ट्रंप ने उत्सर्जन से निपटने संबंधी पुराने कानूनी आधार को समाप्त किया
ट्रंप ने उत्सर्जन से निपटने संबंधी पुराने कानूनी आधार को समाप्त किया
(रॉबिन एकर्सले, मेलबर्न विश्वविद्यालय)
मेलबर्न, 16 फरवरी (द कन्वरसेशन) जलवायु उत्सर्जन को नियंत्रित करना अब और भी मुश्किल हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बृहस्पतिवार को घोषणा की कि पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) ने 2009 के अपने उस कानूनी निष्कर्ष को रद्द कर दिया है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से मानव स्वास्थ्य को खतरा है।
साल 2007 में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से पुष्टि प्राप्त होने और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर तैयार किए गए ईपीए के इस तथाकथित ‘खतरे संबंधी निष्कर्ष’ ने संघीय सरकार को ग्रीनहाउस गैसों के विनियमन का कानूनी आधार प्रदान किया था।
इसी निष्कर्ष के आधार पर ओबामा प्रशासन की ‘क्लीन पावर प्लान’ नीति तैयार की गई, जिसके तहत बिजली संयंत्रों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रित किया गया। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने इसे कमजोर करने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में बाइडन प्रशासन ने इसका एक नया संस्करण लागू किया।
‘खतरे की आशंका संबंधी निष्कर्षों’ के अभाव में और जब तक कांग्रेस के दोनों सदनों द्वारा कोई नया कानून पारित नहीं किया जाता तब तक संघीय सरकार के पास ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के सीधे नियमन का कानूनी अधिकार नहीं रहता। विज्ञान नहीं बदला है, लेकिन उस पर कार्रवाई करने की बाध्यता को समाप्त कर दिया गया है।
यदि आप अमेरिका की कल्पना ग्रीनहाउस गैस से भरे बड़े-बड़े बर्तनों के एक समूह के रूप में करें, जिन पर ढक्कन लगे हों, तो ट्रंप प्रशासन उन ढक्कनों को एक-एक कर हटाता हुआ दिखाई देता है। जीवाश्म ईंधनों के उत्खनन, उत्पादन और खपत को बढ़ाकर वह अधिक उत्सर्जन को वातावरण में छोड़ रहा है।
खतरे का निष्कर्ष क्या है और इसे कैसे तैयार किया गया था?
1970 में, जब अमेरिका में पर्यावरण आंदोलन अपने सबसे प्रभावशाली दौर में था, तब कांग्रेस ने एक महत्वपूर्ण कानून पारित किया, जिसे ‘क्लीन एयर एक्ट’ कहा गया। इस कानून ने नवगठित पर्यावरण संरक्षण एजेंसी को यह अधिकार दिया कि यदि कोई तत्व सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा साबित होता है, तो उसे प्रदूषक घोषित किया जा सकता है। शुरुआत में इस कानून का उपयोग धुंध (स्मॉग) या कोयले की राख जैसे औद्योगिक उप-उत्पादों को नियंत्रित करने के लिए किया गया, जो उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषक थे।
जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान, पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) ने यह निर्णय दिया कि ग्रीनहाउस गैस भी ‘क्लीन एयर एक्ट’ के तहत प्रदूषक की श्रेणी में आती हैं।
इस निर्णय को 2007 में चुनौती दी गई। हालांकि, अदालत ने पांच बनाम चार न्यायाधीशों के बहुमत से यह फैसला सुनाया कि कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैस “वायु प्रदूषक” हैं, जो मानव स्वास्थ्य और कल्याण के लिए खतरा उत्पन्न करती हैं।
अदालत ने ईपीए को इनके प्रभाव का आकलन करने का निर्देश दिया – जिससे एजेंसी को इन्हें विनियमित करने का अधिकार मिल गया।
हालांकि, बुश प्रशासन ने इस फैसले को लागू करने के लिए ईपीए पर जोर नहीं डाला।
खतरे संबंधी निष्कर्षों का जलवायु कार्रवाई में कैसे उपयोग हुआ?
बराक ओबामा ने चुनाव अभियान के दौरान जलवायु परिवर्तन पर ठोस कार्रवाई का वादा किया था। लेकिन सत्ता संभालने के बाद उन्हें सीनेट में कड़ा विरोध झेलना पड़ा। उत्सर्जन व्यापार विधेयक पारित कराने के उनके प्रयास विफल हो गए।
हालांकि निष्कर्षों ने उन्हें अपनी कार्यकारी शक्तियों का उपयोग करते हुए पर्यावरण संरक्षण एजेंसी को उत्सर्जन को नियंत्रित करने का निर्देश देने की अनुमति दी।
अपने पहले कार्यकाल में, ईपीए ने कारों और हल्के ट्रकों के लिए नए वाहन उत्सर्जन नियम जारी किए, साथ ही कुछ बिजली संयंत्रों और रिफाइनरियों के लिए भी नए मानक लागू किए।
अपने दूसरे कार्यकाल में ओबामा ने इन नियमों का विस्तार करते हुए उन्हें सभी बिजली संयंत्रों पर लागू कर दिया। ये कदम अमेरिका द्वारा उत्सर्जन में कटौती की दिशा में उठाए गए पहले महत्वपूर्ण प्रयासों का प्रतिनिधित्व करते थे।
इन पहलों से 2015 में पेरिस समझौते के लिए हुई वार्ताओं में ओबामा की कूटनीतिक विश्वसनीयता मजबूत हुई। इससे स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में चीन के साथ द्विपक्षीय सहयोग के लिए आधार तैयार हुआ और दुनिया के दो सबसे बड़े उत्सर्जक देशों के बीच कूटनीतिक विश्वास को बढ़ाने में मदद मिली।
अंतिम चरण की वार्ताओं में दोनों देशों के प्रमुख वार्ताकारों ने मिलकर काम किया, ताकि पेरिस समझौते को अंतिम रूप दिया जा सके और उसे सफलतापूर्वक पारित कराया जा सके।
ट्रंप ने इसे क्यों पलट दिया? 12 फरवरी को ट्रंप ने घोषणा की कि ईपीए उस कानूनी निष्कर्ष को रद्द करेगा, जिस पर वह लगभग 20 वर्षों से निर्भर रहा है।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ‘डी-कार्बोनाइज’ करने (कार्बन उत्सर्जन घटाने) के प्रयासों पर ट्रंप द्वारा किए गए तमाम प्रहारों में यह सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है।
ट्रंप का दावा है कि यह कानूनी निष्कर्ष अमेरिकी नागरिकों के हितों को नुकसान पहुंचाता है। वहीं, ट्रंप द्वारा नियुक्त ईपीए प्रमुख ली जेलडिन ने इस नियम को अहम करार दिया।
ट्रंप ने बृहस्पतिवार को मीडिया से कहा, ‘‘ इस निर्णय का तथ्यों में कोई आधार नहीं था..और इसका कानून में भी कोई आधार नहीं था। इसके विपरीत, पीढ़ियों से जीवाश्म ईंधनों ने लाखों लोगों की जान बचाई है और दुनिया भर में अरबों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है।’’
लेकिन यदि उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए संघीय स्तर पर कार्रवाई नहीं की गई, तो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और अधिक गंभीर होते जाएंगे। पेरिस समझौते के लक्ष्यों और सिद्धांतों को हासिल करने के संदर्भ में अमेरिका को “अनिवार्य देश” माना जाता है।
हालांकि, चीन का वार्षिक कुल उत्सर्जन अमेरिका की तुलना में कहीं अधिक है, लेकिन अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा ऐतिहासिक उत्सर्जक रहा है। इसी लिए अब तक हो हुई वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल हीटिंग) के लिए उसे अधिक जिम्मेदार माना जाता है।
फिर भी ट्रंप प्रशासन जलवायु परिवर्तन को एक छलावे के रूप में देखता है। ट्रंप ने अमेरिका को न केवल पेरिस समझौते से, बल्कि संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (यूएनएफसीसीसी) से भी बाहर कर लिया है।
संक्षेप में कहें तो, अमेरिका अब सक्रिय रूप से वैश्विक तापवृद्धि की आग को और भड़का रहा है।
आगे क्या? इस कदम को निश्चित रूप से अदालतों में चुनौतियों मिलेंगी, और इन मामलों का समाधान जल्दी होने की संभावना नहीं है।
ली ज़ेल्डिन और ट्रंप को पर्यावरण समूहों तथा गैर-सरकारी संगठनों सहित अनेक याचिकाकर्ताओं का सामना करना पड़ेगा। संभावना है कि ट्रंप प्रशासन इन कानूनी चुनौतियों की परवाह किए बिना अपने “ड्रिल, बेबी, ड्रिल” नारे के साथ आगे बढ़ता रहेगा, यानी तेल और गैस के उत्खनन को और तेज करेगा।
(द कन्वरसेशन) शोभना नेत्रपाल
नेत्रपाल

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