(जॉयस सिएट, वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी)
सिडनी, 21 जुलाई (द कन्वरसेशन) लंबे समय तक साथ रहने वाले दंपतियों में केवल जीवनशैली ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी कई पहलू भी एक-दूसरे से मिलते-जुलते हो जाते हैं।
मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और स्ट्रोक के बाद अब एक नए अध्ययन में संकेत मिला है कि डिमेंशिया का जोखिम भी पति-पत्नी में साझा हो सकता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इसका यह अर्थ नहीं है कि यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे में फैलती है।
ताइवान में लगभग 10 लाख विवाहित वयस्कों पर किए गए इस व्यापक अध्ययन में पाया गया कि यदि किसी व्यक्ति के जीवनसाथी को डिमेंशिया का पता चलता है, तो दूसरे साथी में भी इस बीमारी का निदान होने की संभावना उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाती है।
इस तरह के निष्कर्ष पहले भी कुछ छोटे अध्ययनों में सामने आए थे, लेकिन इस अध्ययन की विशेषता इसका बड़ा दायरा और यह विश्लेषण है कि उम्र, आय और पारिवारिक परिस्थितियां इस जोखिम को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।
शोधकर्ताओं ने वर्ष 1998 से 2022 के बीच ताइवान की राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना से जुड़े लोगों के स्वास्थ्य संबंधी रिकॉर्ड का विश्लेषण किया।
अध्ययन में ऐसे 1.90 लाख से अधिक लोगों को शामिल किया गया, जिनके जीवनसाथी में डिमेंशिया का नया मामला सामने आया था। उनकी तुलना 7.60 लाख से अधिक ऐसे लोगों से की गई, जिन्हें न तो स्वयं डिमेंशिया था और न ही उनके जीवनसाथी को यह बीमारी थी।
प्रतिभागियों का चयन उम्र, लिंग, आय और निवास स्थान के आधार पर समानता रखते हुए किया गया और फिर समय के साथ यह देखा गया कि उनमें बाद में डिमेंशिया विकसित हुआ या नहीं।
शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की अन्य बीमारियों, स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग और परिवार के आकार जैसे कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। इसके बाद यह जांचा गया कि इन सभी समानताओं को ध्यान में रखने के बाद भी क्या एक जीवनसाथी को डिमेंशिया होने से दूसरे साथी का जोखिम बढ़ा रहता है। अध्ययन में इसका उत्तर ‘हां’ पाया गया।
अध्ययन के अनुसार, जिन महिलाओं के जीवनसाथी को डिमेंशिया हुआ, उनमें इस बीमारी का सापेक्ष जोखिम 74 प्रतिशत अधिक पाया गया। पुरुषों के मामले में यह वृद्धि 69 प्रतिशत रही।
शोधकर्ताओं ने हालांकि स्पष्ट किया कि सापेक्ष जोखिम केवल दो समूहों के बीच तुलना दर्शाता है, जबकि वास्तविक जोखिम को समझना भी जरूरी है।
पांच वर्षों की अवधि में जिन महिलाओं के जीवनसाथी को डिमेंशिया हुआ, उनमें से लगभग 6.5 प्रतिशत को स्वयं भी डिमेंशिया का निदान हुआ, जबकि जिनके जीवनसाथी को यह बीमारी नहीं थी, उनमें यह आंकड़ा 3.7 प्रतिशत रहा। पुरुषों में यह अनुपात क्रमशः 9.2 प्रतिशत और 5.8 प्रतिशत था।
दूसरे शब्दों में, जीवनसाथी को डिमेंशिया होने पर पांच वर्षों में प्रत्येक 100 महिलाओं में लगभग तीन और प्रत्येक 100 पुरुषों में तीन से कुछ अधिक अतिरिक्त मामले सामने आए।
शोधकर्ताओं ने कहा कि इन निष्कर्षों का यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि डिमेंशिया किसी संक्रमण की तरह एक साथी से दूसरे में पहुंचता है। इसके पीछे अधिक जटिल और दीर्घकालिक कारण हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि लोग अक्सर अपने जैसे शिक्षा स्तर, आय, जीवनशैली और मानसिक क्षमता वाले साथी का चयन करते हैं। इसे ‘असॉर्टेटिव मैटिंग’ कहा जाता है। इसके बाद वर्षों तक साथ रहने के दौरान दंपति एक ही वातावरण में रहते हैं, समान भोजन करते हैं, समान वायु में सांस लेते हैं, समान स्तर की शारीरिक गतिविधि करते हैं और जीवन की कई समान परिस्थितियों का सामना करते हैं, जो मस्तिष्क के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं।
यह अध्ययन यह निर्धारित करने के लिए तैयार नहीं किया गया था कि ऐसा क्यों होता है। अध्ययन में यह जरूर पाया गया कि उच्च रक्तचाप, इंसुलिन प्रतिरोध, अवसाद और चिंता जैसे स्थापित जोखिम कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी यह संबंध बना रहा।
इससे संकेत मिलता है कि केवल समान स्वास्थ्य प्रोफाइल इन निष्कर्षों की पूरी तरह व्याख्या नहीं कर सकती, लेकिन अध्ययन इसके पीछे के वास्तविक कारणों की पहचान नहीं कर पाया।
शोधकर्ताओं के अनुसार, अन्य अध्ययनों से यह संभावना सामने आई है कि डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति की देखभाल करने वाले जीवनसाथी को लंबे समय तक तनाव, नींद में बाधा, सामाजिक अलगाव और शारीरिक गतिविधि तथा भोजन की गुणवत्ता में गिरावट जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। ये सभी कारक मानसिक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
कुछ नए अध्ययनों में खराब मौखिक स्वास्थ्य और आंतों के सूक्ष्मजीवों (गट माइक्रोबायोम) की भूमिका पर भी चर्चा की गई है, हालांकि इस संबंध में अभी और शोध की आवश्यकता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह दिखाना है कि डिमेंशिया का जोखिम दंपतियों में एक साथ दिखाई देता है और इससे यह समझने के लिए नए प्रश्न उठते हैं कि साझा जीवन मस्तिष्क के स्वास्थ्य को किस प्रकार प्रभावित करता है।
उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में डिमेंशिया की रोकथाम के लिए व्यक्तिगत प्रयासों पर अधिक जोर दिया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अद्यतन दिशा-निर्देशों में नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, रक्तचाप नियंत्रण, धूम्रपान छोड़ना, आवश्यकता पड़ने पर श्रवण यंत्र का उपयोग तथा आजीवन सीखते रहने जैसी बातों पर बल दिया गया है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि ये उपाय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि डिमेंशिया केवल व्यक्तिगत विकल्पों का परिणाम है। मस्तिष्क के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी व्यक्ति, समुदाय और सरकार सभी की साझा जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की शिक्षा, आय, आवास, पड़ोस, सांस्कृतिक परिस्थितियां और सामाजिक नीतियां भी यह तय करती हैं कि वह स्वस्थ जीवनशैली अपना सकता है या नहीं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश यह है कि डिमेंशिया किसी एक निर्णय या एक जोखिम कारक का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों तक जी गई जीवनशैली और परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव है। इसलिए इसकी रोकथाम के उपाय भी दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ किए जाने चाहिए।
द कन्वरसेशन रवि कांत सुरेश
सुरेश