जीवों के मल ने पृथ्वी के सबसे वृहद जैव विकास को उत्प्रेरित किया

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जीवों के मल ने पृथ्वी के सबसे वृहद जैव विकास को उत्प्रेरित किया

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  • Publish Date - August 5, 2026 / 06:19 PM IST,
    Updated On - August 5, 2026 / 06:19 PM IST

(रसेल डीन क्रिस्टोफर बिकनेल, फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय; जूलियन किमिग, कार्ल्सरुहे प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में जीवाश्म संभाग की प्रमुख)

कार्ल्सरुहे(जर्मनी), पांच अगस्त (द कन्वरसेशन) सभी बच्चे सीखते हैं, हर कोई मलत्याग करता है। लेकिन यह कब शुरू हुआ?

और मल के साथ कौन-से विकासवादी और पर्यावरणीय बदलाव आए? और आगे बढ़ें तो, क्या मल का विकास ही हमारे अस्तित्व का कारण है? हमारे नये अनुसंधान में सामने आया है कि मल के विकास ने पृथ्वी पर जीवन के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक, ‘कैम्ब्रियन विस्फोट’ को गति देने में मदद की।

‘कैम्ब्रियन विस्फोट’ शब्द का इस्तेमाल पृथ्वी के उस काल खंड के लिए किया जाता है जब कई नए प्रकार के जटिल जीव प्रकट हुए। पहली बार बड़ी संख्या में ऐसे जीवों का विकास हुआ जिनका कठोर खोल , बाहरी कंकाल और जटिल शरीर संरचना थी।

और संभव है कि जीवों के इतने बृहद पैमाने पर सफल विकास की वास्तविक वजह उनका मल ही हो।

कैम्ब्रियन विस्फोट का एक छिपा हुआ सुराग

लगभग 54 करोड़ साल पहले, ‘कैम्ब्रियन विस्फोट’ ने पृथ्वी पर जीवन के स्वरूप को बदल दिया। भू-वैज्ञानिक समय के एक अपेक्षाकृत छोटे अंतराल में (जो लगभग 1.3 करोड़ से 2.5 करोड़ साल के बीच का था) जीवों के ज़्यादातर मुख्य समूह अस्तित्व में आए।

लगभग उसी समय, समुद्री पारिस्थितिकी विकसित हुई और अधिक जटिल हुई। समुद्री खाद्य श्रृंखला आधुनिक महासागरों की खाद्य श्रृंखला जैसी दिखने लगी।

वैज्ञानिक लंबे समय से इस विषय पर बहस कर रहे हैं कि इस विविधता के पीछे क्या कारण था। ऑक्सीजन के बढ़ते स्तर, विकासवादी बदलाव और शिकारी-शिकार के बीच लगातार जटिल होते संबंधों को इसके कारणों के तौर पर इंगित किया गया है।

हालांकि, पुरानी और नयी पारिस्थितिकी पर हुए अधिकतर अनुसंधानों में एक ज़रूरी बिंदु को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है और वह है मल। वैज्ञानिक जीवाश्म बन चुके मल (जिसे कोप्रोलाइट्स कहते हैं) की जांच तो करते हैं, लेकिन आम तौर पर ऐसा सिर्फ पुराने समय के खान-पान के सबूत खोजने और यह पता लगाने के लिए करते हैं कि कौन से जीव एक-दूसरे का शिकार करते थे।

हमारे अध्ययन ने इन जीवाश्मों को एक बृहद तस्वीर के हिस्से के तौर पर देखा। हमारा मानना ​​है कि ये एक बुनियादी पारिस्थतिकी प्रक्रिया के शुरू होने का भी सबूत हैं।

जैसे-जैसे जीवों की संख्या बढ़ी और उनके पाचन तंत्र अधिक जटिल होते गए, वे अधिक मल त्याग करने लगे। अधिक मात्रा में मल त्याग करने का अभिप्राय था कि समुद्रों में अधिक जैविक और पोषक तत्वों का प्रसार। इससे पारिस्थितिकी के विकास में तेजी आई।

साधारण आंतों से जटिल पांचन पारिस्थितिकी तक

कैम्ब्रियन विस्फोट शुरू होने से लगभग छह करोड़ साल पहले सबसे शुरुआती जीव दिखाई दिए थे। हालांकि, कैम्ब्रियन काल तक जटिल पाचन तंत्र या पुख्ता तौर पर पहचाने गए जीवाश्म मल (कोप्रोलाइट्स) का कोई खास सबूत नहीं मिलता है।

कैम्ब्रियन काल के दौरान आंतों और जीवाश्म मल (कोप्रोलाइट्स) के रिकॉर्ड में जबरदस्त बदलाव आता है। जीवाश्म के रूप में मल सबसे पहले कैम्ब्रियन काल की शुरुआत में ही दिखाई देते हैं और धीरे-धीरे इसकी संख्या बढ़ती जाती है।

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता है, अलग-अलग तरह के कोप्रोलाइट्स (जीवाश्म मल) दिखाई देते हैं। दुनिया भर में दर्जनों जगहों से मिले साक्ष्यों से इनके कई तरह के आकार और प्रकार का पता चलता है। मल के इन नमूनों में बहुत छोटे कणों से लेकर सेंटीमीटर के आकार के कोप्रोलाइट्स तक शामिल हैं, जिनमें कुचले हुए खोल और जानवरों के शरीर के दूसरे अवशेष होते हैं।

इस बदलाव के साथ-साथ, खास तौर पर शुरुआती ‘आर्थ्रोपोड्स’ (संधिपाद) में, जटिल पाचन तंत्र वाले बहुत अच्छी तरह से सुरक्षित जीवाश्मों की संख्या में बढ़ोतरी हुई। इन जीवों में विशेष तरह की अग्र-आंत और पाचन ग्रंथियां विकसित हो गई थीं, जो कई तरह के भोजन को पचा सकती थीं।

ये सभी जीवाश्म इंगित करते हैं कि जीव पूरी तरह से नए तरीकों से जैविक पदार्थों का प्रसंस्करण करने और फिर उसे दोबारा वितरित करने में संलिप्त थे।

विकासवाद के स्तर पर पोषक तत्वों का चक्रण

इस विकास का पारिस्थितिकी महत्व तब और स्पष्ट हो जाता है जब इसे आधुनिक महासागरों के संदर्भ में देखा जाता है।

आज, मल के कण जैविक पदार्थों के संचरण का एक अहम हिस्सा हैं। यह वह प्रक्रिया है जो जैविक कार्बन और पोषक तत्वों को समुद्र की ऊपरी सतह से गहरे समुद्री इलाकों तक पहुंचाती है। जैसे-जैसे मल के कण नीचे बैठते हैं, वे समुद्र की उस ऊपरी सतह से कहीं ज़्यादा गहराई तक जीवन को बनाए रखने के लिए जरूरी पोषण पहुंचाते हैं, जहां तक सूरज की रोशनी भी नहीं पहुंचती है।

हमारे अनुसंधान से संकेत मिलता है कि कैम्ब्रियन काल के दौरान मल का बड़े पैमाने पर दिखना, जीवों के उद्भव एवं विकास की प्रक्रिया का संकेत कर सकता है।

कैम्ब्रियन काल में जैसे-जैसे जीवों की विविधता और जैव पदार्थों में बढ़ोतरी हुई, वैसे-वैसे उनके मल के कणों का उत्पादन भी बढ़ा होगा। इसका अभिप्राय यह रहा होगा कि ऊर्जा और पोषक तत्वों के और भी स्रोत समुद्र की गहराई वाले इलाकों में पहुंच रहे थे, और कम गहरे पानी में भी भोजन ज़्यादा आसानी से उपलब्ध हो रहा था।

अधिक जटिल समुद्री समुदाय

बड़े पैमाने पर मल बनने की प्रक्रिया का पर्यावरण पर एक महत्वपूर्ण असर पड़ा। जीवों में अधिक विविधता के कारण ज़्यादा मात्रा में मल बना, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी में जैविक कार्बन और पोषक तत्वों का पुनर्वितरण बढ़ गया।

इसके परिणामस्वरूप, पोषक तत्वों की बेहतर उपलब्धता ने संभवतः बड़ी आबादी, अधिक जटिल खाद्य श्रृंखला और विविध समुद्री आवासों में बसावट को बढ़ावा दिया। इन बढ़ते हुए पारिस्थितिक तंत्रों ने फिर और भी अधिक जैविक उत्पादकता उत्पन्न की होगी।

हमारा आकलन कैम्ब्रियन विस्फोट की व्याख्या करने वाली अन्य परिकल्पनाओं का पूरक है। इसमें ऑक्सीजन की उपलब्धता, पारिस्थितिकीय अंतरसंवाद और विकासवादी नवाचारों ने भी निस्संदेह महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(द कन्वरसेशन) धीरज नरेश

नरेश