Baidyanath Dham: अपने नौ सिर काटने के बाद भी, क्यों खाली हाथ लौटे थे लंकापति रावण? जानिए बैद्यनाथ धाम की अद्भुत कथा और कावड़ यात्रा का पूरा सच!

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Baidyanath Dham: आखिर क्यों लंकापति रावण ने शिवलिंग पर अर्पित किए अपने नौ कटे हुए शीश? पौराणिक कथा के अनुसार जब कठोर तपस्या के बाद भी शिव जी प्रकट नहीं हुए, तो रावण ने अपनी भक्ति का चरम रूप दिखाया। आइये जाने यह अद्भुत कथा..

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  • Publish Date - August 5, 2026 / 06:54 PM IST,
    Updated On - August 5, 2026 / 07:00 PM IST

Baidyanath Dham/Image Credit: ScreenGrab / AI Generated / @Grok

HIGHLIGHTS
  • जानिए क्यों और कैसे भोलेनाथ का नाम पड़ा 'बैद्यनाथ'!
  • क्या सच में लंकापति रावण ने शिवलिंग पर अर्पित किए अपने नौ कटे हुए शीश?

Baidyanath Dham: सावन (श्रावण) मास शिव भक्तों के लिए बहुत ही ख़ास होता है। महादेव के परम भक्तों में से एक था दशानन रावण। दस शीश होने के कारण उन्हें दशानन कहा जाता है। लेकिन, क्या आप इस रहस्य से वाकिफ हैं कि लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक-एक करके अपने नौ सिर काटकर शिवलिंग पर अर्पित कर दिए थे? आइये इस कथा को विस्तार से जानते हैं..

Sawan 2026: बैद्यनाथ धाम की पौराणिक कथा!

रावण लंका का एक बहुत शक्तिशाली राजा और भगवान शिव का परम भक्त था। त्रेता युग में रावण ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर कठोर तपस्या की। कई वर्षों तक तपस्या करने के बाद भी जब शिव प्रकट नहीं हुए तो रावण ने अपनी भक्ति की हद पार कर दी। उन्होंने एक-एक करके अपने नौ सिर काटकर शिवलिंग पर अर्पित कर दिए, जब वह अपना दसवां सिर काटने ही वाले थे किभगवान शिव वहां प्रकट हो गए।

भगवान शिव ने रावण के कटे हुए सिरों को वापस जोड़ दिया और एक वैद्य की भांति उसके घावों को पूरी तरह ठीक कर दिया, इसलिए भगवान शिव का नाम “बैद्यनाथ पड़ा, जिसका अर्थ है “वैद्यों के स्वामी”। इसके बाद शिव जी ने रावण से वरदान मांगने के लिए कहा। रावण ने अपनी इच्छा जताते हुए कहा कि वह उस शिवलिंग को लंका ले जाना चाहता है, ताकि शिव सदा के लिए उसके साथ रहे और उसकी रक्षा करें। भगवान शिव ने रावण की बात मान ली, लेकिन एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि रास्ते में शिवलिंग को कभी ज़मीन पर मत रखना। अगर कहीं रख दिया, तो वह वहीं स्थापित हो जाएगा और फिर उसे हिलाया नहीं जा सकेगा।

रावण ख़ुशी-ख़ुशी लंका की ओर चल पड़ता है। दूसरी ओर, देवताओं को यह चिंता सताने लगती है कि अगर रावण, शिव जी को लंका ले गया, तो वह और ज्यादा शक्तिशाली हो जाएगा। तब भगवान विष्णु जी की मदद से वरुण देव ने रावण के पेट में समां गए, जिससे उन्हें जोरों की लघुशंका (यूरिन) महसूस होने लगी।

रावण ने रास्ते में एक चरवाहे को देखा और उसे शिवलिंग थमा कर खुद शौच के लिए चले गए। चरवाहा, शिवलिंग का भार सहन नहीं कर पाया और उसने शिवलिंग को धरती पर रख दिया। लौटने पर रावण ने शिवलिंग को उठाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह अपनी जगह से बिलकुल नहीं हिला। क्रोध में उसने अंगूठे से शिवलिंग को ज़ोर से दबा दिया, जिससे उस पर अंगूठे का निशान पड़ गया। आखिर में मायूस होकर, रावण खाली हाथ लंका चला गया।

इसके बाद भगवान ब्रह्मा, विष्णु और अन्य सभी देवताओं ने वहाँ आकर उस शिवलिंग की पूरी विधि-विधान से पूजा की और उसे ‘बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग’ के नाम से स्थापित किया। यही स्थान आज झारखंड के देवघर स्थित प्रसिद्ध बैद्यनाथ धाम के रूप में जाना जाता है जो 12 ज्योतिलिंगों में से एक है।

Baidyanath dham Jharkhand: कावड़ यात्रा का महत्व!

कावड़ यात्रा को लेकर भी कई मान्यताएँ हैं कहा जाता है कि भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम ने सबसे पहले कावड़ यात्रा शुरू की थी। उन्होंने गढ़मुक्तेस्वर (ब्रजघाट) से गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक किया था, इसी वजह से कुछ लोग उन्हें पहला कावड़िया मानते हैं।

वहीं कावड़ यात्रा को श्रावण कुमार की कथा से भी जोड़ा जाता है जिन्होंने अपने अंधे माता-पिता को कावड़ जैसी डोलियों में बिठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी। यह बात बताती है कि कावड़ यात्रा सिर्फ शिव भक्ति नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और परिवार के प्रति ज़िम्मेदारी का भी संदेश देती है।

Disclaimer:- उपरोक्त लेख में उल्लेखित सभी जानकारियाँ प्रचलित मान्यताओं और धर्म ग्रंथों पर आधारित है। IBC24.in लेख में उल्लेखित किसी भी जानकारी की प्रामाणिकता का दावा नहीं करता है। हमारा उद्देश्य केवल सूचना पँहुचाना है।

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भगवान शिव का नाम 'बैद्यनाथ' क्यों पड़ा?

जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक-एक करके अपने नौ सिर काट कर शिवलिंग पर चढ़ा दिए, तो महादेव उसकी भक्ति से द्रवित हो उठे। उन्होंने एक कुशल वैद्य (डॉक्टर) की भाँति रावण के सभी कटे हुए सिरों को वापस जोड़ दिया और उसके घावों को पूरी तरह ठीक कर दिया। वैद्यों के स्वामी (उपचार करने वाले) होने के कारण ही उनका नाम बैद्यनाथ पड़ा।

रावण शिवलिंग को लंका क्यों नहीं ले जा पाया?

शिव जी ने रावण को शिवलिंग लंका ले जाने की अनुमति तो दी, लेकिन एक शर्त रखी कि रास्ते में इसे कभी धरती पर मत रखना। यदि रख दिया, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा। रास्ते में देवताओं की योजना के कारण रावण को तीव्र लघुशंका लगी। उसने शिवलिंग एक चरवाहे को थमा दिया, जिसने भारी वजन के कारण उसे ज़मीन पर रख दिया और शर्त के अनुसार शिवलिंग वहीं अचल हो गया।

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग पर अंगूठे का निशान क्यों है?

जब रावण वापस लौटा और उसने देखा कि शिवलिंग को धरती पर रख दिया गया है, तो उसने उसे उठाने की अपनी पूरी ताकत लगा दी। जब शिवलिंग अपनी जगह से तस से मस नहीं हुआ, तो रावण को बहुत क्रोध आया। उसने हताशा और गुस्से में अपने अंगूठे से शिवलिंग को नीचे की ओर दबा दिया, जिससे उस पर हमेशा के लिए अंगूठे का गहरा निशान पड़ गया।

इतिहास का सबसे पहला कावड़िया किसे माना जाता है?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को इतिहास का पहला कावड़िया माना जाता है। उन्होंने सबसे पहले गढ़मुक्तेश्वर (ब्रजघाट) से पवित्र गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक किया था।

कावड़ यात्रा का श्रवण कुमार से क्या संबंध है?

कावड़ यात्रा को सिर्फ शिव भक्ति ही नहीं, बल्कि सेवा और परिवार के आदर्शों से भी जोड़ा जाता है। त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कावड़ जैसी डोलियों (बहँगी) में बिठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी। यही कारण है कि कावड़ उठाना माता-पिता के प्रति अटूट सेवा, समर्पण और संस्कारों का भी प्रतीक है।