‘’हम भाजपा के सिपाही हैं, वर्षों ज़मीन पर मेहनत की, खून-पसीना बहाया, बलिदान दिया। आज कमल खिलाने का अवसर आया और मैंने अपने कमांडर के आदेश पर गठबंधन की राजनीति को लेकर चलने के लिए सम्राट चौधरी का नाम प्रस्तावित किया।‘’ बिहार में बीजेपी के डिप्टी सीएम विजय सिन्हा का ये बयान अपने आप में बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सीएम बनने की इनसाइड स्टोरी का संकेत दे देता है। समझने वाली बात ये है कि ‘गठबंधन की राजनीति चलने के लिए’ के मायने सीधे तौर पर ये है कि नीतीश कुमार की सहमति हासिल करने के लिए सम्राट चौधरी का ही नाम बीजेपी विधायक दल में प्रस्तावित किया गया और चूंकि कमांडर का आदेश था, इसलिए विधायक दल के पास दूसरा विकल्प था ही नहीं।
पिछले ढ़ाई दशक से बिहार की राजनीति के बारे में कहा जाता है कि यहां पत्ता भी नीतीश कुमार की मर्जी के बिना नहीं हिला करता है और मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटते-हटते भी नए मुख्यमंत्री के चयन में कुछ ऐसा ही हुआ लगता है। ना सिर्फ विजय सिन्हा बल्कि बीजेपी के तमाम पुराने नेताओं को लग रहा होगा कि वर्षों की उनकी मेहनत, त्याग और बलिदान के बाद जब स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार बिहार में बीजेपी को अपना मुख्यमंत्री बनाने का अवसर मिला, उस वक्त भी गठबंधन की राजनीति ने बीजेपी को अपनी पसंद से चयन का अधिकार छीन लिया क्योंकि गठबंधन का चेहरा नीतीश कुमार हैं, जो अपनी पसंद का सीएम होने की शर्त पर ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने पर सहमत हुए थे।
सम्राट चौधरी संघ की पृष्ठभूमि से नहीं हैं, उनकी विचारधारा हिंदुत्व की नहीं बल्कि समाजवादी रही है। उनके पिता शकुनि चौधरी समता पार्टी के थे, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के साथी थे। उनकी बचपन की पढ़ाई सरस्वती शिक्षा मंदिर में नहीं बल्कि उस मदरसे में हुई थी, जहां उर्दू, संस्कृत और हिंदी तीनों भाषाओं की बुनियादी पढ़ाई होती थी, यानी धर्मनिरपेक्षता की उसी सोच की नींव डाली गई थी, जो नीतीश कुमार की राजनीति का अहम हिस्सा रही है। आपको याद होगा कि विचारधारा के इसी फर्क को लेकर नीतीश कुमार ने एनडीए से नाता तोड़ा था, नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा बनाए जाने के बाद नीतीश और मोदी के बीच छत्तीस का आंकड़ा लंबे समय तक बना रहा था। सम्राट चौधरी की राजनीति का रास्ता आरजेडी से जेडीयू होते हुए बीजेपी तक पहुंचा था।
नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को जब मुख्यमंत्री बनाया था, उस सरकार में सम्राट को भी मंत्री बनवाया था। इसके बावजूद 2018 में सम्राट की बीजेपी में एंट्री और फिर नीतीश कुमार के खिलाफ बीजेपी में सबसे आक्रामक होकर उभरने के पीछे एक गहरी सोच थी। ये सोच इतनी दूरदर्शी साबित हुई, जिसने सिर्फ 8 साल के भीतर बिहार बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा और बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी का नाम स्थापित कर दिया। ये कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा हिमंता बिस्वा सरमा ने अगस्त 2015 में कांग्रेस से इस्तीफा दिया और मई 2021 में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के रूप में मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। ये कुछ-कुछ ऐसा ही हो सकता है पश्चिम बंगाल में भी, जहां दिसंबर 2020 में तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा देने वाले शुभेंद् अधिकारी 2026 में अघोषित ही सही, लेकिन बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा बन चुके हैं। इन तीनों में से एक भी संघ बैकग्राउंड से नहीं, भाजपाई विचारधारा का भी नहीं रहा, लेकिन सम्राट और बाकी दोनों के बीच ये फर्क है कि यहां बीजेपी का चेहरा भी दूसरे दल के नेता ने सुनिश्चित किया है।
अब सवाल ये है कि सम्राट चौधरी के नेतृत्व को बिहार की एनडीए सरकार में शामिल सभी दल उसी तरह स्वीकार करेंगे, जैसा कि नीतीश कुमार का नेतृत्व था? नीतीश का कद इतना बड़ा है कि उनके नेतृत्व को चुनौती देना किसी के लिए संभव नहीं था, इसलिए वो सारे फैसले अपने मुताबिक लिया करते थे। वर्षों से नीतीश के साथ रहे नेताओं का भी कहना है कि समाजवादी विचारधारा के होने के बावजूद नीतीश अपने फैसलों में व्यक्तिवादी हुआ करते हैं, यहां तक कि उनके बाएं हाथ को भी पता नहीं चल पाता था कि दाएं हाथ में क्या है? सम्राट चौधरी को शायद ये पॉवर ना मिल पाए क्योंकि बीजेपी तो अनुशासित पार्टी है, ऊपर से आने वाले किसी भी निर्देश को उल्लंघन करने का साहस किसी नेता में नहीं है, लेकिन गठबंधन में होने के बावजूद अपनी सरकार, अपना सीएम मानने वाली जेडीयू के नेता के सामने ये मज़बूरी नहीं है। चिराग की एलजेपी और कुशवाहा से लेकर मांझी तक की पार्टी का सम्राट के नेतृत्व को लेकर क्या रुख रहेगा, ये भी महत्वपूर्ण है। ऐसी स्थिति में कम से कम बतौर सीएम अपनी धाक जमाने तक सम्राट को नीतीश के मार्गदर्शन की ज़रूरत पड़ती रहेगी और कुर्सी पर ना रहने के बावजूद कुर्सी पर नियंत्रण नीतीश कुमार का ही बना रहे, ये वो समीकरण है, जिसने सम्राट का चयन और चयन के लिए सिर्फ यही विकल्प नीतीश को मान्य होने की पूरी कहानी बताता है। कहा जाता है कि सम्राट चौधरी को बचपन में उनके साथी प्यार से गुल्लू के नाम से पुकारा करते थे और जिस तरह से उनके चुनाव में नीतीश कुमार का नाम सामने आने की चर्चा हो रही है, उससे तो यही लगता है कि बिहार के सीएम का नाम आखिरकार नीतीश के ही गुल्लक से निकला है।
(लेखक, IBC24 न्यूज चैनल में मैनेजिंग एडिटर हैं)
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