पृथ्वी पर प्रवासी पक्षियों की आधी से अधिक प्रजातियों की संख्या घट रही, संरक्षण के लिए अब भी समय

पृथ्वी पर प्रवासी पक्षियों की आधी से अधिक प्रजातियों की संख्या घट रही, संरक्षण के लिए अब भी समय

पृथ्वी पर प्रवासी पक्षियों की आधी से अधिक प्रजातियों की संख्या घट रही, संरक्षण के लिए अब भी समय
Modified Date: July 25, 2026 / 04:49 pm IST
Published Date: July 25, 2026 4:49 pm IST

(पीटर मर्रा, जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय और नथन डब्ल्यू कूपर, स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन)

वाशिंगटन, 25 जुलाई (द कन्वरसेशन) हर साल, विभिन्न महाद्वीपों, महासागरों और पारिस्थितिकी तंत्र को अरबों प्रवासी पक्षी आपस में जोड़ते हैं, जब वे अपने भोजन की तलाश वाले प्रवास क्षेत्रों और अपने प्रजनन स्थलों के बीच लंबी और रोमांचक यात्राएं करते हैं।

‘बॉबोलिंक’ प्रजाति का पक्षी उत्तरी अमेरिका के अपने प्रजनन वाले घास के मैदानों को छोड़कर दक्षिण अमेरिका की ओर जाता है। एक ‘नूएल्स शियरवाटर’ प्रजनन के लिए हवाई द्वीप पर लौटने से पहले महीनों तक उत्तरी प्रशांत महासागर के आसपास रहती है।

इसी तरह ‘स्पून-बिल्ड सैंडपाइपर’ पक्षी अपने गैर-प्रजनन अवधि के दौरान आर्कटिक रूस से दक्षिण-पूर्व एशिया के तेजी से लुप्त हो रहे दलदली मैदानों की यात्रा करता है।

ये पक्षी एक-दूसरे से काफी अलग हो सकते हैं। वे अलग-अलग तरह के बसेरों में रहते हैं, अलग-अलग प्रवासन मार्गों से यात्र करते हैं और अलग-अलग खतरों का सामना करते हैं। फिर भी उनमें एक उल्लेखनीय विशेषता समान है – उनका अस्तित्व हजारों मील और कई देशों में फैले प्रवास के नेटवर्क पर निर्भर करता है।

आज, इन तीनों प्रजातियों सहित कई अन्य प्रजातियां संकट में हैं। उनका प्रवास प्रकृति के सबसे सुंदर नजारों में से एक बना हुआ है, लेकिन खुद पक्षी तेजी से खतरे में हैं क्योंकि जिन बसेरों और पारिस्थितिकी हालात पर वे निर्भर हैं, वे नष्ट या कम हो रहे हैं और उनके जीवित रहने तथा प्रजनन क्षमता पर खतरे बढ़ रहे हैं।

हम वैज्ञानिकों के रूप में प्रवासी पक्षियों का अध्ययन करते हैं। अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के एक समूह के साथ, हमने अभी-अभी पृथ्वी की 3,380 से अधिक प्रवासी पक्षी प्रजातियों की स्थिति, खतरों और संरक्षण के प्रयासों का एक व्यापक आकलन प्रकाशित किया है।

इसके परिणाम चिंताजनक हैं। हमने पाया कि दुनिया भर की आधी से अधिक प्रवासी पक्षी प्रजातियों की संख्या घट रही है, जिसके पीछे कई तरह के खतरे हैं। इनमें प्रवास का नुकसान, पक्षियों को नुकसान पहुंचाने वाली आक्रामक प्रजातियां, इमारतों से टकराना, शिकार, पालतू जानवरों का व्यापार, जहरीले कीटनाशक और कुछ मामलों में शिकारियों के जाल में फंस जाना शामिल है।

हालांकि, हमारा अध्ययन एक ऐसा दूसरा निष्कर्ष भी प्रस्तुत करता है जो अधिक उम्मीद जगाता है। पिछले दो दशकों में प्रवासी पक्षियों के इर्द-गिर्द के विज्ञान में नाटकीय रूप से बदलाव आया है, और यदि सरकारें इन प्रजातियों के लुप्तप्राय होने से पहले कदम उठाती हैं, तो इन अद्भुत प्रजातियों को बचाने में मदद मिल सकती है।

इनकी संख्या में कमी सिर्फ जैव-विविधता का नुकसान नहीं है; यह उस पारिस्थितिकी तंत्र के बिगड़ते हालात का संकेत है जो वन्यजीवों और इंसानों, दोनों को बनाए रखता है।

अच्छी खबर यह है कि इन प्रजातियों की घटती संख्या को रोकने के लिए इंसान पहले से कहीं ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं।

छोटे निगरानी उपकरण, जेनेटिक्स, स्वचालित रेडियो नेटवर्क, लंबे समय तक निगरानी और ‘ई-बर्ड’ जैसी पहल (जो दुनिया भर में प्रजातियों की संख्या का रिकॉर्ड रखती हैं) ने प्रवासी पक्षियों की आदतों और उन्हें होने वाले खतरों के बारे में हमारी जानकारी को बदल दिया है।

पहली बार, वैज्ञानिक अलग-अलग पक्षियों की महाद्वीपों के पार निगरानी कर सकते हैं और यह पता लगा सकते हैं कि संरक्षण के उपाय कहां सबसे ज्यादा असरदार होंगे।

एक नयी रणनीति : पिछली सदी के ज्यादातर समय में, प्रवासी पक्षियों के संरक्षण का ध्यान उन अहम जगहों को बचाने पर रहा है जिन पर ये पक्षी निर्भर करते हैं जैसे कि प्रजनन स्थल, आर्द्रभूमि, गैर-प्रजनन प्रवास और एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के दौरान रुकने की जगहें।

यह रणनीति बहुत सफल रही है और आज भी बेहद जरूरी है। संरक्षित क्षेत्रों ने अनगिनत प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाया है और ये आगे भी जैव-विविधता संरक्षण का मुख्य आधार बने रहेंगे।

हालांकि, अध्ययन से एक और जरूरी बात पता चली है कि प्रवास स्थलों को बचाना जरूरी तो है, लेकिन उन प्रजातियों को बचाने के लिए यह अक्सर काफी नहीं होता जिनकी जिंदगी कई महाद्वीपों और महासागरों में गुजरती है। यह समझना भी जरूरी है कि ऐसे पक्षियों की आबादी को सबसे ज्यादा खतरा कहां और कब होता है, और पक्षियों की उन मुश्किलों को दूर करना भी जरूरी है।

(द कन्वरसेशन) शफीक सुभाष

सुभाष


लेखक के बारे में