मुंबई, 10 सितंबर (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बृहस्पतिवार को उभरते वित्तीय प्रौद्योगिकी क्षेत्र से आंकड़ों को कारोबारी संपत्ति के रूप में नहीं, बल्कि ग्राहकों का भरोसा बनाये रखने के लिए जिम्मेदारी के तौर पर देखने को कहा।
मल्होत्रा ने वैश्विक फिनटेक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कंपनियों को नियामकीय श्रेणियों के बीच मौजूद खामियों का फायदा उठाकर पहले कारोबार का विस्तार करने और बाद में माफी मांगने की प्रवृत्ति को लेकर भी आगाह किया।
उन्होंने कहा कि वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए आंकड़े कारोबार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और कई लोग इन्हें ‘नया तेल’ भी कहते हैं। लेकिन इन आंकड़ों के उपयोग में जिम्मेदारी और ग्राहकों के भरोसे को सबसे ऊपर रखना चाहिए।
मल्होत्रा ने कहा, ‘‘आंकड़ों को ग्राहकों के हितों की रक्षा और भरोसे को बनाये रखने के लिहाज से जिम्मेदारी समझें, कारोबारी संपत्ति नहीं।”
उन्होंने कहा कि प्रत्येक वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनी के पास लोगों की निजी जानकारी होती है और इसे उसी तरह संभाला जाना चाहिए, जैसे कोई न्यासी किसी लाभार्थी की संपत्ति की देखभाल करता है।
आरबीआई गवर्नर ने कहा कि आंकड़े स्पष्ट उद्देश्य के साथ एकत्र किए जाने चाहिए। ग्राहकों ने जिस उद्देश्य के लिए सहमति दी है, उनका इस्तेमाल उसी सीमा में होना चाहिए और उनकी सुरक्षा उसी तरह की जानी चाहिए जैसे कंपनी अपने आंकड़ों की करती है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘जब कोई कंपनी ग्राहक के आंकड़ों को पहले कमाई का साधन और बाद में जिम्मेदारी मानती है तो भरोसा खत्म होने लगता है और एक बार भरोसा टूट जाए तो उसे दोबारा कायम करना आसान नहीं होता।’’
मल्होत्रा ने नियामकीय खामियों का फायदा उठाकर कारोबार खड़ा करने के मुद्दे पर कहा कि कंपनियों के पास नियामकीय परीक्षण व्यवस्था (सैंडबॉक्स) और प्रायोगिक योजनाओं जैसे विकल्प उपलब्ध हैं। पारदर्शिता के साथ काम करने वाली कंपनी न केवल नियामकों का भरोसा हासिल करती है, बल्कि उसे कारोबार बढ़ाने के लिए तेज और अधिक स्थायी रास्ता भी मिलता है।
उन्होंने कहा, ‘‘कारोबार को नियामकीय श्रेणियों के बीच मौजूद खामियों के आधार पर तैयार करने या पहले तेजी से विस्तार करने और बाद में स्पष्टीकरण अथवा माफी मांगने की सोच से बचना चाहिए।’’
मल्होत्रा ने कहा कि नियमों से आगे निकलने की कोशिश करने वाली कंपनियों तक अंततः नियम पहुंच ही जाते हैं। ऐसी स्थिति में कंपनी को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है और उसके ग्राहकों का भरोसा भी प्रभावित होता है।
उन्होंने तेजी से विस्तार करने वाली कंपनियों से परिचालन संबंधी मजबूती, कारोबार की निरंतरता और साइबर सुरक्षा जैसे जोखिमों में पर्याप्त निवेश करने को भी कहा।
मल्होत्रा ने कहा कि वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियों को शुरुआती चरण के नवोन्मेष पर नियमन का बोझ नहीं पड़ना चाहिए, इसलिए उन्हें फिलहाल विवेकपूर्ण नियमन के दायरे से बाहर रखा गया है।
उन्होंने कृत्रिम मेधा के बढ़ते उपयोग से जुड़े जोखिम का भी उल्लेख किया। इनमें कामकाज का पारदर्शी नहीं होना, कुछ कंपनियों में अत्यधिक केंद्रीकरण, एक ही दिशा में अत्यधिक निर्भरता, साइबर सुरक्षा, आंकड़ों की निजता एवं सुरक्षा और मानवीय निर्णय क्षमता में कमी जैसे जोखिम शामिल हैं। उन्होंने इन जोखिमों को कम करने की जरूरत बताई।
मल्होत्रा ने वित्तीय प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लिए ‘यूनिफाइड फिनटेक फोरम’ को दूसरे स्व-नियामक संगठन के रूप में मंजूरी दिए जाने की भी घोषणा की। उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक ने इसके लिए सभी आवश्यक मंजूरी दे दी है।
भाषा रमण अजय
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