निराशा से कैसे उबरें: इस जटिल भाव पर विशेषज्ञ की राय

निराशा से कैसे उबरें: इस जटिल भाव पर विशेषज्ञ की राय

निराशा से कैसे उबरें: इस जटिल भाव पर विशेषज्ञ की राय
Modified Date: May 31, 2026 / 05:14 pm IST
Published Date: May 31, 2026 5:14 pm IST

(एनेट क्लैंसी, यूनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन द्वारा)

डबलिन, 31 मई (द कन्वरसेशन) जब निराशा होती है, तो क्या आपकी स्वाभाविक प्रवृत्ति उसे भुलाकर आगे बढ़ने की होती है? मेरे शोध और कई कार्यस्थलों के अनुभव से पता चलता है कि यह प्रतिक्रिया बिल्कुल गलत भी हो सकती है।

कार्यस्थल परामर्शदाता के रूप में काम करते हुए, निराशा को समझने में मेरी रुचि 15 वर्ष से भी अधिक समय पहले शुरू हुई थी। मुझे इस बात से हैरानी होती थी कि लोग अपनी निराशा को व्यक्तिगत और परेशान करने वाले अनुभवों के रूप में बताने के लिए कैसे उनका वर्णन करते थे। इस बारे में बहुत कम शोध उपलब्ध था जिससे मुझे सार्थक प्रतिक्रिया देने में मदद मिल पाती। इसी से प्रेरित होकर मैंने इस विषय पर पीएचडी करने का निर्णय लिया।

निराशा अक्सर अपेक्षा और वास्तविकता के बीच के अंतर को दर्शाती है। इसमें उस भविष्य के लिए शोक करना भी शामिल हो सकता है जिसे हमने अपने मन में पहले ही मानना शुरू कर दिया था।

सहकर्मियों के साथ मेरे शोध से एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति सामने आई। कार्यस्थल पर निराशा अक्सर अवास्तविक लक्ष्यों के कारण एक व्यवस्थित स्तर पर उत्पन्न होती है – लेकिन उसका बोझ व्यक्तियों पर व्यक्तिगत असफलता की भावना के रूप में आ पड़ता है।

जीवन के कई क्षेत्रों में, इसे आमतौर पर एक अवांछित और अनुपयोगी भावना मानकर खारिज कर दिया जाता है। लेकिन हमारा शोध एक अलग ही कहानी बताता है। निराशा रचनात्मकता के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरणा हो सकती है। यह हमारी इच्छाओं को सामने लाती है, हमारे लिए क्या मायने रखता है उसे स्पष्ट करती है और हमें उन चीजों की ओर ले जाती है जिन्हें हम अभी स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

चाहे पेशेवर जीवन हो या निजी जीवन, निराशा एक ऐसा संकेत है जिसे समझना चाहिए। जब अगली बार आप इसका सामना करें, तो इसके लिए कुछ सुझाव यहां दिए गए हैं:

1. जल्दबाजी न करें

जब हम किसी महत्वपूर्ण निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं – जैसे नौकरी का प्रस्ताव, परीक्षा का परिणाम या रिश्ते में कोई निर्णायक मोड़- तो जवाब आने से बहुत पहले ही हमारी भावनात्मक प्रतिक्रिया तैयार हो जाती है। एक ही परिणाम हमारी अपेक्षाओं के आधार पर पूरी तरह से अलग महसूस हो सकता है। अपेक्षा और वास्तविकता के बीच जितना अधिक अंतर होगा, निराशा उतनी ही अधिक होगी।

कार्यस्थल पर, नौकरी न मिलने या पदोन्नति से वंचित रहने पर होने वाली निराशा उस कामकाजी भविष्य की चिंता को लेकर उत्पन्न हो सकती है जिसकी हमने कल्पना करना शुरू कर दिया था।

2. सफलता के भ्रम से सावधान रहें

सफलता भविष्य में असफलता की आशंका को धीरे-धीरे बढ़ा सकती है। हमारे एक उत्तरदाता ने इस स्थिति को बहुत अच्छे ढंग से समझाया। उन्होंने पाया कि यदि आप एक वर्ष में अपने कार्य लक्ष्य से 10 प्रतिशत से अधिक काम करते हैं, तो आपका प्रबंधक अगले वर्ष आपको कम काम देकर पुरस्कृत करने के बारे में नहीं सोचेगा। बल्कि, लक्ष्य को फिर से और अधिक बढ़ा दिया जाता है, जिससे असफल होने की आशंका बढ़ जाती है और आपकी निराशा और भी बढ़ जाती है।

3. खुद को (या किसी और को) दोष देने की कोशिश न करें।

लोग अक्सर निराशा को निष्पक्ष रूप से नहीं देखते। बल्कि वे इसे दो तरीकों में से किसी एक के माध्यम से समझने की प्रवृत्ति रखते हैं।

पहला दृष्टिकोण आंतरिक है: ‘‘समस्या मुझमें है।’’ यह मान लिया जाता है कि उन्होंने पर्याप्त प्रयास नहीं किया। ऐसी स्थिति में निराशा को इस संकेत के रूप में लिया जाता है कि व्यक्ति में कोई कमी या दोष है।

दूसरा दृष्टिकोण बाहरी है। इसमें गलती उन लोगों की है जिन्होंने उस व्यक्ति के महत्व को नहीं पहचाना और अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। स्वाभाविक प्रवृत्ति उन्हें दोष देने और उन पर गुस्सा करने की होती है। खुद को या दूसरों को दोष देना किसी ऐसी चीज से बचने का एक तरीका हो सकता है जिसका सामना करना अधिक कठिन होता है।

4. आइकिया प्रभाव

आइकिया प्रभाव एक मनोवैज्ञानिक सिद्धांत है जिसमें लोग उन चीजों को अधिक महत्व देते हैं, जिन्हें उन्होंने स्वयं बनाने में मेहनत की हो।

कार्यस्थलों पर, कई लोगों को उच्च लक्ष्य रखने और निरंतर सुधार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। संगठन अक्सर प्रगति, उपलब्धि और संतुष्टि के आदर्शों को बढ़ावा देते हैं।

काम में असफलता अक्सर सहकर्मियों और प्रबंधकों के सामने आती है, इसलिए इसका परिणाम गंभीर प्रतीत होता है। यह बात इस बात से जुड़ सकती है कि दूसरे हमें कैसे देखते हैं और हम खुद को कैसे देखते हैं।

5. यथार्थवादी बनें, आदर्शवादी नहीं।

निराशा को पूरी तरह से समाप्त करने की कोशिश करने के बजाय उसे सहन करने की ओर बढ़ने से यह कम अस्थिर कर सकती है। एक प्रबंधक के रूप में, इसका अर्थ यह हो सकता है कि परियोजना की शुरुआत में ही, आदर्श परिणाम के बजाय यथार्थवादी परिणाम कैसा होना चाहिए, इस पर ध्यान देने की आदत विकसित की जाए।

रिश्तों में भी इसी तरह की प्रवृत्ति देखने को मिल सकती है, जहां हर समय सब कुछ सही होने की उम्मीद रखने से एक अच्छा रिश्ता भी अधूरा सा लगने लगता है।

6. निराशा को स्वीकार करें, इसे नजरअंदाज न करें।

निराशा असहज होती है क्योंकि यह हमें सीमाओं से रूबरू कराती है। स्वाभाविक प्रवृत्ति यही होती है कि हम इससे जल्दी से आगे बढ़ने की कोशिश करें।

लेकिन एक अधिक रचनात्मक दृष्टिकोण यह है कि हम इस बात पर विचार करें कि अपेक्षाएं कहां से आती हैं, ये कैसे बनती हैं और क्या इन्हें इस तरह से संतुलित किया जा सकता है जिससे हमें फायदा हो।

(द कन्वरसेशन)

देवेंद्र नरेश

नरेश


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