नयी दिल्ली, 16 फरवरी (भाषा) सड़क एवं परिवहन उद्योग में कृत्रिम मेधा (एआई) के इस्तेमाल की अपार संभावनाएं हैं जिससे दुर्घटनाओं को रोकने एवं वाहन प्रदूषण की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अधिकारी पंकज अग्रवाल ने राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ में कहा कि वाहन-से-वाहन संचार प्रणाली और स्कूलों के पाठ्यक्रम में ‘ड्राइविंग’ को शामिल करने जैसे उपाय इस दिशा में सहायक हो सकते हैं।
‘भारत में सड़क सुरक्षा बढ़ाने के लिए डेटा-आधारित समाधान: सड़क सुरक्षा हेतु एआई’ विषय पर एक चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि एआई, दुर्घटनाओं को रोकने और इससे जान गंवाने के मामलों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने बताया कि आंकड़े संकेत देते हैं कि यातायात नियमों के उल्लंघन में तेज रफ्तार सबसे बड़ी समस्या है। ऐसे में कृत्रिम मेधा की मदद से सही आंकड़े जुटाना और बिना मानवीय हस्तक्षेप के प्रमाण उपलब्ध कराना उपयोगी हो सकता है क्योंकि आज पुलिसकर्मी द्वारा दर्ज किया गया डेटा ‘‘ वास्तविक डेटा नहीं होता, क्योंकि दुर्घटना के लिए कई अन्य उल्लंघन भी जिम्मेदार होते हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ यदि ऐसी प्रौद्योगिकी हो जिससे चालक टक्कर से पहले ही स्वयं को संभाल सके (वाहन-से-वाहन संचार प्रौद्योगिकी के जरिये)… तो कृत्रिम मेधा को लेकर (इसमें) काफी संभावना है।’’
अग्रवाल ने कहा कि चालान के मामलों में भी प्रवर्तन एक बड़ी चुनौती है।
उन्होंने कहा कि कृत्रिम मेधा दुर्घटनाओं एवं इससे मौत के सही आंकड़े बनाए रखने में भी मदद कर सकती है।
उन्होंने बिहार का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां के आंकड़ों में जान गंवाने के मामले राष्ट्रीय औसत से अधिक दिखाई देते हैं।
प्रदूषण के मुद्दे पर उन्होंने कहा, ‘‘ इसके लिए भी हम कृत्रिम मेधा आधारित समाधान विकसित कर रहे हैं क्योंकि शहरों में पर्यावरण एक बड़ी चिंता है।’’
उन्होंने कहा कि प्रदूषण को कैसे नियंत्रित किया जाए, इस बारे में सरकार सक्रिय रूप से काम कर रही है क्योंकि यहां आंकड़ों में भ्रम की आशंका रहती है।
अग्रवाल ने यह विचार भी रखा कि कृत्रिम मेधा के माध्यम से स्कूल पाठ्यक्रम में वाहन चलाने को शामिल किया जाए ताकि युवाओं में जागरूकता उत्पन्न हो सके।
उन्होंने कहा, ‘‘ मद्रास स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान इस पर काम कर रहा है, ताकि इसे पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जा सके।’’
भाषा निहारिका मनीषा
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