नयी दिल्ली, 25 जुलाई (भाषा) सरकार ने शनिवार को कहा कि भारत को अमेरिकी प्रशासन की धारा 301 जांच के तहत लगाए गए अतिरिक्त शुल्क के मामले में 10 प्रतिशत की निचली श्रेणी में रखा गया है। इसके साथ ही सरकार ने अमेरिकी के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) को जल्द अंतिम रूप देने की प्रतिबद्धता जताई।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने 23 जुलाई को अमेरिकी व्यापार अधिनियम, 1974 की धारा 301 के तहत अंतिम उपायों की घोषणा करते हुए 24 जुलाई से भारतीय वस्तुओं पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क लागू किया है।
यह कदम भारत समेत 60 अर्थव्यवस्थाओं की जांच के बाद उठाया गया है जिन पर बंधुआ मजदूरी (फोर्स्ड लेबर) से तैयार उत्पादों के आयात को लेकर पर्याप्त कदम न उठाने का आरोप था।
अमेरिका ने शुरुआत में भारत पर 12.5 प्रतिशत शुल्क लगाने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि बाद में इसे घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया। इसने 24 फरवरी से 150 दिनों के लिए लगाए गए 10 प्रतिशत अस्थायी शुल्क की जगह ली है।
वाणिज्य मंत्रालय ने अमेरिकी सरकार के इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि जांच के दौरान भारत ने लिखित प्रस्तुतियों, सार्वजनिक सुनवाई और प्रत्यक्ष परामर्श के जरिए यूएसटीआर के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा।
मंत्रालय ने कहा, “इन प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत को अतिरिक्त शुल्क की निचली श्रेणी में रखा गया है, जिससे भारतीय निर्यात को प्रमुख क्षेत्रों में तुलनात्मक लाभ मिलेगा।”
आधिकारिक बयान के मुताबिक, अमेरिका को होने वाली कुल भारतीय निर्यात (2025-26 में 87.31 अरब डॉलर) का एक बड़ा हिस्सा इस अतिरिक्त 10 प्रतिशत शुल्क से बाहर है। इनमें जेनेरिक दवाएं, स्मार्टफोन और कुछ अन्य उत्पाद शामिल हैं।
वहीं, इस्पात, एल्यूमीनियम और वाहन कलपुर्जे जैसे उत्पाद पहले से लागू धारा 232 शुल्क के दायरे में आते हैं, इसलिए उन पर 10 प्रतिशत का नया शुल्क लागू नहीं होगा।
मंत्रालय ने कहा कि इन छूटों के कारण भारत के करीब 45 प्रतिशत निर्यात इस अतिरिक्त शुल्क के दायरे से बाहर हैं जबकि बाकी 55 प्रतिशत निर्यात पर यह लागू होगा। हालांकि भारत पर शुल्क का प्रभाव जांच में शामिल अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत कम है।
आर्थिक थिंकटैंक जीटीआरआई के मुताबिक, इन उत्पादों का भारत के कुल निर्यात में लगभग आठ प्रतिशत हिस्सा है और इन पर सामान्य अमेरिकी एमएफएन (सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र) शुल्क के अलावा 25 प्रतिशत या 50 प्रतिशत तक का शुल्क लगता है।
हालांकि वस्त्र क्षेत्र को लेकर चिंता बनी हुई है, क्योंकि भारत को नए शुल्क-दर कोटा (टीआरक्यू) व्यवस्था के तहत छूट नहीं मिली है, जबकि बांग्लादेश, कंबोडिया, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों को सीमित मात्रा में रियायती शुल्क का लाभ दिया गया है।
उद्योग निकायों का कहना है कि इससे भारत के वस्त्र निर्यात, खासकर मध्यवर्ती उत्पादों पर असर पड़ सकता है। अमेरिका भारत के वस्त्र और परिधान निर्यात के लिए सबसे बड़ा बाजार है, जहां निर्यात करीब 11 अरब डॉलर का रहता है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने पहले विश्वास जताया था कि भारत को अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते के तहत अमेरिकी कपास और धागे से बने परिधानों पर रियायती शुल्क का लाभ मिल सकता है।
सरकार ने कहा कि अंतिम उपायों में संदर्भित वस्त्र-विशिष्ट व्यवस्था को अभी स्थापित और लागू किया जाना बाकी है और भारत इस विषय पर द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के लिए जारी वार्ताओं के हिस्से के रूप में अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखे हुए है।
मंत्रालय ने कहा, “सरकार इस साल दो फरवरी को घोषित और सात फरवरी को जारी संयुक्त बयान के अनुरूप भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते को शीघ्र पूरा करने की दिशा में अमेरिका के साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध है।”
यूएसटीआर ने इस साल मार्च में भारत सहित कई देशों के खिलाफ धारा 301 के तहत दो जांच शुरू की थीं। ये जांच बंधुआ मजदूरी और अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित थीं।
जून में अमेरिका ने आरोप लगाया कि कुछ देश बंधुआ मजदूरी से बने उत्पादों के आयात पर रोक लगाने में विफल रहे हैं। इसके आधार पर भारत सहित 54 देशों पर 12.5 प्रतिशत शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा गया था जबकि पाकिस्तान और यूरोपीय संघ समेत छह क्षेत्रों के लिए 10 प्रतिशत शुल्क प्रस्तावित किया गया था।
इसके बाद जुलाई में भारत ने अपनी विदेश व्यापार नीति में संशोधन कर बंधुआ मजदूरी से तैयार उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। इस कदम को ध्यान में रखते हुए अमेरिका ने भारत पर 10 प्रतिशत शुल्क लागू किया।
अमेरिका ने अभी तक अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता से जुड़े मामले पर कोई रिपोर्ट जारी नहीं की है।
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प्रेम योगेश
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