कृषि क्षेत्र वृद्धि के बावजूद जलवायु एवं जल संबंधी चुनौतियों का कर रहा है सामनाः आर्थिक समीक्षा

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कृषि क्षेत्र वृद्धि के बावजूद जलवायु एवं जल संबंधी चुनौतियों का कर रहा है सामनाः आर्थिक समीक्षा

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  • Publish Date - January 29, 2026 / 02:16 PM IST,
    Updated On - January 29, 2026 / 02:16 PM IST

नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने में कृषि क्षेत्र की अहम भूमिका रहेगी। हालांकि यह क्षेत्र हाल की वृद्धि के बावजूद स्थिरता एवं उत्पादकता संबंधी महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में यह बात कही गई।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दोनों सदनों में वित्त वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा पेश की।

समीक्षा में उर्वरक क्षेत्र में सुधार, शोध एवं विकास को बढ़ावा देने, सिंचाई प्रणालियों को मजबूत करने और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने सहित प्रमुख सुधारों का आह्वान किया गया।

इसमें कहा गया है कि कृषि और उससे संबंधित गतिविधियां राष्ट्रीय आय में लगभग एक-पांचवां हिस्सा योगदान करती हैं लेकिन कार्यबल का 46.1 प्रतिशत हिस्सा इन गतिविधियों में संलग्न है। इस तरह यह क्षेत्र देश के समग्र वृद्धि पथ के केंद्र में है।

स्थिर कीमतों पर पिछले पांच वर्षों में कृषि क्षेत्र ने औसतन 4.4 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है जिसमें पशुधन एवं मत्स्य पालन का योगदान सबसे अधिक रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में कृषि क्षेत्र में 3.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

संसद में पेश आर्थिक समीक्षा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा गया, ‘‘कृषि क्षेत्र विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने, समावेशी विकास को गति देने और लाखों लोगों की आजीविका में सुधार लाने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।’’

हालांकि इसमें आगाह किया गया है कि जलवायु परिवर्तन से कई गंभीर चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं जिनमें अनियमित मौसम, बढ़ते तापमान और फसल उपज को प्रभावित करने वाली प्रतिकूल घटनाएं शामिल हैं। मानसूनी बारिश पर निर्भर क्षेत्रों में पानी की कमी एक गंभीर समस्या बनी हुई है।

भारत की कृषि वृद्धि दर वैश्विक औसत 2.9 प्रतिशत से अधिक रही है। इसके बावजूद अनाज, मक्का, सोयाबीन और दालों सहित कई फसलों की पैदावार वैश्विक औसत से कम है।

सकल सिंचित क्षेत्र 2001-02 में कुल फसल क्षेत्र का 41.7 प्रतिशत था जो बढ़कर 2022-23 में 55.8 प्रतिशत हो गया। लेकिन राज्यों तथा फसलों के बीच सिंचाई ‘कवरेज’ में काफी अंतर बना हुआ है जहां सिंचाई ‘कवरेज’ बाजरा के लिए 15 प्रतिशत से कम और चावल के लिए करीब 67 प्रतिशत तक है।

सरकार ने ऋण एवं प्रौद्योगिकी तक पहुंच बढ़ाने के लिए सहकारी समितियों और किसान-उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को मजबूत किया है। डिजिटल कृषि मिशन और ई-एनएएम मंच जैसी डिजिटल पहल पारदर्शिता बढ़ा रही हैं।

समीक्षा में कहा गया, ‘‘फिर भी, छोटा भू-स्वामित्व, जलवायु जोखिम, उत्पादकता में अंतर और कमजोर बाजार एकीकरण जैसी संरचनात्मक चुनौतियां कृषि आय पर लगातार दबाव डाल रही हैं।’’

इसमें कहा गया है कि भविष्य में व्यापक सुधारों, जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने, किसान संगठनों को सशक्त बनाने, बाजार एवं लॉजिस्टिक व्यवस्था में सुधार करने और जोखिम प्रबंधन को बढ़ाने की आवश्यकता है।

समीक्षा में कहा गया है कि निरंतर निवेश एवं नवाचार के साथ कृषि क्षेत्र अधिक मजबूत, प्रतिस्पर्धी और आय बढ़ाने वाला क्षेत्र बन सकता है। खाद्य प्रसंस्करण, शीत भंडारण और उच्च मूल्य वाले कृषि उत्पादों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को मजबूत करना घरेलू एवं निर्यात बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए महत्वपूर्ण होगा।

इसमें कहा गया कि बागवानी, कृषि वानिकी, दुग्ध, मुर्गी पालन और मत्स्य पालन जैसे उच्च वृद्धि वाले क्षेत्रों का विस्तार खासकर ग्रामीण समुदायों के लिए समावेशी आर्थिक वृद्धि और रोजगार सृजन को अधिक बढ़ावा दे सकता है।

आर्थिक समीक्षा कहती है कि हाल की प्रगति के बावजूद दुग्ध क्षेत्र को चारे एवं पशु आहार की कमी का सामना करना पड़ रहा है जबकि मत्स्य पालन क्षेत्र को निर्यात पर निर्भरता कम करने के लिए मूल्यवर्धन एवं प्रसंस्करण क्षमता का विस्तार करने की जरूरत है।

भाषा निहारिका प्रेम

प्रेम