नेपाल त्रासदी के बाद हजारों लोग अस्थायी आश्रय स्थलों पर रहने को मजबूर

नेपाल त्रासदी के बाद हजारों लोग अस्थायी आश्रय स्थलों पर रहने को मजबूर

नेपाल त्रासदी के बाद हजारों लोग अस्थायी आश्रय स्थलों पर रहने को मजबूर
Modified Date: August 30, 2026 / 07:45 pm IST
Published Date: August 30, 2026 7:45 pm IST

नुवाकोट (नेपाल), 30 अगस्त (भाषा) नेपाल में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ में जान बचाने में सफल रहे हजारों लोगों की मुश्किलें खत्म नहीं हुई है और उन्हें अस्थायी आश्रय शिविरों में रहना पड़ रहा है, जहां दवाओं और बुनियादी चीजों का घोर अभाव है।

स्थानीय मीडिया ने एक सरकारी रिपोर्ट के हवाले से खबर दी कि रसुवा में तीन और नुवाकोट में 15 राहत शिविर स्थापित किये गए हैं, जबकि लगभग 3,500 विस्थापित लोगों के लिए विद्यालयों और सार्वजनिक एवं सामुदायिक भवनों में ठहरने की अस्थायी व्यवस्था की गई है।

भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने उत्तरी और मध्य नेपाल में भारी तबाही मचाई है। रविवार तक मरने वालों की संख्या 750 के पार पहुंच गई है, जबकि 2,500 से अधिक लोग अब भी लापता हैं।

बचावकर्मी रुक-रुककर हो रही बारिश और नदी का जलस्तर बढ़ने की आशंकाओं के बीच कीचड़ और मलबे में लोगों की तलाश कर रहे हैं, जबकि परिवार अपने लापता रिश्तेदारों की तलाश में अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं।

विस्थापन का स्तर स्थानीय आंकड़ों से स्पष्ट हो रहा है।

‘द काठमांडू पोस्ट’ ने नेपाल पुलिस के हवाले से खबर दी है कि शनिवार को नुवाकोट में स्थापित नौ आश्रय केंद्रों में लगभग एक हजार विस्थापित लोग रह रहे थे।

अखबार की खबर के अनुसार, नुवाकोट के अलावा त्रिशूली अस्पताल के आसपास बने तीन अस्थायी राहत केंद्रों में लगभग 1,000 लोग रह रहे हैं। ये शिविर भैरंग उच्च माध्यमिक स्कूल, एक कवर्ड हॉल और बेथन एकेडमी में स्थापित किये गए हैं।

‘द काठमांडू पोस्ट’ की खबर के मुताबिक, इन शिविरों में गर्भवती महिलाओं, हाल ही में मां बनी महिलाओं और चिकित्सा देखभाल की जरूरत समेत कई तरह की आवश्यकता वाले लोगों को आश्रय दिया जा रहा है, लेकिन आश्रय शिविरों में स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई की कमी है, तथा चिकित्सकों ने चेतावनी दी है कि भीड़-भाड़ वाली जगहों पर बीमारी का खतरा बढ़ सकता है।

कोलानी के एक शिविर में, कोपिला परियार अपनी 62-साल की मां की देखभाल कर रही हैं, जो दमा की मरीज हैं और उन्हें नियमित रूप से दवा की जरूरत होती है।

परियार ने ‘द काठमांडू पोस्ट’ को अपनी मां की दवाइयों के बारे में बताते हुए कहा, ‘‘हम वे सभी दवाइयां नहीं ला पाए।’’ उन्होंने बताया कि परिवार के पास न तो पैसे हैं और न ही कपड़े, और शिविर में पीने का पानी भी नहीं है।

अखबार के मुताबिक, बाढ़ के बाद लापता लोगों में परियार का 16 साल का भाई अविनाश और 43 साल की भाभी शांति भी शामिल हैं।

खबर के मुताबिक, पेयजल की किल्लत केवल शिविरों तक ही सीमित नहीं है। बाढ़ की वजह से वह नहर क्षतिग्रस्त हो गई है जिससे त्रिशूली अस्पताल और आसपास की बस्तियों को पेयजल की आपूर्ति की जाती थी, जबकि तुपचे से गुज़रने वाली एक और पाइपलाइन भी बह गई है।

अखबार ने बताया कि पेयजल की व्यवस्था बाधित होने से स्थानीय लोगों और विस्थापितों को दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। अस्पताल के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि भीड़भाड़ वाले आश्रय शिविरों में साफ-सफाई की कमी और दूषित पानी से बीमारी का खतरा बढ़ सकता है।

रसुवा में सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचों के नष्ट होने से राहत कार्य चुनौतीपूर्ण बन गए हैं।

‘काठमांडू पोस्ट’ की खबर के मुताबिक, एक ग्रामपालिका में स्थापित चार आश्रय शिविरों में करीब 750 लोगों ने आश्रय लिया है, जिन्हें भोजन आदि की सुविधाएं दी जा रही हैं।

अखबार के मुताबिक, स्थानीय सरकारी कर्मचारी खुद भी विस्थापित निवासियों के साथ आश्रय शिविरों में रह रहे हैं और अपना कर्तव्य निर्वहन कर रहे हैं।

काठमांडू के बाहरी इलाके में स्थित एक बौद्ध मठ उन लगभग 500 लोगों को अस्थायी आश्रय दे रहा है, जो बुधवार को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास रासुवा जिले में आई अचानक बाढ़ से बेघर हो गए हैं।

मठ प्रबंधन समिति के अनुसार, स्वयंभू-सानोभर्यांग इलाके में स्थित ‘येलो मॉनेस्ट्री’ में अभी गोसाईकुंडा ग्रामपालिका के लोगों को आश्रय दिया जा रहा है, जिनमें अधिकतर तमांग और शेरपा समुदाय से संबंधित हैं।

समिति ने बताया कि मठ विस्थापित लोगों को नि:शुल्क नाश्ता और दोपहर एवं रात का खाना उपलब्ध करा रहा है, लेकिन यह आश्रय शिविर एक अस्थायी व्यवस्था है और विस्थापित लोगों को लंबे समय तक रहने की जगह और दूसरी मदद नहीं दे सकता।

मठ में आश्रय लिये कई लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि उनका भविष्य क्या होगा, क्योंकि उनके मकान मलबे में दबे हैं।

हालांकि, शिविरों में रह रहे लोगों के लिए अब चुनौती केवल बाढ़ से बचना नहीं है, बल्कि पर्याप्त भोजन और साफ पानी, जरूरी दवाइयां प्राप्त करना, लापता रिश्तेदारों का पता लगाना और ऐसी जगह ढूंढ़ना है जो हालात सामान्य होने तक घर का काम कर सके।

भाषा धीरज सुरेश

सुरेश


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