(बिशेश्वर मालाकार)
कोलकाता, 22 मार्च (भाषा) अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के चाय बागान श्रमिकों की न्यूनतम दैनिक मजदूरी बढ़ाकर 300 रुपये करने के चुनावी वादे पर उद्योग जगत के हितधारकों ने सतर्क प्रतिक्रिया दी है।
उन्होंने कहा कि मजदूरी में किसी भी संशोधन के लिए इस क्षेत्र की नाजुक वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए और नियोक्ताओं, ट्रेड यूनियनों तथा सरकार को शामिल करने वाली स्थापित परामर्श प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए अपने चुनावी घोषणापत्र में सत्तारूढ़ टीएमसी ने चाय बागान श्रमिकों की दैनिक मजदूरी 250 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये करने का संकल्प लिया है। पार्टी ने यह भी कहा कि वह हरी चाय की पत्तियों पर कृषि आयकर की छूट को 2027 तक बढ़ाएगी और बागान श्रमिकों के लिए ‘चा सुंदरी’ आवास योजना जैसी कल्याणकारी पहल जारी रखेगी।
हालांकि, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों का कहना है कि चाय क्षेत्र में वेतन निर्धारण पारंपरिक रूप से तय बातचीत प्रक्रिया के माध्यम से होता है। भारतीय चाय संघ (टीएआई) के महासचिव पी के भट्टाचार्य ने कहा कि उत्तर बंगाल में मजदूरी तंत्र एक बहु-हितधारक मंच के माध्यम से निर्धारित किया जाता है।
उन्होंने कहा, ‘‘उत्तर बंगाल में वेतन, न्यूनतम मजदूरी सलाहकार बोर्ड नामक निकाय द्वारा तय किया जाता है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें नियोक्ता, सरकार और ट्रेड यूनियन प्रतिनिधि भाग लेते हैं।’’
उन्होंने आगे कहा, ‘‘इसमें उद्योग की भुगतान क्षमता, बाजार की स्थिति और लागू प्रावधानों जैसे सभी पहलुओं पर विचार किया जाता है। इसलिए, उद्योग के रूप में यह आशा की जाती है कि मजदूरी लागू करने से पहले इन सभी पहलुओं पर गौर किया जाएगा।’’
नाम न छापने की शर्त पर दार्जिलिंग चाय उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पहाड़ियों के कई बागान पहले से ही वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अधिकारी ने कहा, ‘‘दार्जिलिंग के 78 चाय बागानों में लगभग सात से आठ बागान नेपाल से सस्ती चाय की डंपिंग के कारण पहले ही बंद हो चुके हैं… ऐसी स्थिति में मजदूरी में वृद्धि बिल्कुल भी टिकाऊ नहीं है। अगर लागत का दबाव बढ़ता रहा, तो और भी बागान बंद हो सकते हैं।’’
भाषा पाण्डेय अजय
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