(मैथ्यू इंग्लैंड, एलेक्स सेन गुप्ता, यूएनएसडब्ल्यू सिडनी और एलिस्टर हॉबडे,सीएसआईआरओ)
सिडनी, तीन जुलाई (द कन्वरसेशन) अन्य सालों के जून महीने की अपेक्षा चालू साल के जून में दुनिया के महासागरों के तापमान में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस साल जून में महासागरों का तापमान सर्वाधिक दर्ज किया गया जिसने वर्ष 2023-24 (अल नीनो वर्ष) के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया।
अभी, दुनिया के उष्णकटिबंधीय और शीतोष्ण महासागरों में समुद्र की सतह का औसत तापमान 21° डिग्री सेल्सियस से थोड़ा कम है। 1870 में बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण से पहले, यह तापमान लगभग 19.6 डिग्री सेल्सियस था।
तापमान में यह अंतर शायद बड़ा अंतर न लगे। लेकिन दुनिया के महासागरों को इतना गर्म करने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है। कोयला, गैस और तेल जलाने से उत्सर्जित होने वाली ग्रीनहाउस गैसों की वजह से एकत्र की गई अतिरिक्त ऊर्जा का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा दुनिया के महासागरों को गर्म करने में इस्तेमाल हो गया।
नतीजतन, महासागर तेजी से गर्म हो रहे हैं। वर्ष 2025 में जो तापमान बढ़ा वह हर दिन हर सेकेंड हिरोशिमा (जापान का एक शहर) में गिराए गए परमाणु बम के स्तर के लगभग 12 परमाणु बम फटने के बराबर था।
महासागरों में अभी जो हो रहा है, उससे मिलती-जुलती जलवायु स्थिति का पता लगाने के लिए हमें लगभग 120,000 साल पीछे, यानी पिछले हिमयुग से पहले के समय में जाना होगा।
उस समय, पृथ्वी की कक्षा में धीरे-धीरे हुए बदलावों के कारण हजारों सालों में यह धीरे-धीरे गर्म हुई थी। इंसानों ने एक सदी से भी कम समय में ऐसा ही परिणाम उत्पन्न कर दिया।
लेकिन महासागर की गर्मी सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं रहती। गर्म महासागरों से अधिक जोरदार चक्रवात, अधिक नमी वाला वायुमंडल, तेज बारिश और समुद्र के ऊपर हवा के बड़े हिस्सों में अधिक गर्मी पैदा होती है, इससे जमीन पर लू (हीटवेव)चलने की संभावना और उसकी तीव्रता बढ़ सकती है।
अभी उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में प्रशांत महासागर में जो अल नीनो बन रहा है, उसके और विशाल होने की संभावना है। जैसे-जैसे यह विकसित होगा, हम पश्चिमी हिंद महासागर, उष्णकटिबंधीय अटलांटिक और पूर्वी प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ने और समुद्री ‘हीटवेव’ जैसी चरम घटनाओं की उम्मीद कर सकते हैं।
भूमि और महासागर में ‘हॉटस्पॉट’ कहां हैं?
पूरा यूरोप रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी और लू (हीटवेव) से जूझ रहा है। इस इलाके के आस-पास के महासागर और समुद्र भी बहुत अधिक गर्म हैं।
भूमध्य सागर के कुछ हिस्से दीर्घकालिक औसत तापमान से छह डिग्री सेल्सियस तक अधिक गर्म हैं।
उत्तरी सागर के कुछ हिस्से औसत से तीन डिग्री सेल्सियस तक अधिक गर्म हैं।
‘अल नीनो’ की वजह से मध्य-पूर्वी प्रशांत महासागर के एक बड़े हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान औसत से लगभग 1.24° डिग्री सेल्सियस अधिक हो गया है।
सतह के नीचे भी बहुत अधिक गर्मी है। पूर्वी प्रशांत महासागर में सतह के नीचे का तापमान औसत से छह डिग्री सेल्सियास से भी अधिक है।
आम तौर पर अल नीनो का प्रभाव लगभग एक साल तक रहता है। वायुमंडल के तापमान पर इसका पूरा असर इस चक्र के आखिर में सबसे स्पष्ट दिखता है।
इसका मतलब है कि हम वर्ष 2026 के बहुत गर्म होने (शायद एक नया रिकॉर्ड बनने) की उम्मीद कर सकते हैं, वहीं अगले साल के और भी अधिक गर्म रहने की संभावना है, क्योंकि समुद्र की गर्मी वापस सतह पर आ जाती है। हमने 2023–24 और 2015–16 की ‘अल नीनो’ घटना के दौरान ऐसा देखा था।
महासागर से जमीन तक
समुद्र में जो होता है, वह वहीं तक सीमित नहीं रहता। जून 2023 में, उत्तरी अटलांटिक महासागर में रिकॉर्ड तोड़ समुद्री ‘हीटवेव’ (समुद्र के पानी का असामान्य रूप से गर्म होना) ने तापमान के पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसके तुरंत बाद यूरोप का बड़ा हिस्सा भीषण ‘हीटवेव’ की चपेट में आ गया, जबकि स्पेन में भारी बारिश से जानलेवा बाढ़ आ गई और भूमध्य सागर के आसपास जंगल में भीषण आग लग गई।
समुद्र का तापमान बढ़ने के कई नतीजे होते हैं।
गर्म समुद्र गर्मियों में जमीन को ठंडा रखने में कम सक्षम होता है। गर्म समुद्रों से वाष्पीकरण भी अधिक होता है, जिससे नमी बढ़ती है और अधिक तेज व अचानक होने वाली भारी बारिश और बाढ़ को बढ़ावा मिलता है। इनके विनाशकारी नतीजे हो सकते हैं।
अल नीनो की घटनाओं के दौरान, एक स्पष्ट भौगोलिक पैटर्न देखने को मिलता है। जिन इलाकों में अल नीनो के दौरान अधिक गर्मी या ठंड होने की उम्मीद होती है, वहीं समुद्री हीटवेव और अधिक तीव्र उष्णकटिबंधीय चक्रवात आने की संभावना भी कम या अधिक होती है।
चक्रवाती इलाकों (जैसे पश्चिमी हिंद महासागर) में समुद्री चक्रवात के जमीन से टकराने पर अधिक तेज तूफान आ सकते हैं और भारी बारिश हो सकती है। अल नीनो के कारण पश्चिमी दक्षिण अमेरिका में भारी बारिश और बाढ़ आती है, जबकि ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ता है।
क्या हम तैयारी कर सकते हैं?
हम यह बेहतर ढंग से समझ रहे हैं कि जलवायु को प्रभावित करने वाले अल नीनो जैसे बड़े कारक मौसम को कैसे प्रभावित करते हैं और दुनिया भर से मिले समुद्र के डेटा का इस्तेमाल करके मौसम के बेहतर अनुमान कैसे लगाए जा सकते हैं, ताकि सरकारें तैयारी कर सकें।
पिछले दो सालों में, हमने ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और दूसरे इलाकों में ‘समुद्री हीटवेव’ (समुद्र के पानी का असामान्य रूप से गर्म होना) के आगमन से तीन-चार महीने पहले अनुमान लगाने की अपनी क्षमता में सुधार किया है। इन अनुमानों से समुद्री अधिकारियों को जल्दी कदम उठाने का मौका मिलता है, जैसे कि मछली पकड़ने की तय सीमा को कम करना और खतरे में पड़ी प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्रयास शुरू करना।
समुद्र के बारे में अनुमान लगाने में मिली यह शुरुआती सफलता शायद कुछ ही समय के लिए हो। अमेरिका की मौजूदा सरकार ने पिछले साल जलवायु संबंधी डेटा एकत्र करने वाले नेटवर्क के लिए फंड में कटौती की थी और नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक रिसर्च को खत्म करने की दिशा में काम किया था।
समुद्र और जमीन से जुड़े पूर्वानुमानों के लिए समुद्र का डेटा लगातार एकत्र करना बहुत जरूरी है। अगर यह काम कमजोर पड़ गया या बंद हो गया, तो हमें जलवायु पर पड़ रहे बुरे असर का सामना बिना सही जानकारी के करना पड़ सकता है, जो एक बड़ी चुनौती होगी।
जलवायु परिवर्तन संबंधी आकलन का काम बंद कर दिए जाने से यह रुकेगा नहीं। जलवायु परिवर्तन की स्थिति को लगातार और खराब होने से बचाने का एकमात्र तरीका यह है कि जितनी जल्दी हो सके ‘नेट जीरो’ के लक्ष्य को हासिल किया जाए।
(द कन्वरसेशन) संतोष नरेश
नरेश