पटना, 14 अप्रैल (भाषा) बिहार की राजनीति में लंबे समय तक केंद्रीय भूमिका निभाने वाले नीतीश कुमार ने मंगलवार को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर एक ऐसे अध्याय पर विराम लगाया, जिसकी विरासत उपलब्धियों और विवादों के मिश्रण के रूप में देखी जाएगी। खुद को “न्याय के साथ विकास” के सूत्रधार के रूप में स्थापित करने वाले जनता दल (यूनाइटेड) अध्यक्ष की छवि जहां सुशासन और बुनियादी ढांचे के विस्तार से जुड़ी रही, वहीं लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों ने उनके सफर को उतना ही जटिल और बहुआयामी बना दिया।
अब राज्यसभा सदस्य बन चुके नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर हमेशा संतुलन साधने की कला से जुड़ा रहा—एक ओर भाजपा के सहारे सत्ता में बने रहना और दूसरी ओर सामाजिक न्याय व सांप्रदायिक सौहार्द के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित करना।
लेकिन उनके इस्तीफे के साथ ही यह बहस तेज हो गई है कि मंडल राजनीति की उपज रहे इस नेता ने आखिरकार उसी भाजपा के हाथों बिहार की कमान सौंप दी, जो अब तक हिंदी पट्टी के इस राज्य में शीर्ष पद तक नहीं पहुंच सकी थी।
इसी बीच, बेटे निशांत के सक्रिय राजनीति में प्रवेश और संभावित तौर पर सरकार में भूमिका को लेकर उठती अटकलों ने उस छवि पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसे नीतीश कुमार ने वर्षों तक ‘वंशवाद से दूरी’ के रूप में गढ़ा था।
इसके बावजूद 75 वर्षीय नीतीश कुमार के खाते में कई उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज हैं, जिनमें से कुछ उनके उस दौर से जुड़ी हैं जब वे पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी की केंद्र सरकार में मंत्री थे।
कहा जाता है कि वाजपेयी उन्हें अपने सबसे सक्षम सहयोगियों में गिनते थे और बिहार में लालू प्रसाद के नेतृत्व वाली मजबूत राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सरकार को चुनौती देने के प्रयासों के दौरान उन्हें राजग का “चेहरा” बनाने में उनकी अहम भूमिका रही।
अपने समय के श्रेष्ठ सांसदों में शुमार रहे कुमार ने रेल मंत्री के रूप में भारतीय रेल के आधुनिकीकरण में विशेष रुचि दिखाई और कई अहम पहल कीं।
उन्होंने 2005 में जब बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता संभाली, तो एक ऐसे राज्य की छवि बदलने का बीड़ा उठाया, जिसे लंबे समय तक अराजकता और पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। उनके पहले पांच वर्षों के कार्यकाल को, उनके कट्टर आलोचक भी, बदलाव की ताजी बयार लाने वाला मानते हैं।
एक कठोर और व्यवहारिक राजनेता के रूप में नीतीश कुमार ने सत्ता की राजनीति में कभी झिझक नहीं दिखाई।
मोकामा के विधायक अनंत कुमार सिंह जैसे विवादित चेहरों के साथ समीकरण साधने से भी उन्होंने परहेज नहीं किया, वहीं दूसरी ओर पुलिस तंत्र को सशक्त बनाकर कानून का राज स्थापित करने की कोशिश भी जारी रखी—यह उनके शासन की विरोधाभासी लेकिन विशिष्ट पहचान रही।
लोकलुभावन नीतियां हमेशा उनकी राजनीति का अहम आधार रहीं। सत्ता में आने के शुरुआती दौर में छात्राओं को मुफ्त साइकिल और वर्दी जैसी योजनाएं उनकी पहचान बन गईं, जबकि कार्यकाल के उत्तरार्ध में 125 यूनिट मुफ्त बिजली और प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म शुल्क माफी जैसी घोषणाएं उस समय सामने आईं, जब राजनीतिक जमीन थोड़ी कमजोर पड़ती दिख रही थी।
उनके सबसे साहसिक, लेकिन विवादास्पद फैसलों में राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू करना शामिल रहा। 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले महिलाओं से किए गए वादे को निभाते हुए लागू की गई इस नीति ने जहां उन्हें व्यापक समर्थन दिलाया, वहीं इसके दुष्परिणाम भी सामने आए—आरोप लगे कि इससे समानांतर अवैध कारोबार पनपा और सक्षम वर्ग तक घर-घर शराब की आपूर्ति होने लगी।
यह फैसला उस दौर में आया था, जब उन्होंने पुराने सहयोगी भाजपा को छोड़कर अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद के साथ गठबंधन कर अप्रत्याशित जीत हासिल की थी।
नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीतिक जीवन का बीता एक दशक उनके लगातार बदलते रुख—यानी ‘यू-टर्न’ की राजनीति के लिए याद किया जाएगा। जद(यू) के मुखिया, जिन पर आज भाजपा के सामने “समर्पण” करने के आरोप लगते हैं, विडंबना यह है कि वही कभी विपक्षी एकजुटता के प्रयास ‘इंडिया’ गठबंधन के प्रमुख शिल्पकारों में भी गिने जाते थे।
दस बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का उनका प्रभावशाली रिकॉर्ड जितना आकर्षक लगता है, उसके पीछे की हकीकत उतनी ही राजनीतिक चतुराई से भरी है—कई मौकों पर उन्होंने पद छोड़ा, लेकिन कुछ ही घंटों या एक दिन के भीतर नए समीकरणों के साथ फिर सत्ता में लौट आए।
सार्वजनिक मंचों पर उनका अस्थिर और कभी-कभी असामान्य व्यवहार विपक्ष के लिए तंज कसने का विषय बना। इस व्यवहार को उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़कर देखा गया। हालांकि कई बार यह आलोचना शालीनता की सीमाएं भी लांघती दिखी।
इसके बावजूद, नीतीश कुमार ने अपने लिए एक ऐसा ठोस सामाजिक आधार तैयार किया, जिसने उन्हें बिहार की सत्ता राजनीति में लगभग अपरिहार्य बना दिया। अपनी जाति कुर्मी समुदाय के साथ-साथ ‘अति पिछड़ा’ वर्ग और ‘महादलित’ जैसे समाज के सबसे वंचित तबकों में उनकी पकड़ ने यह सुनिश्चित किया कि बिहार में सत्ता का समीकरण उनके बिना शायद ही कभी पूरा हो सके।
यही वह वजह रही कि अक्सर जद(यू) प्रमुख को “पलटू राम” कहकर निशाना बनाने वाले लालू प्रसाद हर बार उनके साथ हाथ मिलाने से खुद को रोक नहीं पाए। जब-जब नीतीश कुमार ने गठबंधन का प्रस्ताव रखा, उन्होंने उसे स्वीकार किया—भले ही बाद में राजनीतिक समीकरण बदलते ही नीतीश उन्हें छोड़कर फिर राजग में लौट गए।
इसी तरह, लगातार चुनाव दर चुनाव जद(यू) से बेहतर प्रदर्शन करती रही भारतीय जनता पार्टी ने भी लंबे समय तक उन्हें राजग का चेहरा बनाए रखने में ही अपनी रणनीतिक सहमति दिखाई। यहां तक कि आज भी पार्टी यही कहती है कि नयी सरकार नीतीश कुमार के “मार्गदर्शन” में ही आगे बढ़ेगी—यह दर्शाता है कि तमाम मतभेदों के बावजूद उनकी राजनीतिक उपयोगिता अब भी बरकरार है।
भाषा कैलाश खारी
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