डॉली भेड़ के जन्म के 30 साल बाद ‘क्लोनिंग’ प्रौद्योगिकी अब कहां पहुंची?
डॉली भेड़ के जन्म के 30 साल बाद ‘क्लोनिंग’ प्रौद्योगिकी अब कहां पहुंची?
( सथाना दुष्यन्तेन, मेलबर्न विश्वविद्यालय )
मेलबर्न, आठ जुलाई (द कन्वरसेशन) ‘क्लोनिंग’ प्रौद्योगिकी की सहायता से आज से 30 साल पहले जब डॉली भेड़ का जन्म हुआ था, तब वह विज्ञान के सबसे चर्चित प्रयोगों में से एक बन गई थी।
इस भेड़ के जन्म ने विज्ञान कथानक में भविष्य की ऐसी उम्मीदें जगाईं जहां पालतू जानवरों, इंसानों और यहां तक कि ‘वुली मैमथ’ जैसे विलुप्त हो चुके जानवरों के क्लोन बनाकर उन्हें फिर से जिंदा करने की कल्पना ने जन्म लिया। हालांकि, ‘क्लोनिंग’ की वास्तविकता इन कल्पनाओं की तुलना में कहीं अधिक जटिल साबित हुई है।
आज ‘क्लोनिंग’ महज ‘‘कॉपी और पेस्ट’’ करके किसी जीव के ‘क्लोन’ को तैयार करने की प्रौद्योगिकी नहीं है, जबकि यह जैव-प्रौद्योगिकी के कई महत्वपूर्ण साधनों में से एक बन चुकी है।
यह प्रौद्योगिकी वैज्ञानिकों को बीमारियों को बेहतर ढंग से समझने, जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों को मजबूत करने और जीवों में बदलाव के नए तरीके विकसित करने में मदद कर रही है।
‘क्लोनिंग’ वास्तव में कैसे काम करती है?
अधिकतर पशुओं की क्लोनिंग ‘सोमैटिक सेल न्यूक्लियर ट्रांसफर’ नामक तकनीक से की जाती है। इसमें किसी जानवर के शरीर से एक गैर-प्रजनन कोशिका (यानी शुक्राणु या अंडाणु नहीं) ली जाती है और उसकी कोशिका के ‘न्यूक्लियस’ को निकाल लिया जाता है जिसमें डीएनए मौजूद होता है। डॉली के मामले में यह कोशिका उसके स्तन ग्रंथि (मैमरी ग्लैंड) से ली गई थी।
इसके बाद दूसरे जानवर के अंडाशय से एक अंडाणु लिया जाता है और उसका भी ‘न्यूक्लियस’ निकाल दिया जाता है। फिर पहली कोशिका के ‘न्यूक्लियस’ को विद्युत स्पंदन की मदद से उस अंडाणु में डाल दिया जाता है। जब यह संयुक्त अंडाणु भ्रूण के रूप में विकसित होने लगता है तब उसे एक ‘सरोगेट’ पशु के गर्भाशय में प्रतिरोपित कर दिया जाता है।
इस प्रक्रिया से पैदा होने वाले जीव का डीएनए मूल दाता जीव से लगभग पूरी तरह मेल खाता है।
तीन दशक बाद भी क्लोनिंग कठिन क्यों बनी हुई है?
प्रौद्योगिकी में काफी प्रगति के बावजूद पशुओं की ‘क्लोनिंग’ अब भी उतनी सफल नहीं है। एक सफल ‘क्लोन’ तैयार करने के लिए कई पुनर्निर्मित भ्रूण विकसित होने से पहले ही नष्ट हो जाते हैं। उदाहरण के लिए डॉली को बनाने में 277 प्रयास करने पड़े थे।
‘क्लोनिंग’ पर हुए अनुसंधान से यह भी स्पष्ट हुआ कि विशिष्ट कोशिकाएं हमेशा के लिए एक जैसी नहीं रहतीं। उन्हें जैविक स्तर पर दोबारा ‘‘रीराइट’’ यानी पुनः प्रोग्राम किया जा सकता है।
आज क्लोनिंग का उपयोग कहां-कहां हो रहा है?
पशुपालन उद्योग के कुछ क्षेत्रों में ‘क्लोनिंग’ का इस्तेमाल ऐसे जानवरों की संख्या बढ़ाने के लिए किया जाता है, जिनमें बेहतर अनुवांशिक गुण, अधिक उत्पादन क्षमता या रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधक क्षमता होती है।
हालांकि, ‘क्लोनिंग’ पारंपरिक प्रजनन पद्धतियों का विकल्प नहीं बन रही है। इसका उद्देश्य केवल पहले से उत्कृष्ट माने जाने वाले जानवरों की हूबहू आनुवंशिक प्रतिकृति तैयार करना है। ऑस्ट्रेलिया में फिलहाल घोड़ों की ‘क्लोनिंग’ संभव है और ऐसे कई क्लोन घोड़े दुनिया भर की घुड़सवारी प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके हैं।
साल 2024 में चीन के अनुसंधानकर्ताओं ने पहली बार ‘रीसस’ प्रजाति के बंदर का क्लोन तैयार किया। इंसानों से इसकी शारीरिक समानता के कारण उम्मीद जताई गई कि इससे दवाओं के परीक्षण की प्रक्रिया तेज हो सकेगी। लेकिन पशु कल्याण से जुड़े संगठनों ने इन प्रयोगों पर गंभीर नैतिक सवाल उठाए।
लुप्तप्राय प्रजातियों की संख्या बढ़ाने के लिए ‘क्लोनिंग’ का उपयोग इसके सबसे आशाजनक प्रयोगों में से एक माना जा रहा है।
क्या क्लोनिंग से विलुप्त जीवों को वापस लाया जा सकता है?
विलुप्त हो चुके जीवों को दोबारा जीवित करने का विचार लंबे समय से लोगों की कल्पनाओं को आकर्षित करता रहा है, लेकिन वैज्ञानिक वास्तविकता कहीं अधिक कठिन है।
किसी वास्तविक क्लोन के लिए पूरा और सुरक्षित जीनोम, उपयुक्त अंडाणु और उससे निकट संबंध रखने वाली सरोगेट प्रजाति की आवश्यकता होती है। हजारों वर्ष पहले विलुप्त हो चुके जीवों, जैसे वुली मैमथ के मामले में यह संभव नहीं है, क्योंकि इतना पुराना डीएनए आमतौर पर क्षतिग्रस्त हो चुका होता है।
इसी कारण वैज्ञानिक अब ‘डी-एक्सटिंक्शन’ यानी विलुप्त प्रजातियों को वापस लाने के ऐसे तरीकों पर काम कर रहे हैं, जिनमें प्राचीन डीएनए के अध्ययन को ‘क्रिस्पर’ जैसी जीन-संपादन तकनीकों के साथ जोड़ा जाता है।
‘क्लोनिंग’ लुप्तप्राय प्रजातियों में खो चुके जीन को वापस लाने में मदद कर सकती है लेकिन यदि बहुत अधिक अनुवांशिक रूप से समान जीव पैदा किए गए तो उनमें बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है।
मानव क्लोनिंग अब भी क्यों संभव नहीं है?
दशकों से जारी चर्चाओं के बावजूद मानव ‘क्लोनिंग’ आज भी वास्तविकता नहीं बन सकी है। इसकी सबसे बड़ी वजह सुरक्षा है।
इसके अलावा, इससे पहचान, सहमति और मानव ऊतकों तथा प्रजनन तकनीकों के संभावित दुरुपयोग जैसे गंभीर नैतिक प्रश्न भी जुड़े हैं। इन्हीं कारणों से ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों में प्रजनन के उद्देश्य से मानव ‘क्लोनिंग’ पर प्रतिबंध है या उस पर कड़े कानूनी प्रतिबंध लगाए गए हैं।
डॉली के जन्म के 30 वर्षों में उसकी ‘क्लोनिंग’ से मिली वैज्ञानिक समझ ने बीमारी संबंधी शोध, कृषि और जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया है।
फिर भी ‘क्लोनिंग’ आज भी एक जटिल तकनीक बनी हुई है और इससे सुरक्षा, नियमन तथा यह सवाल लगातार जुड़े हुए हैं कि इसके कुछ प्रयोगों को आगे बढ़ाया भी जाना चाहिए या नहीं।
द कन्वरसेशन सुरभि मनीषा
मनीषा

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