(Cheque Bounce Rules/ Image Credit: AI-generated)
नई दिल्ली: Cheque Bounce Rules: आज भी देश में बड़ी संख्या में लोग भुगतान के लिए चेक का उपयोग करते हैं। लेकिन कई बार चेक बाउंस हो जाने पर यह सिर्फ बैंकिंग समस्या नहीं रह जाती बल्कि कानूनी विवाद में बदल सकता है। इसलिए चेक चारी करने से पहले इसके नियम और कानून को समझना बहुत जरूरी है।
चेक बाउंस तब होता है जब बैंक किसी चेक का भुगतान करने से मना कर देता है। इसका सबसे सामान्य कारण खाते में पर्याप्त बैलेंस न होना है। इसके अलावा गलत हस्ताक्षर, तकनीकी त्रुटि, खाता बंद होना या अन्य बैंकिंग कारणों से भी चेक पास नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में भुगतान रुक जाता है और मामला आगे बढ़ सकता है।
भारत में चेक बाउंस के मामलों को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत देखा जाता है। इस कानून का उद्देश्य चेक के जरिए होने वाले लेनदेन पर भरोसा बनाए रखना है। हालांकि हर चेक बाउंस को अपराध नहीं माना जाता। इसके लिए कुछ जरूरी शर्तों का पूरा होना आवश्यक होता है। तभी मामला कानूनी कार्रवाई तक पहुंचता है।
धारा 138 तब लागू होती है जब चेक किसी कर्ज, उधार या देय राशि के भुगतान के लिए दिया गया हो और वह बाउंस हो जाए। इसके साथ ही यह जरूरी है कि चेक उसकी वैध अवधि के भीतर बैंक में जमा किया गया हो। अगर खाते में पैसे नहीं हैं या भुगतान जारीकर्ता की वजह से रुकता है तो मामला इस धारा के अंतर्गत आ सकता है।
चेक बाउंस होने पर भुगतान पाने वाले व्यक्ति को बैंक से सूचना मिलने के 30 दिनों के भीतर चेक जारी करने वाले को लिखित नोटिस भेजना होता है। नोटिस मिलने के बाद आरोपी के पास 15 दिन का समय होता है भुगतान करने के लिए। अगर इस समय में भुगतान नहीं किया जाता तो मामला अदालत में पहुंच सकता है और कानूनी कार्रवाई शुरू हो जाती है।
अगर अदालत में आरोप साबित हो जाते हैं तो चेक जारी करने वाले व्यक्ति को अधिकतम दो साल तक की जेल और चेक की राशि के दोगुने तक जुर्माने की सजा हो सकती है। कुछ मामलों में जेल और जुर्माना दोनों लगाए जा सकते हैं। हालांकि यह कानून उन मामलों पर लागू नहीं होता जहां कोई वास्तविक वित्तीय लेनदेन नहीं होता जैसे उपहार में दिया गया चेक। इसलिए चेक जारी करते समय खाते में पर्याप्त बैलेंस रखना, सही जानकारी भरना और सावधानी बरतना जरूरी है ताकि किसी कानूनी परेशानी से बचा जा सके।