नयी शुरुआत का उत्साह जल्दी पड़ जाता है फीका, टिकाऊ कार्य लक्ष्य कैसे तय करें
नयी शुरुआत का उत्साह जल्दी पड़ जाता है फीका, टिकाऊ कार्य लक्ष्य कैसे तय करें
(गयानी गुणाशेखरा, यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी)
सिडनी, सात जनवरी (द कन्वरसेशन) हर जनवरी के साथ कार्यालयों में नयी शुरुआत का माहौल बनता है। नयी डायरी, नयी नोटबुक और व्यवस्थित कार्य सूची (टू-डू लिस्ट) के साथ यह उम्मीद रहती है कि इस साल सब कुछ अलग होगा। लेकिन फरवरी आते-आते वही योजनाएं अधूरी रह जाती हैं और शुरुआती उत्साह कम हो जाता है।
आमतौर पर इसे अनुशासन या इच्छाशक्ति की कमी माना जाता है, लेकिन मनोविज्ञान इसके पीछे एक अलग ही तस्वीर पेश करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, नयी शुरुआत हमें काम शुरू करने में तो मदद करती है, लेकिन लंबे समय तक टिके रहने में नहीं।
-नयी शुरुआत क्यों लगती है प्रभावशाली-
मनोवैज्ञानिक नयक साल को ‘टेम्पोरल लैंडमार्क’ मानते हैं, जो हमारे पुराने और नये रूप के बीच एक सीमा रेखा खींच देता है।
‘टेम्पोरल लैंडमार्क’ समय में आने वाले वे खास पल या घटनाएं होती हैं जो हमें अपने जीवन में ‘‘नये सिरे से शुरुआत’’ करने का अहसास दिलाती हैं।
शोध के मुताबिक, ऐसे पड़ाव ‘फ्रेश स्टार्ट इफेक्ट’ पैदा करते हैं, जिससे लोग बड़े और आदर्श लक्ष्य तय करने के लिए खुद को अधिक प्रेरित महसूस करते हैं। नयी डायरी या खाली पन्ना पिछले साल की असफलताओं से मुक्त एक नयी शुरुआत का प्रतीक बन जाता है।
-प्रेरणा क्यों हो जाती है कम-
समस्या नयी शुरुआत में नहीं, बल्कि उस शुरुआती भावनात्मक जोश को स्थायी प्रेरणा समझ लेने में है।
‘सेल्फ-डिटरमिनेशन थ्योरी’ के अनुसार, प्रेरणा तभी बनी रहती है जब लक्ष्य तीन जरूरतों को पूरा करें—स्वायत्तता (लक्ष्य अपना लगे), दक्षता (प्रगति संभव लगे) और संबंध (समर्थन महसूस हो)। जनवरी में तय किये गये कई लक्ष्य सामाजिक दबाव, अस्पष्ट अपेक्षाओं या अव्यावहारिक योजनाओं पर आधारित होते हैं, जिससे शुरुआती प्रगति न दिखने पर उत्साह जल्दी टूट जाता है।
-टिकाऊ लक्ष्य कैसे तय करें-
विशेषज्ञों का कहना है कि लक्ष्य तय करते समय उस दौर की योजना बनानी चाहिए जब प्रेरणा कम हो। इसके लिए तीन बातों पर जोर दिया गया है—
1) पहला, यह मानकर चलें कि प्रेरणा घटेगी और पहले से तय करें कि न्यूनतम प्रगति क्या होगी।
2) दूसरा, लक्ष्यों को व्यक्तिगत मूल्यों से जोड़ें, न कि सिर्फ बाहरी दबाव से।
3) तीसरा, बड़े इरादों को छोटे, स्पष्ट और दोहराए जा सकने वाले कदमों में बांटें, ताकि कम ऊर्जा वाले दिनों में भी निरंतरता बनी रहे।
-यथार्थवादी नजरिया जरूरी-
विशेषज्ञ मानते हैं कि हर जनवरी नयी शुरुआत की चाह रखना स्वाभाविक है। यह उम्मीद और बदलाव की मानवीय जरूरत को दर्शाता है। लेकिन असली चुनौती लक्ष्य तय करना नहीं, बल्कि ऐसे लक्ष्य बनाना है जो शुरुआती उत्साह के बाद भी कायम रहें।
(द कन्वरसेशन) मनीषा देवेंद्र
देवेंद्र

Facebook


