नेपाल बाढ़: प्रधानाचार्य ने समय रहते 900 बच्चों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा बचाई जान

नेपाल बाढ़: प्रधानाचार्य ने समय रहते 900 बच्चों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा बचाई जान

नेपाल बाढ़: प्रधानाचार्य ने समय रहते 900 बच्चों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा बचाई जान
Modified Date: August 31, 2026 / 08:23 pm IST
Published Date: August 31, 2026 8:23 pm IST

बिदुर, 31 अगस्त (एपी) जिंदगी और मौत के बीच कुछ मिनटों का फासला क्या होता है यह बात मध्य-उत्तर नेपाल की त्रिशूली घाटी में त्रिभुवन त्रिशूली माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य राजेंद्र दवाड़ी से बेहतर कौन बता सकता है जिन्होंने विनाशकारी बाढ़ से न सिर्फ अपनी बल्कि वहां मौजूद 900 से ज्यादा बच्चों की जान बचाई।

सुबह का समय था और विद्यालय में कक्षाएं शुरू ही हुई थीं। प्रधानाचार्य राजेंद्र दवाड़ी भी एक कक्षा में थे, तभी स्कूल का लेखाकार दौड़ता हुआ आया और चेतावनी दी कि नेपाल की त्रिशूली घाटी में बाढ़ का पानी तेजी से बढ़ रहा है और अपने साथ घरों, पुलों तथा पूरे-पूरे गांवों को बहा ले जा रहा है।

इसके बाद एक शिक्षक को फोन पर एक और चेतावनी मिली।

कुछ ही देर बाद एक महिला अपने बच्चे को घर ले जाने के लिए स्कूल पहुंची। खतरे की अब तक पुष्टि नहीं हुई थी लेकिन दवाड़ी के पास फैसला लेने के लिए बहुत कम समय था।

उन्होंने स्कूल की घंटी बजाई और विद्यार्थियों व कर्मचारियों को इमारत से बाहर निकलकर ऊंची जगह पर जाने का निर्देश दिया।

उन्होंने ‘द एसोसिएटेड प्रेस’ को बताया, ‘‘मैंने तुरंत स्कूल बंद करने और बच्चों को बाहर निकालने का फैसला किया।’’

जब वह बच्चों के पीछे पास की एक पहाड़ी की ओर जा रहे थे, तब उनके पीछे बाढ़ का पानी तेजी से बढ़ रहा था।

पहाड़ी पर सुरक्षित पहुंचने के बाद उन्होंने उस स्कूल को देखा, जहां वह कभी खुद छात्र रहे थे और जहां उन्होंने वर्षों तक पढ़ाया था।

देखते ही देखते वह स्कूल पानी, कीचड़, बड़े-बड़े पत्थरों और मलबे की तेज धारा में बह गया।

स्कूल के दो कर्मचारी वहां से निकल नहीं सके और अब भी लापता हैं।

दवाड़ी के स्कूल खाली कराने के फैसले से पिछले सप्ताह नेपाल में आई भीषण अचानक बाढ़ से कम से कम 900 बच्चों की जान बच गई।

हिमालय में ग्लेशियर के टूटने के बाद आई इस बाढ़ में नेपाल और चीन में 900 से अधिक लोगों की मौत हो गई जबकि 4,700 से अधिक लोग अब भी लापता हैं। नेपाल इस विनाशकारी प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है और ऐसे में दवाड़ी की कहानी दूरदर्शिता और साहस की एक मिसाल बनकर सामने आई है।

मध्य-उत्तर नेपाल की त्रिशूली घाटी में त्रिभुवन त्रिशूली माध्यमिक विद्यालय में 1,643 छात्र पढ़ते थे।

उस सुबह कम से कम 900 छात्र स्कूल परिसर में मौजूद थे जबकि कुछ छात्र अभी स्कूल पहुंच ही रहे थे।

दवाड़ी ने स्कूल में मौजूद विद्यार्थियों को बाहर निकलने का निर्देश दिया और छात्रों को लेकर आ रहे बस चालकों को फोन कर सतर्क किया और कहा कि वे केवल सुरक्षित स्थानों पर ही रुकें।

दवाड़ी ने बताया कि विद्यार्थियों से भरी एक बस स्कूल पहुंच चुकी थी, तभी उन्होंने चालक से बस वापस ले जाने को कहा।

बस एक नवनिर्मित पुल से गुजरी और कुछ ही क्षण बाद उसके बगल में बना पुराना पुल ढह गया।

दवाड़ी के लिए इस तबाही का असर व्यक्तिगत भी है क्योंकि वह स्कूल उनका कार्यस्थल होने के साथ-साथ उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा रहा है।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे पास कहने के लिए शब्द नहीं हैं। मैंने उसी स्कूल से शिक्षा हासिल की और उसी स्कूल में शिक्षा दी।’’

दवाड़ी के स्कूल का तबाह होना कोई अकेली घटना नहीं है।

उत्तरी नेपाल के कई हिस्सों में बाढ़ ने हजारों बच्चों को कक्षाओं से वंचित कर दिया, उनकी पढ़ाई बाधित हुई और इस बात की आशंका बढ़ गई है कि इस आपदा के कारण उन्हें कई महीनों की पढ़ाई का नुकसान हो सकता है।

परमार्थ संगठन ‘सेव द चिल्ड्रन’ ने एक बयान में बताया कि उत्तरी नेपाल में कम से कम 69 स्कूल पूरी तरह नष्ट हो गए हैं, जिससे करीब 19,000 विद्यार्थियों की पढ़ाई पर संकट मंडरा रहा है।

आपदा के दौरान दवाड़ी की सूझबूझ और त्वरित फैसले लेने को बहादुरी का काम बताया जा रहा है।

घटना के कुछ दिन बाद जब वह स्कूल की जगह पर लौटे, तो बच्चों के माता-पिता ने उन्हें गले लगाकर अपने बच्चों की जान बचाने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा, ‘‘बच्चों के माता-पिता ने मुझे गले लगाया। वे मेरे साथ रोए। वे भावुक थे।’’

छात्रा सुविना तमांग (14) ने बताया कि सभी विद्यार्थियों को सुरक्षित निकाल लिए जाने के कुछ ही देर बाद स्कूल की तीन मंजिला इमारत बाढ़ के पानी में बह गई। उन्होंने कहा, ‘‘जब मैं उनसे मिलूंगी तो मेरी जान बचाने के लिए उन्हें धन्यवाद दूंगी।’’

एपी जितेंद्र प्रशांत

प्रशांत


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