मुंबई, नौ अप्रैल (भाषा) नौवहन महानिदेशालय (डीजीएस) ने बंदरगाह प्राधिकरणों और टर्मिनल परिचालकों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि पश्चिम एशिया संकट के कारण माल फंसने से प्रभावित निर्यातकों को रियायतों का लाभ तत्काल मिले।
बंदरगाह, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय ने मंगलवार को प्रस्ताव दिया था कि बंदरगाह प्राधिकरण शुल्क में कमी, छूट या माफी से जुड़े अनुरोधों पर विचार कर सकते हैं। साथ ही, पश्चिम एशिया संकट से पैदा हुई समस्याओं से निपटने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) भी जारी की गई।
डीजीएस ने आठ अप्रैल को जारी अपने परामर्श में कहा, ‘‘यह देखने को मिला है कि बंदरगाह प्राधिकरणों द्वारा डिटेंशन चार्ज, ग्राउंड रेंट और रीफर प्लग-इन शुल्क को लेकर दी जा रही छूट निर्यातकों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रही है। अभी टर्मिनल ऑपरेटर एनवीओसीसी (बिना जहाज वाली शिपिंग सेवा प्रदाता) से शुल्क वसूलते हैं और फिर प्रतिपूर्ति के जरिये रियायत देते हैं जिससे लाभ मिलने में देरी होती है।’’
महानिदेशालय ने निर्देश दिया है कि अब सभी रियायतें सीधे एवं पारदर्शी तरीके से फ्रेट फॉरवर्डर और शिपिंग इंटरमीडियरी जैसे संबंधित पक्षों के जरिये निर्यातकों तक पहुंचाई जाएं। इस तरह की समायोजन प्रक्रिया को प्रतिपूर्ति या बाद में दावे के जरिये करने की मौजूदा व्यवस्था तुरंत प्रभाव से बंद कर दी जाएगी।
परामर्श के मुताबिक, बंदरगाह प्राधिकरणों को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि टर्मिनल स्तर पर इन निर्देशों का पालन हो और रियायत का लाभ समय पर संबंधित पक्षों तक पहुंचे।
डीजीएस ने यह भी कहा कि कुछ मामलों में मालवाहक को अन्य बंदरगाहों पर भेजने या उतारने के लिए अतिरिक्त शुल्क बिना पर्याप्त दस्तावेज के वसूले जा रहे हैं। ऐसे सभी शुल्कों का उचित दस्तावेजीकरण अनिवार्य किया गया है, ताकि निर्यातक ‘रिलीफ योजना’ के तहत दावा कर सकें।
इसके अलावा, डीजीएस ने कहा कि बदलते हालात में मालवाहक जहाजों पर लगाए जा रहे ‘युद्ध जोखिम प्रीमियम’ में आए बदलाव का मामला बीमा कंपनियों के साथ उठाया जा रहा है।
भाषा प्रेम
प्रेम अजय
अजय