जीवन के बाद जीवन: मृत जीव कैसे बनते हैं नए जीवन की नींव, वैज्ञानिक अध्ययन में चौंकाने वाले खुलासे
जीवन के बाद जीवन: मृत जीव कैसे बनते हैं नए जीवन की नींव, वैज्ञानिक अध्ययन में चौंकाने वाले खुलासे
(काई कोपेकी – कोलोराडो बोल्डर यूनिवर्सिटी, जॉन कोमिनोस्की – फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी)
फ्लोरिडा, 11 जून (द कन्वरसेशन) प्रकृति में मृत्यु को देखकर आमतौर पर लोगों की प्रतिक्रिया नकारात्मक होती है। जंगल की आग के बाद पेड़ों पर बने काले निशान हों या समुद्र में फीके पड़ चुके कोरल रीफ़, ये दृश्य अक्सर विनाश और निराशा का भाव पैदा करते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकृति में मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत भी हो सकती है।
जंगलों की जमीन पर गिरी पत्तियाँ और सूखी टहनियाँ सड़कर मिट्टी में पोषक तत्व जोड़ती हैं, जिससे नए पौधों को बढ़ने में मदद मिलती है। समुद्र में खाली सीपियाँ नए जीवों के लिए आश्रय बन जाती हैं जबकि खेतों में फसल कटाई के बाद बचा जैविक पदार्थ मिट्टी की उर्वरता बढ़ाकर खाद्य उत्पादन में मदद करता है।
विशेषज्ञों की मानें तो ये अवशेष पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्जनन की दिशा और गति तय करते हैं, कभी यह पुनर्बहाली को तेज करते हैं, तो कभी उसे बाधित भी कर सकते हैं।
पारिस्थितिकी वैज्ञानिक इसे “पारिस्थितिक स्मृति” कहते हैं जिसमें अतीत में घटित घटनाओं के अवशेष वर्तमान पारिस्थितिकी तंत्र के व्यवहार और स्वरूप को प्रभावित करते हैं।
आग, तूफान, लू और कीटों के प्रकोप जैसी चरम घटनाएँ बड़े पैमाने पर वनस्पति और जीवों की मृत्यु का कारण बनती हैं और पीछे जैविक अवशेष छोड़ जाती हैं। ये अवशेष लंबे समय तक पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव डालते रहते हैं।
एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कहा है कि मृत्यु प्रकृति के “बाद के जीवन” में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अध्ययन के अनुसार, मृत जीवों के अवशेष कई मामलों में नए जीवन के लिए बाधा भी बनते हैं और कई मामलों में पुनर्जनन को बढ़ावा भी देते हैं।
शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से “फाउंडेशन स्पीशीज़” का अध्ययन किया जिनमें पेड़, घास, सीपियाँ और मूंगे शामिल हैं। ये जीव अपनी उपस्थिति से पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना और अस्तित्व को निर्धारित करते हैं।
वैज्ञानिकों ने पाया कि ये जीव मरने के बाद भी अपने अवशेषों के माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र की दिशा तय करते हैं। अध्ययन किए गए 10 में से 9 पारिस्थितिकी तंत्रों में मृत अवशेषों का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा गया।
कुछ मामलों में ये अवशेष पुनर्जनन को रोकते हैं। उदाहरण के लिए, प्यूर्टो रिको के उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वर्षावनों में तूफानों के बाद गिरी हुई पत्तियाँ और शाखाएँ जमीन पर इतनी मोटी परत बना देती हैं कि छोटे पौधों तक सूर्य का प्रकाश ही नहीं पहुँच पाता। इससे नए पौधों की वृद्धि धीमी हो जाती है और जंगल की पुनर्बहाली प्रभावित होती है।
इसी तरह, दक्षिण प्रशांत महासागर के कोरल रीफ़ में समुद्री ताप तरंगों के कारण कोरल सफेद पड़ जाते हैं और उनके मरने के बाद बचा ढांचा समुद्री शैवालों को बढ़ने का अवसर देता है जो कोरल की वापसी को रोक सकता है।
लेकिन सभी मामलों में स्थिति नकारात्मक नहीं होती। कई पारिस्थितिकी तंत्रों में मृत अवशेष नए जीवन को बढ़ावा भी देते हैं। उदाहरण के लिए, फ्लोरिडा एवरग्लेड्स के मैंग्रोव जंगलों में तूफानों के बाद पेड़ों की पत्तियाँ और शाखाएँ जड़ों के आसपास जमा होकर पोषक तत्व प्रदान करती हैं जिससे नए पौधों की वृद्धि तेज होती है।
न्यू इंग्लैंड के हेमलॉक जंगलों में कीटों के प्रकोप के बाद खड़े मृत पेड़ जमीन के तापमान और नमी को नियंत्रित करते हैं जिससे नए पौधों के लिए अनुकूल वातावरण बनता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में ऐसी चरम घटनाएँ और बढ़ सकती हैं इसलिए मृत जैविक अवशेषों की भूमिका को समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
कभी-कभी इन अवशेषों का प्रबंधन भी किया जाता है—जैसे जंगलों में मृत लकड़ियों को “नर्स लॉग” के रूप में उपयोग करना, घास के अवशेषों को नियंत्रित तरीके से जलाकर नयी घास के लिए अनुकूल स्थिति बनाना या तटीय क्षेत्रों में सीपियों और कोरल रीफ का उपयोग करके नए समुद्री जीवन को बढ़ावा देना।
अध्ययन का निष्कर्ष है कि प्रकृति में मृत्यु केवल अंत नहीं है, बल्कि एक परिवर्तनशील प्रक्रिया है जो जीवन को नया रूप देती है। जहां जीवन है, वहां मृत्यु भी है—और अक्सर मृत्यु ही नए जीवन की नींव बन जाती है।
द कन्वरसेशन
मनीषा नरेश
नरेश

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