आरएसएस ‘कु क्लक्स क्लैन’ का भारतीय संस्करण नहीं, उसके बारे में कई गलतफहमियां हैं : होसबाले

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आरएसएस ‘कु क्लक्स क्लैन’ का भारतीय संस्करण नहीं, उसके बारे में कई गलतफहमियां हैं : होसबाले

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  • Publish Date - April 24, 2026 / 10:44 AM IST,
    Updated On - April 24, 2026 / 10:44 AM IST

(सागर कुलकर्णी)

वाशिंगटन, 24 अप्रैल (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में कहा कि आरएसएस अमेरिकी श्वेत वर्चस्ववादी समूह ‘कु क्लक्स क्लैन’ का कोई भारतीय संस्करण नहीं है। साथ ही उन्होंने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में संगठन के कार्यों पर प्रकाश डाला।

हडसन इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित ‘न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस’ में संवादात्मक सत्र के दौरान होसबाले ने कहा कि अमेरिका में भारत के बारे में गलतफहमियों की तरह ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बारे में भी गलत धारणाएं हैं।

उन्होंने बृहस्पतिवार को लेखक वाल्टर रसेल मीड के साथ चर्चा के दौरान कहा, ‘‘दशकों से जानबूझकर या अनजाने में अन्यथा किसी एजेंडा के तहत इस तरह की धारणा गढ़ी गई है कि आरएसएस एक हिंदू वर्चस्ववादी संगठन है या यह ईसाई विरोधी, अल्पसंख्यक विरोधी, विकास विरोधी और आधुनिकीकरण का विरोधी है।’’

होसबाले ने कहा, ‘‘इसलिए सकारात्मक कार्यों को कभी उजागर नहीं किया गया। इसके बजाय हमेशा गलत छवि का ही प्रचार किया जाता रहा है… जैसे हम ‘कु क्लक्स क्लैन’ का कोई भारतीय संस्करण हों, जो कि हम नहीं हैं।’’

उन्होंने कहा कि हिंदू दर्शन और संस्कृति पूरे विश्व को एक परिवार की तरह देखती है और यह वर्चस्ववाद का समर्थन नहीं करती।

आरएसएस सरकार्यवाह ने कहा, ‘‘हम सजीव और निर्जीव, हर चीज में एकता देखते हैं। जब यही हिंदुओं का मूल दर्शन है, तो श्रेष्ठता का प्रश्न ही नहीं उठता। इतिहास में हिंदुओं ने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया है।’’

होसबाले ने आरएसएस को भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत विचारधारा में निहित एक स्वयंसेवी आंदोलन के रूप में वर्णित किया।

उन्होंने कहा, ‘‘आरएसएस भारत के प्राचीन समाज की सांस्कृतिक नैतिकता और सभ्यतागत मूल्यों से प्रेरित एक जन स्वैच्छिक आंदोलन है जिसे सामान्यतः हिंदू संस्कृति के रूप में जाना जाता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘चरित्रवान, आत्मविश्वासी, समाज सेवा का भाव रखने वाले और समाज को संगठित करने में सक्षम स्वयंसेवकों को तैयार करने के लिए आरएसएस एक घंटे की दैनिक और साप्ताहिक शाखाओं का आयोजन करता है। इन एक घंटे की शाखाओं के माध्यम से हम जीवन के मूल्यों को बढ़ावा देते हैं।’’

होसबाले ने कहा कि आरएसएस हिंदू पहचान को धार्मिक नहीं बल्कि सभ्यतागत पहचान के रूप में देखता है।

उन्होंने कहा, ‘‘अल्पसंख्यक समूहों और पड़ोसी देशों के साथ तनाव राजनीतिक हितों और इतिहास की गलत व्याख्याओं से पैदा होता है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि गलतफहमियों को दूर करने के लिए अल्पसंख्यक समुदायों के साथ निरंतर संवाद महत्वपूर्ण है।

होसबाले ने कहा कि पड़ोसी देशों के बीच तनाव के कई कारण हैं, जिनमें वहां का राजनीतिक नेतृत्व भी शामिल है।

उन्होंने कहा, ‘‘समस्या सिर्फ एक पड़ोसी देश से है, जो भारत की कोख से जन्मा है। वह पड़ोसी देश तो बन गया है लेकिन कई लोग उस देश के पीछे हैं और समस्याएं पैदा करने में लगे हुए हैं।’’

भारतीय-अमेरिकी समुदाय ने बृहस्पतिवार शाम वर्जीनिया के एक उपनगर में होसबाले के सम्मान में एक सार्वजनिक स्वागत समारोह का आयोजन किया जिसमें ग्रेटर वाशिंगटन क्षेत्र के लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

होसबाले ने कहा कि आरएसएस सेवा भावना और जीवन मूल्यों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लगभग 83,000 शाखाएं आयोजित करता है जिनका उद्देश्य सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना है।

उन्होंने कहा, ‘‘जीवन के हर क्षेत्र और हर आयु वर्ग के लोग हमारे संगठन के स्वयंसेवक बन चुके हैं। आरएसएस प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्य करता है और शिक्षा, स्वास्थ्य, आत्मरक्षा, ग्रामीण विकास और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय है।’’

आरएसएस नेता ने कहा कि सांस्कृतिक मूल्य और आधुनिकीकरण परस्पर विरोधी नहीं हैं और साथ-साथ चल सकते हैं, हालांकि कुछ तनाव उत्पन्न हो सकते हैं।

होसबाले ने कहा, ‘‘आधुनिकीकरण और सांस्कृतिक मूल्यों दोनों को समय के अनुसार ढलने की आवश्यकता होती है। आधुनिकीकरण औद्योगीकरण, प्रौद्योगिकी और व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों को तो लाता ही है, साथ ही यह संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ-साथ भी चल सकता है।’’

उन्होंने कहा कि हाल के दशकों में कई समाजों में संस्कृति और आधुनिकता का सह-अस्तित्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

होसबाले ने कहा, ‘‘चाहे वह हिंदू समाज हो, भारतीय समाज हो, जापान हो या चीन, सभी ने अपने सांस्कृतिक और सभ्यतागत मूल्यों को बरकरार रखते हुए आधुनिकीकरण किया है और उनसे प्रेरणा ली है। इसीलिए मुझे नहीं लगता कि सांस्कृतिक मूल्य और आधुनिकीकरण एक दूसरे को विपरीत दिशा में खींचते हैं।’’

भाषा सुरभि गोला

गोला