हमें सुरक्षा परिषद में सुधार करना होगा: गुतारेस का संयुक्त राष्ट्र महासभा में आखिरी संबोधन

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हमें सुरक्षा परिषद में सुधार करना होगा: गुतारेस का संयुक्त राष्ट्र महासभा में आखिरी संबोधन

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  • Publish Date - September 22, 2026 / 08:53 PM IST,
    Updated On - September 22, 2026 / 08:53 PM IST

(योषिता सिंह)

संयुक्त राष्ट्र, 22 सितंबर (भाषा) संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने मंगलवार को विश्व भर के नेताओं से सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार करने की जोरदार अपील की, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि परिषद मौजूदा दुनिया का प्रतिनिधित्व करे और वर्तमान भू-राजनीतिक चुनौतियों से निपट सके।

यह संयुक्त राष्ट्र प्रमुख के लिए महासभा का आखिरी उच्च स्तरीय हफ्ता है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख के तौर पर उनका पांच साल का दूसरा कार्यकाल दिसंबर 2026 में खत्म होने वाला है।

गुतारेस ने मंगलवार को महासभा के 81वें सत्र में आम चर्चा की शुरुआत होने पर विश्व के नेताओं को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘हमें सुरक्षा परिषद में भी सुधार करना चाहिए ताकि यह आज की दुनिया को उस वैधता और प्रभावशीलता के साथ दिखाए, जिसकी मौजूदा समय की चुनौतियों के लिए जरूरत है।’’

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख के तौर महासभा की उच्चस्तरीय चर्चा में अपना आखिरी भाषण देते हुए गुतारेस ने कहा कि सुरक्षा परिषद को दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनाया गया था। ‘‘लेकिन तब से दुनिया में काफी बदलाव आए हैं। ऐसे बदलाव जिनकी झलक सुरक्षा परिषद में बिल्कुल नहीं दिखती।’’

उन्होंने कहा कि इसका ‘‘सबसे चौंकाने वाला उदाहरण’’ अफ्रीका है।

गुतारेस ने कहा, ‘‘जब संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ था, तब अफ्रीका का ज़्यादातर हिस्सा औपनिवेशिक शासन के अधीन था। आज भी, सुरक्षा परिषद में अफ्रीका के पास कोई स्थायी सीट नहीं है। 21वीं सदी की सुरक्षा परिषद में अफ्रीका का स्थायी प्रतिनिधित्व न होना अन्यायपूर्ण और अनुचित है। इसे बदलना ही होगा।’’ संयुक्त राष्ट्र महासभा हॉल में मौजूद नेताओं ने तालियों से उनकी बात का समर्थन किया।

लगभग 35 मिनट के अपने आखिरी संबोधन को खत्म करने के बाद, जब गुतारेस मंच से नीचे उतरे, तो दुनिया भर के नेताओं, विदेश मंत्रियों, राजदूतों, राजनयिकों और संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारियों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया।

उन्होंने कहा, ‘‘हमारी संस्थाएं और वैश्विक शासन की प्रणालियां आज भी काफी हद तक बीते हुए दौर की वास्तविकताओं और हितों को ही दर्शाती हैं। यही हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे समय में जब मानवता को एक साथ कई अभूतपूर्व खतरों का सामना करना पड़ रहा है, सामूहिक कार्रवाई के हमारे तंत्र पर दबाव बढ़ता जा रहा है।’’

गुतारेस की ओर से 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग उनकी सबसे मजबूत मांगों में से एक है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की यह शक्तिशाली परिषद गहरे मतभेदों और ध्रुवीकरण की गिरफ्त में है और संघर्षों को रोकने तथा अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में नाकाम रहा है।

चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका – सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देश हैं। वीटो-शक्ति रखने वाले इन पांच सदस्यों के बीच गहरे मतभेदों के कारण, गाजा से लेकर रूस तक जारी संघर्षों के बीच सुरक्षा परिषद बेअसर रही है।

भारत सुरक्षा परिषद में सुधार की कई वर्षों से जारी कोशिशों में सबसे आगे रहा है। इन कोशिशों में परिषद की स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों का विस्तार करना शामिल है। भारत का कहना है कि 1945 में बनी 15 देशों वाली यह परिषद 21वीं सदी की जरूरतों के लिहाज से उपयुक्त नहीं रह गई है और आज की भू-राजनीतिक वास्तविकता को नहीं प्रदर्शित करती है।

नयी दिल्ली ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट की वाजिब हकदार है। भारत 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट पाने की कोशिश कर रहा है, जिसके लिए अगले साल जून में चुनाव होंगे।

संयुक्त राष्ट्र महासभा हॉल में एकत्र दुनिया भर के नेताओं को संबोधित करते हुए, गुतारेस ने भू-राजनीतिक मतभेदों के बढ़ने, असमानताओं के गहराने और विश्वास में कमी आने पर चिंता जताई।

उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब आर्थिक, राजनीतिक और प्रौद्योगिकी प्रभाव के नये केंद्र उभरे हैं और मानव तेजी से मशीनों को जिम्मेदारियां सौंप रहे हैं, ‘‘हमारे संस्थान और वैश्विक शासन की प्रणालियां अब भी काफी हद तक बीते हुए दौर की ताकतों की वास्तविकताओं और हितों को ही दर्शाती हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमारे सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे समय में जब मानवता को एक साथ कई तरह के अभूतपूर्व खतरों का सामना करना पड़ रहा है, सामूहिक कार्रवाई के हमारे तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है।’’

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि ‘‘हम स्पष्ट तौर पर एक बहुध्रुवीय विश्व की ओर बढ़ रहे हैं। और यह बदलाव ऐसा है जिसे पलटा नहीं जा सकता।’’ हालांकि उन्होंने आगाह किया कि बहुध्रुवीयता कई अलग-अलग तरीकों से आकार ले सकती है।

भाषा सुभाष दिलीप

दिलीप