हम में से बहुत सारे लोग इस बात को जानते जरूर है कि हमारे स्वास्थ्य पर हमारे विचारों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।किंतु फिर भी अधिकांश लोग इस बात को मानते नहीं हैं और ना ही अपने जीवन में विचारों की शक्ति का सदुपयोग करते हैं।
यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणिक तथ्य है कि रचनात्मक विचार उत्तम स्वास्थ्य, आदर्श व्यक्तित्व, सफलता, प्रचुरता,संपन्नता, प्रसन्नता और दयालुता की भावना निर्मित करते हैं ।
वहीं इसके विपरीत जो विचार होंगे तो स्पष्ट है कि उनके परिणाम इन सब के विपरित पूर्णता नकारात्मकता होंगे।
लम्बे समय तक हमारे मन में जैसे विचार होते हैं। हमारे आसपास वैसे ही
परिस्थितियां स्वतः ही निर्मित हो जाती हैं। इन सब के योग से ही हमारा चरित्र भी हमारी वैचारिकता के आधार पर ढल जाता है।हमारी वैचारिकता ही वह सांचा है ,जो हमारे चारित्र को रूप एवं आकार देती है।
हम बाहरी परिस्थितियों का चयन एवं निर्णय तो नहीं कर सकते। किंतु भीतरी सब कुछ हमारे ही नियन्त्रण में है।विचारों का चयन विशुद्ध रूप से हमारी स्वतंत्रता है और विचारों का चयन हम स्वतंत्र होकर सोच -विचार कर निर्धारित कर सकते हैं ।
मस्तिष्क में जो विचार आया है उसे पोषण देना है या नहीं यह हम ही तय करते हैं।
दिन भर में लगभग70000 विचार आते हैं । अद्भुत यह है कि यह हम को दिखते नहीं है लेकिन यह होते हैं। हम इनमें से जिन विचारों को हम लगातार शक्ति और
पोषण देते हैं ।वही विचार सशक्त होकर हमारी स्थिति-परिस्थिति और चरित्र का निर्माण करते हैं।
आशय स्पष्ट है के विचारों के आधार पर हम हर प्रकार से अपने अनुकूल स्थिति और परिस्थितियों का निर्माण कर सकते हैं ।
इसीलिए सदा सदविचार का चयन कर उसको सशक्त करने की आवश्यकता है ।यह विचार ही हमारे जीवन में हर सुर को बदल देंगे इन्हीं के आधार पर जीवन संगीत कब कर्णप्रिय हो जाएगा यह हमको पता ही नहीं चलेगा।
हमारे जीवन में जितने भी रंग हैं वह मूलतः हमारे विचारों का ही प्रतिबिंब है। यही विचार हमारे शरीर और स्वास्थ्य को भी सीधे-सीधे प्रभावित करते हैं।यह शरीर हमारे विचारों के अनुरूप ही कार्य करता है ।
विचारों के आधार पर भावनाएं सृजित
होती हैं ।भावनाओं के आधार पर शरीर में विभिन्न प्रकार की ग्रंथियां है जो अलग-अलग प्रकार के हार्मोन बनाकर शरीर में भिन्न-भिन्न रासायनिक क्रिया करती हैं ।
इन रासायनिक क्रियाओं के आधार पर ही हमारी शारीरिक और मानसिक क्रिया व प्रतिक्रिया निर्धारित होती है।इसीलिए कहा जाता है कि जैसा हमारा मन ,वैसा हमारा तन।
विचारों की तीव्रता और शक्ति किसी प्राणघातक हथियार की शक्ति से भी अधिक होती है।हम किसी घातक हथियार के प्रहार का तो उपचार कर सकते हैं ।किंतु अनजाने में ही हम किसी नकारात्मक विचार के प्रहार को ना तो समझ पाते हैं और ना ही उसका उपचार कर पाते हैं।नकारात्मक विचारों का पोषण हमारे द्वारा स्वयं पर किए गए प्राणघातक हमले के समान है।
परंतु हम लोग अनजाने में हैं नकारात्मक विचारों को पोषित करते हैं और फिर समझ नहीं पाते कि अपनी समझ से सब कुछ अच्छा करने के बाद ना जाने क्यों शरीर व स्वास्थ्य का स्तर श्रेष्ठता से नीचे क्यों है।इसके चलते लोग बीमारियों और अवसाद का सामना करने लगते हैं।यह वैचारिक नकारात्मकता हमारे स्नायु तंत्र पर प्रभाव डालकर पूरे शरीर और स्वास्थ्य को कमजोर करती है एवं हमें निरुत्साहित बनाती है। जिसके फलस्वरूप अनिद्रा, थकान चिड़चिड़ाहट जैसी समस्याएं प्रारंभ होती हैं।तो धीरे-धीरे अन्य बीमारियां भी हमारे आस पास आ जाती हैं।जो हमारे नकारत्मक विचारों का ही परिणाम है।
शरीर एक ऐसा यंत्र है, जिसका ईंधन
हमारे विचार हैं।विचारों की ऊर्जा से ही यह शरीर संचालित होता है।जिस प्रकार दूषित हवा हमारे वातावरण को प्रदूषित करती है ।वैसे ही नकारात्मक और दूषित विचार हमारे अंतर्मन के पर्यावरण और हमारी आंतरिक रासायनिक क्रिया विधियों को प्रदूषित कर देते हैं।
जिसके चलते भिन्न भिन्न प्रकार की
चुनौतियां हमारे सामने आती हैं।
संक्रमण के दौर में जब संयोग से बहुत सारा समय हमारे पास है।तब हम सबको यह प्रयास करना है कि हम अधिकतम अभ्यास करें स्वयं को वैचारिक और मानसिक रूप से सशक्त रखने का। आप जब वैचारिक एवं मानसिक रूप से सशक्त है तो आपका स्वास्थय स्वतः ही सशक्त होता चलेगा।
बाकी सब उपायों के साथ- साथ जो सरकार या अन्य संस्थाओं के स्तर पर हो रहा है, वह ठीक है। आपको तो सिर्फ एक ही उपाय करना है कि आप अपने आप को वैचारिक रूप से सशक्त करने का अभ्यास तत्काल प्रारंभ कर दें ।
यही आपका देश और समाज के लिए सबसे बड़ा योगदान होगा।
यदि आपके विचार सशक्त हैं तो आपकी
की विजय सुनिश्चित है फ़िर चाहे वह संक्रमण हो या अन्य कोई आक्रमण।
-पंकज चतुर्वेदी.
लेखक मोटिवेशनल स्पीकर हैं .
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