंधनों में परिवर्तन के कारण समय के साथ शक्ति संतुलन बदलता रहा है।

आज ईरान और हूती बड़े नौसैनिक बेड़े के बजाय मिसाइलों, बारूदी सुरंगों और ड्रोन के जरिये समुद्री यातायात और बीमा लागत को प्रभावित कर सकते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि किसी जलडमरूमध्य पर नौसैनिक नियंत्रण हासिल करना उसके आसपास की राजनीतिक परिस्थितियों और स्थानीय शक्तियों पर पूर्ण नियंत्रण की गारंटी नहीं देता।

द कन्वरसेशन

मनीषा पवनेश

पवनेश


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