मुंबई, 26 मार्च (भाषा) पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला में आई रुकावटों की वजह से भारत में यूरिया और मिश्रित उर्वरकों का सालाना घरेलू उत्पादन 10-15 प्रतिशत तक घटने की आशंका है।
क्रिसिल रेटिंग्स की बृहस्पतिवार को जारी एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है।
क्रिसिल रेटिंग्स के निदेशक, आनंद कुलकर्णी ने कहा, ‘‘पश्चिम एशिया में चल रही समस्याओं से खरीफ मौसम के अहम समय पर उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट आ सकती है। एलएनजी और अमोनिया की आपूर्ति में करीब तीन महीने तक जारी रहने वाली रुकावट से घरेलू यूरिया और मिश्रित उर्वरक उत्पादन में 10-15 प्रतिशत की कमी आ सकती है।’’
हालांकि, उन्होंने कहा कि उत्पादन पर पड़ने वाले इस असर को कुछ हद तक सरकार के हालिया निर्देश से कम किया जा सकेगा, जिसके तहत यूरिया बनाने वाली कंपनियों को 70 प्रतिशत गैस आवंटित की गई है।
उन्होंने कहा कि करीब तीन महीने का उर्वरक स्टॉक, और साथ ही दूसरे स्रोतों से होने वाले संभावित आयात से, आपूर्ति में तत्काल कमी आने का जोखिम कम हो जाएगा।
इसके अलावा, क्रिसिल रेटिंग्स ने कहा कि कच्चे माल और आयातित उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी से कंपनियों की कार्यशील पूंजी की ज़रूरतें बढ़ने की संभावना है, और साथ ही सरकार का सब्सिडी खर्च भी 20,000-25,000 करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है।
भारत में उर्वरक की कुल खपत में यूरिया का हिस्सा 45 प्रतिशत है, मिश्रित उर्वरकों (डाई-अमोनियम फॉस्फेट, या डीएपी तथा नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम, या एनपीके‘) का हिस्सा एक-तिहाई है, और बाकी हिस्सा सिंगल सुपर फॉस्फेट’ (एसएसपी) तथा म्यूरिएट ऑफ पोटाश (एमओपी) का है।
उर्वरक क्षेत्र की आयात पर निर्भरता काफी ज़्यादा बनी हुई है। यूरिया का 20 प्रतिशत और मिश्रित उर्वरकों (मुख्य रूप से डीएपी) का एक-तिहाई हिस्सा आयात किया जाता है।
यूरिया (प्राकृतिक गैस, जो कच्चे माल की कुल लागत का 80 प्रतिशत है) और मिश्रित उर्वरकों (अमोनिया और फॉस्फोरिक एसिड) के लिए ज़रूरी मुख्य कच्चा माल ज़्यादातर आयात ही किया जाता है, क्योंकि देश में इनके भंडार सीमित हैं। यूरिया और डीएपी, दोनों के आयात के लिए पश्चिम एशिया एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है। वित्त वर्ष 2025-26 के पहले नौ महीनों में कुल आयात का 40 प्रतिशत इसी क्षेत्र से हुआ है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि घरेलू उर्वरक उत्पादन के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भरता और भी अधिक है, क्योंकि 60-65 प्रतिशत तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और 75-80 प्रतिशत अमोनिया का आयात इसी क्षेत्र से होता है।
क्रिसिल रेटिंग्स ने कहा कि क्षमता उपयोग में कमी से मुनाफे पर असर पड़ने की संभावना है। यूरिया निर्माताओं पर इसका प्रभाव अधिक पड़ सकता है, क्योंकि क्षमता का पूरी तरह से उपयोग न होने के कारण ऊर्जा दक्षता में कमी आएगी।
रिपोर्ट कहती है कि इस प्रभाव को कम करने के लिए उद्योग को सरकार से अतिरिक्त सब्सिडी सहायता की आवश्यकता होगी।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि यदि पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष लंबा खिंचता है, तो उर्वरक निर्माताओं द्वारा प्रमुख कच्चे माल और उर्वरकों को वैकल्पिक स्रोतों से प्राप्त करने की क्षमता, और इस संबंध में सरकार का हस्तक्षेप—ये ऐसे पहलू होंगे जिन पर बारीकी से नज़र रखनी होगी।
भाषा राजेश राजेश अजय
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