नयी दिल्ली, 18 जून (भाषा) हैदराबाद स्थित कृषि अनुसंधान संस्था आईसीएआर-आईआईओआर ने बायो-पॉलिमर आधारित ‘सीड कोटिंग’ विकसित की है। संस्था का दावा है कि इससे फसल की पैदावार ऐसे समय 37 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जब देश जलवायु संबंधी चुनौतियों के बीच कृषि उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तिलहन अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-आईआईओआर) ने बताया कि यह प्रौद्योगिकी बीजों को एक बायोडिग्रेडेबल परत में लपेटती है। यह परत सूक्ष्मजीवों, पोषक तत्वों और फसल-सुरक्षा एजेंट को सीधे बीज और मिट्टी के संपर्क बिंदु तक पहुंचाती है, जिससे अंकुरण दर और पौधे की शुरुआती बढ़त में सुधार होता है।
संस्था ने बताया कि सात फसलों — सोयाबीन, मक्का, मूंगफली, चना, कपास, सरसों और अरहर — पर किए गए खेत परीक्षण में बिना कोटिंग वाले बीजों की तुलना में उत्पादकता में 12 प्रतिशत से 37 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई। तेलंगाना में किए गए प्रदर्शनों में, सामान्य खेती के तरीकों की तुलना में मूंगफली और सोयाबीन की पैदावार में लगभग 30 प्रतिशत का सुधार दर्ज किया गया।
भारतीय पेटेंट वाली यह प्रौद्योगिकी, भारतीय कृषि की एक लगातार बनी रहने वाली समस्या को हल करने के लिए तैयार की गई है। शुरुआती विकास के चरणों में फसल का ठीक से न जम पाना या विकसित न हो पाना। यह समस्या अन्य कृषि स्थितियां अच्छी होने पर भी पैदावार को कम कर सकती है।
आईसीएआर-आईआईओआर के वैज्ञानिकों ने एक बयान में कहा, ‘‘स्मार्ट बीज इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं, क्योंकि ये सुरक्षा, पोषण और जैविक सहायता ठीक वहीं पहुंचाते हैं जहां उनकी ज़रूरत होती है।’’
संस्था ने कहा कि इस कोटिंग को अनाज, मोटे अनाज (मिलेट्स), दालों, सब्जियों और बागवानी उत्पादों सहित कई तरह की फसलों के लिए तैयार किया जा सकता है। यह विशेष रूप से बारिश पर निर्भर खेती के लिए उपयुक्त है, जो भारत की खेती योग्य भूमि का एक बड़ा हिस्सा है और अनियमित मानसून व सूखे के प्रति बहुत संवेदनशील है।
आईसीएआर-आईआईओआर ने कहा कि वह वितरण का दायरा बढ़ाने के लिए राज्य बीज निगमों, किसान उत्पादक संगठनों और निजी बीज कंपनियों के साथ साझेदारी करना चाह रहा है, ताकि विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में छोटे किसानों तक पहुंचा जा सके।
भाषा राजेश राजेश अजय
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