मुंबई, 20 अगस्त (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर रोहित जैन ने कहा है कि सीमा-पार व्यापार और भुगतान में स्थानीय मुद्राओं की भूमिका आने वाले समय में बढ़ेगी, क्योंकि इससे लेनदेन की लागत घटाने, मुद्रा संबंधी असंतुलन कम करने और भुगतान निपटान की दक्षता बढ़ाने में मदद मिलती है।
जैन ने ‘भारतीय विदेशी मुद्रा डीलर संघ’ (फेडाई) के पिछले सप्ताह आयोजित वार्षिक कार्यक्रम में कहा कि बाजार लगातार बदलते रहते हैं और समय की जरूरत के हिसाब से उनकी तैयारी के मानक भी बदलाव आता है।
उन्होंने कहा कि अगले दशक के लिए वह विदेशी मुद्रा बाजार तैयार होगा जो भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय कारोबार को सुगम बनाए, बिना कामकाज बाधित हुए बाजार के झटकों को संभाले, छोटे उपयोगकर्ता को बड़े उपयोगकर्ता जितनी दक्षता से सेवाएं दे और अर्जित भरोसे को प्रभावित किए बिना नई प्रौद्योगिकी अपनाए।
आरबीआई के बृहस्पतिवार को जारी बयान के मुताबिक, जैन ने कहा कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार वर्ष 2000 के करीब 38 अरब डॉलर से बढ़कर 2026 में 691 अरब डॉलर हो गया है। हाजिर और डेरिवेटिव दोनों बाजारों को जोड़कर घरेलू विदेशी मुद्रा बाजार का औसत दैनिक कारोबार वित्त वर्ष 2021-22 के 41 अरब डॉलर से दोगुना होकर फिलहाल करीब 80 अरब डॉलर हो गया है।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये में बिल, भुगतान और निपटान के लिए ‘विशेष रुपया वोस्ट्रो खाता’ (एसआरवीए) व्यवस्था बदलते अंतरराष्ट्रीय व्यापार परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए लागू की गई है। इसकी सफलता व्यावसायिक व्यवहार्यता, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटान को बढ़ावा देने, बाजार आधारित विनिमय दरों और निपटान व्यवस्था में भरोसा मजबूत करने पर निर्भर करेगी।
जैन ने कहा कि स्थानीय मुद्राओं में सीमा-पार लेनदेन से लागत कम होती है, मुद्रा संबंधी असंतुलन घटता है और भुगतान निपटान अधिक दक्ष होता है। इससे उन बाजारों में भी कारोबार संभव होता है जहां दूसरे बैंक के जरिये बैंकिंग सेवाएं लेना महंगा या सीमित है।
उन्होंने कहा कि अगले दशक में विदेशी मुद्रा लेनदेन की शुरुआत से लेकर रिपोर्टिंग तक पूरी प्रक्रिया डिजिटल होनी चाहिए। कृत्रिम मेधा (एआई) और मशीन लर्निंग दस्तावेजों के वर्गीकरण, असामान्य गतिविधियों की पहचान और रिपोर्टिंग संबंधी विसंगतियों का पता लगाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन जवाबदेही को स्वचालित नहीं किया जा सकता।
जैन ने कहा कि भारत के विदेशी मुद्रा बाजार की पूरी क्षमता का इस्तेमाल करने के रास्ते में कुछ चुनौतियां भी हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अपने बही-खाते के आकार की तुलना में विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार में कम भागीदारी कर रहे हैं।
उन्होंने बाजार में अधिक संस्थाओं को बाजार-निर्माता बनाने, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भागीदारी बढ़ाने और इलेक्ट्रॉनिक मंचों को प्रोत्साहित करने को जरूरी बताया।
जैन ने ऑनलाइन विदेशी मुद्रा कारोबार की पेशकश करने वाली अनधिकृत इकाइयों को लेकर आगाह भी किया। उन्होंने कहा कि ऐसे मंच विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) और इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग मंच संबंधी नियमन के दायरे से बाहर काम करते हैं और ग्राहकों से धोखाधड़ी की शिकायतें मिलती रहती हैं।
भाषा प्रेम
प्रेम अजय
अजय