सरकार ने थोक ग्राहकों के लिए चीनी भंडार रखने की सीमा 30 दिन तक बढ़ाई

सरकार ने थोक ग्राहकों के लिए चीनी भंडार रखने की सीमा 30 दिन तक बढ़ाई

सरकार ने थोक ग्राहकों के लिए चीनी भंडार रखने की सीमा 30 दिन तक बढ़ाई
Modified Date: September 18, 2026 / 07:06 pm IST
Published Date: September 18, 2026 7:06 pm IST

नयी दिल्ली, 18 सितंबर (भाषा) सरकार ने शुक्रवार को कहा कि उसने थोक चीनी ग्राहकों के लिए भंडार रखने की सीमा को मौजूदा 15 दिन से बढ़ाकर 30 दिन कर दिया है, क्योंकि त्योहार आ रहे हैं और इस दौरान मांग बढ़ने की संभावना है।

अभी, जो थोक ग्राहक कच्चे माल के तौर पर उत्पादन, खपत या किसी और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए महीने में 10 टन से ज्यादा चीनी का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें अपनी जरूरत के हिसाब से 15 दिन तक का भंडार रखने की इजाजत है।

खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग ने एक बयान में कहा कि अब यह सीमा दोगुनी कर दी जाएगी। लेकिन यह एक एक शर्त के साथ की जाएगी कि पहले की 15 दिन की सीमा से ज्यादा रखा गया कोई भी भंडार सिर्फ शुल्क दर कोटा (टीआरक्यू) या अग्रिम मंजूरी योजना (एएएस) के तहत आयात की गई चीनी से ही आना चाहिए।

सरकार ने पहले ही टीआरक्यू के तहत 10 लाख टन चीनी के आयात की इजाजत दे दी है, साथ ही अग्रिम मंजूरी योजना के तहत खरीदी गई निर्यात-योग्य चीनी की घरेलू बिक्री की भी अनुमति दी है।

मंत्रालय ने साफ किया कि खुले बाजार से खरीदे गए भंडार पर 15 दिन की खपत की सीमा लागू रहेगी।

भंडार पर नजर रखने के लिए, सरकार ने एक व्यवस्था भी शुरू की है। इसके तहत थोक ग्राहकों को हर शुक्रवार को खाद्य मंत्रालय के ऑनलाइन पोर्टल ‘फूडस्टॉक डॉट डीएफपीडी डॉट जीओवी डॉट इन‘ पर अपने चीनी के भंडार की जानकारी देनी होगी।

मंत्रालय ने कहा कि यह फैसला बड़े थोक ग्राहकों के साथ विस्तृत बातचीत के बाद लिया गया, जिन्होंने त्योहारों के मौसम से पहले भंडार रखने की सीमा बढ़ाने की मांग की थी।

उन्होंने शुल्क दर कोटा और अग्रिम मंजूरी योजना के तहत भंडार रखने वाले आयातकों से सीधे चीनी खरीदने की इजाजत का भी प्रस्ताव दिया था, ताकि घरेलू उपलब्धता पर दबाव डाले बिना औद्योगिक इस्तेमाल के लिए बिना रुकावट आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

सरकार ने कहा कि इस कदम का मकसद थोक ग्राहकों के हितों और घरेलू चीनी बाजार में स्थिरता की जरूरत के बीच संतुलन बनाना है। इससे त्योहारों के महीनों में औद्योगिक ग्राहकों को ज्यादा सुविधा मिलेगी और यह भी सुनिश्चित होगा कि अतिरिक्त भंडार आयात से आए, न कि स्थानीय आपूर्ति पर दबाव डाले।

इसके अलावा, केंद्र सरकार ने बताया कि हालांकि मिल से निकलने वाली चीनी की कीमतें लगभग 25 प्रतिशत टूटी हैं, लेकिन खुदरा कीमतें अगस्त के 65 रुपये के उच्चतम स्तर से गिरकर अभी 58.50 रुपये यानी सिर्फ 10 प्रतिशत ही कम हुई हैं। इससे पता चलता है कि थोक बाजार में सस्ती दरों का फायदा पूरी तरह से ग्राहकों तक नहीं पहुंचा है।

भारतीय चीनी एवं जैव-उर्जा विनिर्माता संघ (इस्मा), नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज और चीनी व्यापार संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ एक संयुक्त बैठक में, खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के सचिव ने कहा कि मिल स्तर पर हुई कीमतों में कमी का फायदा आगे के स्तरों (जैसे थोक और खुदरा विक्रेताओं) तक ठीक से नहीं पहुंचाया गया है।

सरकार ने थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं और पूरे व्यापार जगत से आग्रह किया कि वे मिल से निकलने वाली कम कीमतों का फायदा तुरंत उपभोक्ताओं तक पहुंचाएं। साथ ही, चीनी मूल्य श्रृंखला से कहा गया कि वे त्योहारों के मौसम में चीनी और चीनी से बने उत्पादों की कीमतें किफायती बनाए रखें।

सचिव ने कहा कि किसान और उपभोक्ता भारत की चीनी नीति के दो मुख्य स्तंभ हैं और सरकार ने गन्ना उत्पादकों को अच्छा लाभ दिलाने और उपभोक्ताओं के लिए उचित कीमतें सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाने का काम किया है।

एक अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाले नए चीनी सत्र से, किसानों को 365 रुपये प्रति क्विंटल की ज्यादा ‘उचित और लाभकारी कीमत’ (एफआरपी) मिलेगी। यह सरकार की हर साल एफआरपी बढ़ाने की नीति का हिस्सा है।

मंत्रालय ने कहा कि वह चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर बारीकी से नजर रखना जारी रखेगा और उपभोक्ताओं तथा खाद्य प्रसंस्करण जैसे उद्योगों के लिए पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए जरूरत पड़ने पर और कदम उठाएगा।

भाषा राजेश राजेश रमण

रमण


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