संवाद तंत्र कैसे काम करता है और सुनने में कठिनाई वाले लोग अनुमान पर क्यों ज्यादा निर्भर होते हैं
संवाद तंत्र कैसे काम करता है और सुनने में कठिनाई वाले लोग अनुमान पर क्यों ज्यादा निर्भर होते हैं
(रूथ कॉर्प्स द्वारा, शेफील्ड विश्वविद्यालय)
शेफील्ड, 15 मार्च (द कन्वरसेशन) ऑस्कर वाइल्ड ने लिखा था ‘‘अंततः विवाह हो या मित्रता, सभी प्रकार के संबंधों का आधार संवाद ही होता है’’।
हम अक्सर बातचीत को सहज मानते हैं। लेकिन इस सहजता के पीछे समन्वय का एक असाधारण कौशल छिपा होता है – सुनने और बोलने का एक बारीक तालमेल।
मन में एक शब्द याद करके उसे बोलने में कम से कम 600 मिलीसेकंड लगते हैं। फिर भी, चाहे वे किसी भी भाषा में बात कर रहे हों, एक व्यक्ति के बोलने की बारी समाप्त होने और दूसरे के बोलने की बारी शुरू होने के बीच का सामान्य अंतराल लगभग 200 मिलीसेकंड होता है।
इसका मतलब यह है कि हम अक्सर इतनी जल्दी बोलना शुरू कर देते हैं कि दूसरे व्यक्ति के बोलने के बाद अपनी प्रतिक्रिया की योजना बनाने का समय ही नहीं मिल पाता। पता नहीं कैसे, हमारा दिमाग हमेशा बातचीत से आगे रहता है।
हम इसे कैसे संभालते हैं? वाक्य के समाप्त होने का इंतजार करने के बजाय, हम लगातार अनुमान लगाते रहते हैं कि वह वाक्य कैसे समाप्त होगा।
ब्रिटेन और जर्मनी में सहकर्मियों के साथ किए गए एक अध्ययन में हमने पाया कि सुनने की क्षमता में कुछ कमी वाले लोग बातचीत को सुचारू रूप से चलाने के लिए अक्सर इन पूर्वानुमानित संकेतों पर अधिक निर्भर रहते हैं। लेकिन समय के साथ, इसके लिए आवश्यक प्रयास के अन्य नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं।
स्मार्टफोन आमतौर पर शब्दों का अनुमान लगाने के लिए केवल एक शब्द के बाद दूसरे शब्द आने की साधारण संभावना पर निर्भर करते हैं, जबकि इंसान का अनुमान इससे कहीं अधिक गहरा और व्यापक होता है।
इसका अर्थ है कि बातचीत को समझते समय हम केवल शब्दों की संभावनाओं पर ही निर्भर नहीं रहते, बल्कि वक्ता के बारे में अपनी जानकारी—जैसे वह कौन है, उसकी पसंद-नापसंद क्या है और वह आमतौर पर किस तरह बोलता है—को भी ध्यान में रखते हैं। साथ ही हम आसपास के माहौल और बातचीत के व्यापक विषय को जोड़कर पूरी बात का सही अर्थ समझने की कोशिश करते हैं।
भविष्यवाणी हमें यह निर्धारित करने में भी मदद करती है कि हम कब बोल सकते हैं। वाक्य के आगे बढ़ने के साथ-साथ, हम उसकी संरचना, लय, धुन और संभावित अंतिम शब्दों का अनुमान लगाते हैं।
बातचीत का सूक्ष्म समन्वय इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे मस्तिष्क में पूर्वानुमान, प्रतिक्रिया नियोजन और समय निर्धारण के लिए पर्याप्त संज्ञानात्मक संसाधन हों। लेकिन जब सुनने में कठिनाई बढ़ जाती है, तो मस्तिष्क को ध्वनियों और शब्दों को पहचानने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है, जिससे उसके संसाधन सीमित हो जाते हैं।
पचपन वर्ष से अधिक आयु के लगभग आधे लोगों के लिए, सुनने की क्षमता में कमी रोजमर्रा की बातचीत को मस्तिष्क के लिए अधिक कठिन बना देती है। उच्च स्तरीय वार्तालाप प्रक्रियाओं के लिए कम संसाधन उपलब्ध होने के कारण, लगभग 200 मिलीसेकंड की बारी-बारी से बोलने की लय को बनाए रखना कठिन हो जाता है। इससे बातचीत में लंबे और अधिक व्यवधान उत्पन्न हो सकते हैं।
हमारे अध्ययन ने 50 से 80 वर्ष की आयु के लोगों का परीक्षण करके इन संभावनाओं को स्पष्ट किया, जिनमें से कुछ को हल्की से मध्यम स्तर की श्रवण हानि थी। हमने उन्हें सुनने की ऐसी स्थितियों में परखा, जिनमें आरामदायक, स्पष्ट भाषण से लेकर ऐसी स्थितियां शामिल थीं, जहां भाषण मुश्किल से ही समझ में आ रहा था।
(द कन्वरसेशन) देवेंद्र दिलीप
दिलीप

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