नयी दिल्ली, 10 फरवरी (भाषा) देश को 2070 तक शुद्ध रूप से शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए बिजली क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा, भंडारण और पारेषण समेत अन्य क्षेत्रों में 14,230 अरब डॉलर के निवेश की आवश्यकता है। इसमें 98 प्रतिशत बिजली उत्पादन स्वच्छ ईंधन आधारित होगा। नीति आयोग की मंगलवार को जारी रिपोर्ट में यह कहा गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के विकास और जलवायु लक्ष्य तेजी से एक ही प्रणाली पर निर्भर करते हैं और वह है बिजली।
जैसे-जैसे देश 2047 तक विकसित भारत और 2070 तक शुद्ध रूप से शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, बिजली क्षेत्र की वृद्धि यह निर्धारित करेगी कि विकास समावेशी और टिकाऊ हो सकता है या नहीं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जीवन स्तर में सुधार, उत्पादकता बढ़ाने और परिवहन, भवन और उद्योग में कम कार्बन उत्सर्जन की दिशा में बदलाव लाने के लिए भरोसेमंद, किफायती और स्वच्छ बिजली आवश्यक है।
‘विकसित भारत परिदृश्य और शुद्ध शून्य उत्सर्जन क्षेत्रीय दृष्टिकोण: बिजली’ शीर्ष से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर, 2025 तक लगभग 258 गीगावाट (एक गीगावाट बराबर 1,000 मेगावाट) नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता स्थापित होने के साथ, भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा बाजार बनकर उभरा है। यह स्वच्छ ऊर्जा विस्तार के पैमाने और गति को दर्शाता है।
हालांकि, अगला चरण अधिक जटिल है। शहरीकरण, एसी, डिजिटलीकरण, इलेक्ट्रिक परिवहन और हरित हाइड्रोजन के साथ मांग में तेजी से वृद्धि होगी और प्रणाली को परिवर्तनशील नवीकरणीय ऊर्जा के बहुत अधिक हिस्से को अवशोषित करने की आवश्यकता होगी।
इन दोहरे दबाव का सामना करने के लिए न केवल क्षमता को बढ़ाना आवश्यक होगा, बल्कि भंडारण, पारेषण विस्तार, आधुनिक ग्रिड संचालन और आर्थिक रूप से व्यावहारिक वितरण के माध्यम से प्रणाली को मजबूत करना भी आवश्यक होगा, ताकि स्वच्छ बिजली की बढ़ती मांग के साथ-साथ इसकी विश्वसनीयता और सस्ती दर पर उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।
विकास को स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ने वाले मार्गों को मात्रात्मक रूप से निर्धारित करने के लिए, यह अध्ययन दो दृष्टिकोणों के तहत 2070 तक भारत के बिजली बदलाव का मॉडल प्रस्तुत करता है। एक वर्तमान नीति परिदृश्य जो आज के रास्ते को आगे बढ़ाता है और एक महत्वाकांक्षी नेट-जीरो (शुद्ध रूप से शून्य कार्बन उत्सर्जन) परिदृश्य जो 2070 तक शुद्ध रूप से शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों के अनुरूप है।
भारत का ऊर्जा बदलाव अर्थव्यवस्था में तीव्र विद्युतीकरण द्वारा परिभाषित होगा, जिससे बिजली की मांग में कहीं अधिक तेज वृद्धि होगी।
कुल ऊर्जा में बिजली की हिस्सेदारी 2025 में 21 प्रतिशत से बढ़कर वर्तमान नीति परिदृश्य (सीपीएस) में लगभग 40 प्रतिशत और नेट जीरो परिदृश्य (एनजेडएस) में 2070 तक 60 प्रतिशत होने का अनुमान है। इसका मुख्य कारण इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती संख्या, औद्योगिक ताप (हीट पंप/इलेक्ट्रिक बॉयलर) का अधिक उपयोग और इलेक्ट्रिक कुकिंग की ओर बढ़ता रुझान है।
इसके परिणामस्वरूप, प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 2025 में 1,400 किलोवाट-घंटे से बढ़कर 2070 तक 7,000-10,000 किलोवाट-घंटे हो जाएगी। यह फ्रांस और दक्षिण कोरिया जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के स्तर के करीब पहुंच जाएगी।
वर्तमान नीति परिदृश्य में 2070 तक कुल स्थापित क्षमता नौ गुना और नेट-जीरो परिदृश्य में 14 गुना होने का अनुमान है।
इसमें कहा गया है कि दो परिदृश्यों के तहत 3,250 गीगावाट से 5,500 गीगावाट की क्षमता के साथ सौर पीवी महत्वपूर्ण है। जबकि पहचान की गई क्षमता का उपयोग होने पर अपतटीय पवन ऊर्जा लगभग 50-70 गीगावाट तक पहुंच सकती है। इसके साथ तटीय इलाकों में पवन ऊर्जा क्षमता 1,000 गीगावाट से अधिक हो जाएगी।
वर्तमान नीति परिदृश्य के तहत बैटरी भंडारण आज के बहुत कम स्तर से बढ़कर 2070 तक लगभग 1,300 से 1,400 गीगावाट और नेट जीरो परिदृश्य के तहत 2,500 से 3,000 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि जलविद्युत से ऊर्जा उत्पादन लगभग 150 से 160 गीगावाट तक पहुंच जाएगी।
नवीकरणीय ऊर्जा पर आधारित ग्रिड में पर्याप्तता, बेहतर प्रबंधन और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए ये संसाधन महत्वपूर्ण हैं।
परमाणु ऊर्जा भारत के दीर्घकालिक विद्युत परिवर्तन का एक रणनीतिक स्तंभ बनकर उभर रहा है, जो 2025 में 8.8 गीगावाट से बढ़कर 2070 तक 300 गीगावाट से अधिक हो जाएगा। यह स्थिर, वितरण योग्य और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली प्रदान करेगी, जो नवीकरणीय ऊर्जा पर आधारित ग्रिड में प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
भाषा रमण अजय
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