किसी विदेशी भाषा में सच्चे मन से माफ़ी मांगना इतना मुश्किल क्यों है?

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किसी विदेशी भाषा में सच्चे मन से माफ़ी मांगना इतना मुश्किल क्यों है?

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  • Publish Date - August 29, 2026 / 03:59 PM IST,
    Updated On - August 29, 2026 / 03:59 PM IST

(इरिनी मावरौ, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और लूसिया मार्टिन पेरेज, नेब्रिजा विश्वविद्यालय)

लंदन, 29 अगस्त (द कन्वरसेशन) जब लोग माफी मांगते हैं, तो वे केवल अपनी गलती स्वीकार नहीं कर रहे होते। वे यह भी जाहिर करते हैं कि वे जिम्मेदारी, नैतिकता, सामाजिक और नैतिक मानदंडों तथा दूसरों के साथ अपने संबंधों को किस तरह समझते हैं। ये सभी बातें अलग-अलग सांस्कृतिक परिवेश में काफी भिन्न हो सकती हैं।

विदेशी भाषा में माफी मांगने पर हमें होने वाला अपराधबोध और शर्म का एहसास अलग हो सकता है। हालांकि, माफी मांगना संवाद का बेहद जटिल रूप है और इसे केवल उन शब्दों से नहीं समझा जा सकता, जिनका हम इस्तेमाल करते हैं।

एक ही संस्कृति के भीतर भी लोग अलग-अलग हालात में अलग-अलग तरह से माफी मांगते हैं। उदाहरण के लिए, समयसीमा तक काम पूरा नहीं कर पाने पर किसी विद्यार्थी को अपने प्रोफेसर से माफी मांगनी हो तो केवल “माफ कीजिए” कहना पर्याप्त नहीं होगा। उसे समयसीमा चूकने की बात स्वीकार करनी होगी, अपनी गलती की जिम्मेदारी लेनी होगी और प्रोफेसर-विद्यार्थी के संबंध को ध्यान में रखते हुए सम्मानपूर्वक अपनी बात रखनी होगी।

चाहे माफी जीवनसाथी से मांगी जाए, दोस्त से, सहकर्मी से या किसी अजनबी से-हर स्थिति के अपने कुछ अनकहे नियम और अपेक्षाएं होती हैं।

माफी मांगने के तरीके को प्रभावित करने वाले कारक भी बहुत से हैं, लेकिन सामाजिक हैसियत, आपसी दूरी और गलती की गंभीरता इनमें खासतौर पर महत्वपूर्ण हैं। अक्सर यही तय करते हैं कि अलग-अलग संस्कृतियों में लोग माफी किस तरह मांगते हैं। इसलिए माफी का अर्थ महज “मुझे माफ कर दीजिए” कह देने से कहीं ज्यादा गहरा है।

अपराधबोध और शर्म एक जैसे नहीं होते

अपराधबोध और शर्म को अक्सर एक ही अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन दोनों का प्रभाव अलग होता है। अपराधबोध कहता है— “मैंने कुछ गलत किया है।” जबकि शर्म कहती है— “मुझमें ही कुछ गलत है।”

यह अंतर महत्वपूर्ण है। अपराधबोध अक्सर व्यक्ति को नुकसान की भरपाई के लिए प्रेरित करता है। वह माफी मांगता है, अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है या गलती सुधारने की कोशिश करता है। इसके विपरीत, शर्म का प्रभाव उलटा हो सकता है। व्यक्ति स्थिति से दूर भागने, उससे बचने या चुप रहने का रास्ता अपना सकता है।

इसमें संस्कृति की भी बड़ी भूमिका होती है। कुछ यूरोपीय और अमेरिकी समाज की व्यक्तिवादी संस्कृतियों में अपराधबोध पर अपेक्षाकृत अधिक जोर दिया जाता है। वहीं पूर्वी एशिया जैसे कई समाजों की सामूहिकतावादी संस्कृतियों में समूह की एकजुटता और सामाजिक मूल्यांकन अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में शर्म का सामाजिक प्रभाव अधिक गहरा हो सकता है।

अपराधबोध और शर्म की भावना तब पैदा हो सकती है, जब हमें लगता है कि हमने समाज में स्वीकार्य किसी सीमा का उल्लंघन किया है। यही वजह है कि माफी मांगने की प्रक्रिया में इन दोनों भावनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

कोरियाई और स्पेनिश भाषाओं में माफी मांगने का तरीका अलग

हाल में किए गए एक अध्ययन में हमने यह जानने की कोशिश की कि लोग अपनी मूल और दूसरी भाषा में किस तरह माफी मांगते हैं। इसके लिए हमने स्पेनिश सीख रहे कोरियाई लोगों और कोरियाई सीख रहे स्पेनिश भाषी लोगों पर ध्यान केंद्रित किया।

अध्ययन में 115 लोगों ने हिस्सा लिया। सभी प्रतिभागियों को अपनी दूसरी भाषा का कम से कम मध्यवर्ती स्तर का ज्ञान था। इनमें से कई लोग स्पेन या कोरिया में रह भी चुके थे।

प्रतिभागियों से विश्वविद्यालय से जुड़ी 12 ऐसी परिस्थितियों पर आधारित ऑनलाइन प्रश्नावली भरवाई गई, जिनमें माफी मांगने की जरूरत पड़ सकती थी। इनमें शिक्षण सत्र में शामिल न होना, किसी से उधार ली गई किताब खो देना या किसी दूसरे विद्यार्थी की बात के बीच में हस्तक्षेप जैसी परिस्थितियां शामिल थीं।

इन परिस्थितियों में सामाजिक हैसियत और आपसी दूरी को अलग-अलग रखा गया था। मसलन, कुछ स्थितियों में प्रतिभागियों को अपने करीबी सहपाठी से माफी मांगनी थी, जबकि कुछ में उन्हें प्रोफेसर या अपने से ऊंचे पद वाले व्यक्ति से माफी मांगनी थी।

प्रतिभागियों ने यह अभ्यास या तो पूरी तरह अपनी पहली भाषा में किया या पूरी तरह दूसरी भाषा में। हर माफी के बाद उन्होंने 10 अंकों के पैमाने पर यह बताया कि ऐसी स्थिति में उनके भीतर अपराधबोध और शर्म की भावना कितनी पैदा होगी। उनसे यह भी कहा गया कि वे उसी तरह जवाब दें, जैसे वास्तविक जीवन में ऐसी स्थिति होने पर देते।

इसके बाद हमने माफी मांगने की अलग-अलग रणनीतियों की पहचान कर उनका विश्लेषण किया। इनमें सीधे माफी मांगना (मुझे माफ कर दीजिए), खुद को दोष देना (गलती मेरी थी), स्पष्टीकरण देना (मैं समयसीमा ठीक से समझ नहीं पाया) और गलती सुधारने की पेशकश करना (मैं किताब की जगह दूसरी किताब दे दूंगा) शामिल थे। पूरे अध्ययन में माफी मांगने की करीब 3,000 अलग-अलग रणनीतियों का विश्लेषण किया गया।

जिम्मेदारी स्वीकार करने के दो अलग तरीके

कोरियाई और स्पेनिश भाषी लोग एक ही तरह से माफी नहीं मांगते।

कोरियाई भाषी लोग अक्सर सीधे तौर पर जिम्मेदारी स्वीकार करते दिखाई दिए। वे “गलती मेरी थी” जैसे वाक्यों का इस्तेमाल करते थे और कई बार खुद की कड़ी आलोचना करने वाली भाषा भी अपनाते थे।

इसके विपरीत, स्पेनिश भाषी लोग जिम्मेदारी को कुछ नरम ढंग से व्यक्त करने की ओर अधिक रुख अपनाते थे। वे अक्सर यह बताते थे कि क्या हुआ, इस बात पर जोर देते थे कि गलती जानबूझकर नहीं हुई या ऐसे वाक्यों का इस्तेमाल करते थे, जैसे “से मे ओल्विदो” (जिसका मोटे तौर पर अर्थ है-यह मेरे ध्यान से निकल गया।)

इसका यह अर्थ नहीं है कि दोनों में से कोई एक समूह दूसरे की तुलना में ज्यादा ईमानदारी से या ज्यादा गंभीरता से माफी मांगता था। इससे केवल यह पता चलता है कि अलग-अलग संस्कृतियां सामाजिक संबंधों में आई दरार को अलग-अलग तरीके से भरने की कोशिश करती हैं।

स्पेनिश संस्कृति में यह काम अक्सर स्पष्टीकरण और आपसी समझ बनाने के जरिये किया जाता है, जबकि कोरियाई संस्कृति में खासकर सामाजिक हैसियत का अंतर होने पर अपनी गलती को अधिक स्पष्ट रूप से स्वीकार करने पर जोर दिया जाता है।

क्या विदेशी भाषा में कम अपराधबोध महसूस होता है?

दूसरी भाषा में बात करने से कभी-कभी भावनात्मक दूरी पैदा हो सकती है। जीवन में बाद में सीखी गई भाषा के शब्द अक्सर घर-परिवार में बचपन से सीखे गए शब्दों की तुलना में कम भावनात्मक असर रखते हैं।

लेकिन हमारे अध्ययन के नतीजे इस धारणा को जटिल बनाते हैं। प्रतिभागियों ने दूसरी भाषा में सामान्य तौर पर पहली भाषा की तुलना में कम अपराधबोध या शर्म महसूस नहीं की। वे दोनों भाषाओं में तीव्र नैतिक भावनाओं का अनुभव करने में सक्षम थे।

अंतर तब दिखाई दिया, जब सामाजिक हैसियत का सवाल सामने आया। जब प्रतिभागियों को प्रोफेसर जैसे अपने से ऊंचे पद वाले व्यक्ति से माफी मांगनी पड़ी तो उनमें अपनी मूल भाषा में अधिक अपराधबोध और शर्म की भावना पैदा हुई।

इससे संकेत मिलता है कि अधिकार, जिम्मेदारी और सामाजिक मानदंडों से जुड़ा भावनात्मक प्रभाव उस भाषा में अधिक गहराई से मौजूद हो सकता है, जिसे हमने बचपन में सीखा है।

भाषा सीखना केवल व्याकरण और शब्दावली सीखना नहीं

भाषा सीखना केवल व्याकरण और शब्दावली सीखने तक सीमित नहीं है। यह इस बात को समझना भी है कि भावनाओं को कैसे व्यक्त किया जाए, अपनी जिम्मेदारी कैसे स्वीकार की जाए और दूसरों के साथ अच्छे सामाजिक संबंध कैसे बनाए रखे जाएं।

भाषा सीखने वाला व्यक्ति यह तो जान सकता है कि “मुझे माफ कर दीजिए” कैसे कहना है, लेकिन वह यह नहीं जानता कि दूसरी संस्कृति में उसकी माफी को किस तरह लिया जाएगा। कहीं वह जरूरत से ज्यादा औपचारिक या बेरुखी भरी तो नहीं लगेगी, या फिर सामने वाले को उसमें पर्याप्त ईमानदारी नजर नहीं आएगी।

इसलिए भाषा शिक्षण में अंतर-सांस्कृतिक व्यवहार-विज्ञान को भी शामिल किया जाना चाहिए, यानी केवल यह नहीं सिखाया जाना चाहिए कि क्या कहना है, बल्कि यह भी कि कैसे कहना है, कब कहना है और उस बात में भावनात्मक गंभीरता कितनी होनी चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय कार्यस्थलों, विश्वविद्यालयों और ऑनलाइन माध्यमों में लोगों को अक्सर माफी मांगनी पड़ती है, लेकिन जो बात किसी व्यक्ति की मूल भाषा में ईमानदार और जिम्मेदारी भरी लगती है, वही दूसरी भाषा में नरम, जरूरत से ज्यादा भावुक या जिम्मेदारी से बचने वाली लग सकती है।

विभिन्न संस्कृतियों में अपराधबोध और शर्म जैसे भावनाओं को व्यक्त करने के तरीकों को समझना अंतर-सांस्कृतिक संवाद में गलतफहमियां कम करने में मदद कर सकता है, खासकर उन परिस्थितियों में जहां सामाजिक हैसियत, अधिकार और सामाजिक अपेक्षाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

द कन्वरसेशन

खारी सुरेश

सुरेश