एनसीएलएटी ने लिगेयर एविएशन के खिलाफ दिवाला मामला खारिज किया, धन के स्थानांतरण का मामला बताया

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एनसीएलएटी ने लिगेयर एविएशन के खिलाफ दिवाला मामला खारिज किया, धन के स्थानांतरण का मामला बताया

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  • Publish Date - June 7, 2026 / 12:11 PM IST,
    Updated On - June 7, 2026 / 12:11 PM IST

नयी दिल्ली, सात जून (भाषा) राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने लिगेयर एविएशन लिमिटेड के खिलाफ शुरू की गई दिवाला कार्यवाही को रद्द कर दिया है। न्यायाधिकरण ने कहा कि यह मामला किसी वास्तविक वित्तीय ऋण का नहीं, बल्कि धन के केवल इधर-उधर स्थानांतरण (राउंड ट्रिपिंग) का है।

एनसीएलएटी ने अपने आदेश में कहा कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने रेलिगेयर एंटरप्राइजेज की याचिका स्वीकार करते समय लेन-देन की वास्तविक प्रकृति की पर्याप्त जांच नहीं की। रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि लिगेयर एविएशन को ऐसा कोई वास्तविक वित्तीय ऋण नहीं दिया गया था, जिसे दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत ‘वित्तीय ऋण’ माना जा सके।

न्यायाधिकरण ने कहा कि किसी लेन-देन को वित्तीय ऋण मानने के लिए उसमें ‘टाइम वैल्यू ऑफ मनी’द का तत्व होना जरूरी है। इस मामले में ऐसा कोई तत्व मौजूद नहीं था।

टाइम वैल्यू ऑफ मनी का अर्थ है कि आज का पैसा भविष्य में मिलने वाली समान राशि से अधिक मूल्यवान होता है, क्योंकि उसे निवेश करके अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है।

दाइची सांक्यो की अपीलों को स्वीकार करते हुए एनसीएलएटी ने कहा कि संबंधित लेन-देन केवल धन के घुमाव का उदाहरण था, जिसे किसी अघोषित उद्देश्य से अंजाम दिया गया। इसलिए इसके आधार पर दिवाला प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती थी।

पीठ ने यह भी कहा कि ऋण से संबंधित समझौता (एमओयू) एक औपचारिक दस्तावेज भर था, जिसे संदिग्ध लेन-देन को वैध दिखाने के लिए तैयार किया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि 31 मार्च, 2009 को रेलिगेयर आर्ट्स इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट लिमिटेड (आरएआईएमएल) ने लिगेयर एविएशन को 3.6 करोड़ रुपये भेजे थे, लेकिन यह राशि उसी दिन आगे रेलिगेयर फिनवेस्ट को स्थानांतरित कर दी गई। एनसीएलएटी ने कहा कि बैंक रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि समूह की विभिन्न कंपनियों के बीच उसी दिन धन का लगातार आदान-प्रदान हुआ, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह वास्तविक ऋण नहीं था।

न्यायाधिकरण ने एनसीएलटी की उस टिप्पणी को भी गलत ठहराया, जिसमें कहा गया था कि एमओयू में धन को किसी अन्य कंपनी को आगे भेजने का उल्लेख नहीं है। एनसीएलएटी के अनुसार, एनसीएलटी ने इस महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि राशि लिगेयर एविएशन के पास 24 घंटे भी नहीं रही थी और तुरंत दूसरी कंपनी को भेज दी गई थी।

यह मामला सिंह बंधुओं मालविंदर मोहन सिंह और शिविंदर मोहन सिंह से जुड़े कारोबारी समूह की कंपनियों से संबंधित है। दाइची सांक्यो ने इनसे जुड़े विवाद में 2016 में सिंगापुर मध्यस्थता न्यायाधिकरण अपने पक्ष में 3,500 करोड़ रुपये का फैसला भी हासिल किया था।

एनसीएलएटी ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि जब लेन-देन में कोई वास्तविक वित्तीय ऋण ही मौजूद नहीं था, तब उसके आधार पर कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) शुरू नहीं की जा सकती थी। इसी आधार पर एनसीएलटी द्वारा दिवाला याचिका स्वीकार करने का आदेश रद्द कर दिया गया।

भाषा अजय अजय

अजय