बरुण सखाजी श्रीवास्तव
हमें जो मिला वह हमारा अधिकार नहीं था, लेकिन हमार भीतरी अहंकार इसे अपना हक मानता है। कष्ट की उत्पत्ति इसी रास्ते से होती है। जो हो रहा है वह होता ही है, किंतु हमे लगता है यह विशेष रूप से हमे कष्ट देने के लिए हो रहा है। इस सच को हम जानते तो हैं, ऊपरी तौर पर मानते भी हैं, किंतु अपनाते नहीं हैं। यकीन कीजिए आपके साथ होने वाला हर व्यवहार आपका ही बोया हुआ फल है। वह सुफल है या दुष्फल, यह बात आप जानिए। जब हम ऐसा सोचते हैं तो लगता है जाने हमने क्या ऐसा किया था जिसके बदले में हमे ये सजा मिल रही है। किंतु कम ही लोगों के मुंह से सुना होगा कि मैंने ऐसा फलां काम किया था जिसके बदले में ये सजा मिल रही है। अगर वह बोल भी रहा है तो ऊपरी तौर पर। भीतर से जरा भी उसके मन में ऐसी कोई बात नहीं है।
कष्ट बढ़ाने के लिए इस तरह के अनेक तरीके हैं। इन तरीकों को हमारा स्वभाव खूब अपनाता है, किंतु खुशियों के कितने तरीके हैं यह हमे पता ही नहीं। परमहंस श्रीराम बाबाजी कभी अफसोस की मुद्रा में नहीं रहते थे। न उन्हें शोक था, न विशोक न किसी वस्तु या विकार से मोह। निरंकार, निरंतर साधना में लीन हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी इस दर्शन के साथ चलते थे।
एक बार रायपुर में मेरे एक मित्र के घर जाना हुआ। पूरा परिवार जुट गया। घर के बच्चे, बूढ़े, पड़ोसी, रिश्तेदार भारी भीड़ आ गई। बड़ा आलीशान घर। अच्छे कपड़े। गाड़ियों का काफिला। दुकान, राजनीति सब भव्य। महंगे आभूषणों से लदी घर की महिलाएं। महाराजजी भगवान श्रीराम बाबाजी का दरबार लग गया। घर के सेंट्रल हॉल में बड़ा मजमा जुटा। चारों ओर परिजन, रिश्तेदार, पड़ोसी बैठे। सब सूरत, व्यवहार, तौर-तरीकों और रहन, सहन से रिच लग रहे हैं, किंतु हाथ फैलाए एक फकीर के सामने बैठे हैं। परमहंस श्रीराम बाबाजी को सब बारी-बारी अपना दुखड़ा सुनाने लगे। कोई बोलता गुरुवर कृपा करो, बच्चा अच्छी पढ़ाई करे। प्रभु कृपा करो भाई ने ऑडी का शोरूम खोला है, अच्छा चले। परमात्मा आपकी दया है, दादाजी बहुत बुजुर्ग हैं सदा स्वस्थ रहें। आदि-आदि ऐसी प्रार्थनाएं जो संसार से ऊपर उठ ही नहीं रही थी। परमहंस श्रीराम बाबाजी इन सब चीजों से परे रहने वाले सबको देख-देख मुस्कुराते और आंखें बंद करके बोलते। ठीक है, सब ठीक है। हो जै है सब ठीक है। सब है तो। घर की ओर इशारा करते हुए, जो सब का है। सब है फिर भी रौ रै। संसार समंज में नई आए। जो संसार हैई रोआ।
बुंदेली समझने में असमर्थ यह लोग इसका अर्थ सीधा नहीं समझ पाए। मुझे दोभाषिए के रूप में इसे समझाना पड़ा। तब सबके चेहरे पर मुस्कान बिखर गई। सच में कष्ट था कहां। यह कष्ट हमारी अपेक्षाओं से जन्मा था। महाराज जी बोले, तुम से अच्छे तो हम हैं। एक लंगोटी है वो भी तब तक है जब तक है। न गाड़ी है, न घर, न द्वार, न आश्रम। एक फकीर के सामने सोना-चांदी मांग रहे हैं। यही तो संसार है। असमर्थ होकर भी खुद को भारी बलशाली मानता है। सबके कष्ट का कारण भीतर से उमड़ी अपेक्षाएं हैं। अपेक्षाओं से उपजा है आग्रह और आग्रह ही ग्रस रहा है। जैसा मैं चाहूं वैसा ही हो तो ठीक नहीं तो ठीक नहीं, मतलब कष्ट। बस इतना सा शब्द है।
महाराजजी परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी ने अपना झोला उठाने को बोला और डंडा लेकर गाड़ी की ओर चल पड़े। न कोई आश्वासन, न आशीर्वाद, न प्रवचन, न वचन, न किसी के प्रश्नों का कोई उत्तर। परिवार, रिश्तेदार, परिजन समझ नहीं पाए आखिर हुआ क्या। किसी को लगा बाबा बुरा मान गए। किसी ने उनकी इसी क्रिया को आशीर्वाद मान लिया। किसी ने कुछ भी सोचा। हम अपनी गति से अगली यात्रा पर थे।