श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति को कार्यकर्ताओं के लापता होने के मामले में ऑनलाइन गवाही की अनुमति मिली

श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति को कार्यकर्ताओं के लापता होने के मामले में ऑनलाइन गवाही की अनुमति मिली

श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति को कार्यकर्ताओं के लापता होने के मामले में ऑनलाइन गवाही की अनुमति मिली
Modified Date: June 2, 2026 / 04:34 pm IST
Published Date: June 2, 2026 4:34 pm IST

कोलंबो, दो जून (भाषा) श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को 2011 में दो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लापता होने से जुड़े मामले में मंगलवार को ऑनलाइन माध्यम से गवाही देने की अनुमति दे दी गई।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ललित कुमार वीराराजू और कुगन मुरुगनंदन के लापता होने के समय राजपक्षे रक्षा सचिव थे।

लापता होने से पहले वीराराजू और मुरुगनंदन कोलंबो में कथित तौर पर एक संवाददाता सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी कर रहे थे। संवाददाता सम्मेलन में 2009 में श्रीलंका में सैन्य संघर्ष समाप्त होने के बाद, तमिल नागरिकों के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर के लिए विरोध प्रदर्शन के बारे में जानकारी दी जानी थी।

लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) ने उत्तरी और पूर्वी प्रांतों में अलग तमिल मातृभूमि की मांग को लेकर लगभग 30 वर्षों तक सशस्त्र अभियान चलाया था, जो अंततः उसके पतन के साथ समाप्त हुआ।

मंगलवार को राजपक्षे को तमिल बहुल जाफना की मजिस्ट्रेट अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए बिना ऑनलाइन गवाही देने की अनुमति दी गई।

इससे पहले, 2019 से 2022 तक अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान राजपक्षे ने अपीलीय अदालत में याचिका दायर कर कहा था कि जाफना जाकर अदालत में पेश होने के दौरान उनकी सुरक्षा को खतरा है। अदालत ने उनकी यह दलील स्वीकार कर ली थी।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लापता होने के समय राजपक्षे पर ऐसे अपहरण दस्तों की देखरेख करने का आरोप लगाया गया था, जो संदिग्ध विद्रोहियों, सरकार के आलोचक पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को उठा ले जाते थे। इनमें से कई लोग फिर कभी दिखाई नहीं दिए।

राजपक्षे पहले इन सभी आरोपों से इनकार कर चुके हैं।

हालांकि, 2025 में इस मामले की दोबारा सुनवाई शुरू हुई और जाफना में लापता व्यक्तियों से संबंधित बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर राजपक्षे को गवाही देने के लिए कहा गया।

साल 1983 में शुरू हुआ लिट्टे का तीन दशक लंबा सशस्त्र अभियान 2009 में संगठन के सर्वोच्च नेता वी. प्रभाकरन तथा उसके शीर्ष नेताओं के श्रीलंकाई सेना के हाथों मारे जाने के साथ समाप्त हो गया।

भाषा जोहेब अविनाश

अविनाश


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