यही है सार…
यही है सार… मैं और वो एक ही हैं एक ही हैं, ऐसा कैसे? अरे सच में एक ही हैं अगर एक हैं तो दो क्यों? और दो हैं तो …

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यही है सार...
मैं और वो एक ही हैं
एक ही हैं, ऐसा कैसे?
अरे सच में एक ही हैं
अगर एक हैं तो दो क्यों?
और दो हैं तो एक कैसे?
अद्वैत कहता है एक हैं
यथार्थ लगता है अनेक हैं
अगर एक हैं तो अनेक क्यों?
अगर अनेक हैं तो एक क्यों?
कैसे मान लें
कहां से जान लें
कब तक समझें
कहां तक समझें
कैसे समझें
क्यों समझें
तमाम सवाल हैं
ज़ेहन खाली जो है
अरे नहीं, खाली ज़ेहन नहीं है
फिर किस चीज से भरा है
भरा है जिज्ञासाओं से
कहते हैं, प्रश्न शिशु है
जिज्ञासाएं जवानी
ज्ञान प्रौढ़ता है
आत्मज्ञान मुक्ति
प्रश्न शिशु फुदकते हैं
खेलते हैं मन से, विचारों से
उत्तरों के पीछे भागते हैं छूने
दौड़ते हैं पकड़ने, पाने फिर भूल जाने
जिज्ञासाएं गंभीर होती हैं
दायित्वों से भरी होती हैं
शोध की लालसाओं से लदी होती हैं
किसी नतीजे तक पहुंचने को
होती हैं आतुर कुछ से कुछ निकालने को
फिर आता है ज्ञान का बुढ़ापा
प्रश्न-जिज्ञासाओं की स्मृतियों का क्रम
ज्ञान ही फिर लेकर जाता है
आत्मज्ञान तक
फिर आती है भक्ति
मृत्यु के समान
सब कुछ को छोड़कर
सब कुछ को पछाड़कर
सब कुछ को झुठलाकर
सब कुछ को प्रलय मानकर
सब कुछ को भ्रम बता कर
सब कुछ को एक क्रम जताकर
सब कुछ को बुलबुला मानकर
सब कुछ को क्षणिक जानकर
लगती कुरूप है
पर होती सुरूप है
दग्ध जैसे कोई धूप है
गहरी जैसा कोई समंदर है
ऊंची जैसे कोई आसमान है
भीतर जैसे कोई पाताल है
गतिमान जैसे कोई पवन है
विराट जैसे कोई धरती है
भयंकर जैसे कोई भूत है
संसार से परे
सबसे परे
कहीं जहां कोई होता है
या कि होता भी नहीं है
रीकंपोज, डिकंपोज की थ्यरी में थिरकी
लेती है पल-पल हर हस्ती की फिरकी
हो जाती है विलीन फिर उसमें जिसमें थी
चली जाती है कहीं जहां से आई थी
या कहें कि इतनी सब अनेक बनकर आई थी
या कहें हम सब ऊपर हो जाते हैं एक
तत्व, पदार्थ से परे पता नहीं क्या?
तब एक होते हैं तो अनेक नहीं होते
अनेक का भ्रम भी नहीं होता
अगला क्रम भी नहीं होता
जाने क्या होता है
जाने क्या नहीं होता है
जो होता है वह तो होता है
होता ही है कोई क्या रोकता है
यही है सार
यही है उस पार
यही है संसार
यही है सार
यही है सार
- बरुण सखाजी श्रीवास्तव
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Web Title: Poem by Barun Sakhajee The essence of life
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