सिंटेक्स मामले में एनसीएलएटी ने ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत को कायम रखा, शेयरधारक की अपील खारिज

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सिंटेक्स मामले में एनसीएलएटी ने ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत को कायम रखा, शेयरधारक की अपील खारिज

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  • Publish Date - August 30, 2026 / 11:43 AM IST,
    Updated On - August 30, 2026 / 11:43 AM IST

नयी दिल्ली, 30 अगस्त (भाषा) राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत को बरकरार रखते हुए सिंटेक्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड (एसआईएल) के एक शेयरधारक का करीब 110 करोड़ रुपये का दावा खारिज कर दिया है।

एनसीएलएटी की दो सदस्यीय पीठ ने केरल के निवेशक टाइटस बाबू की अपील खारिज करते हुए कहा कि समाधान योजना के तहत जिन शेयरों को समाप्त कर दिया गया है, उनके अधिकार दोबारा बहाल नहीं किए जा सकते।

क्लीन स्लेट सिद्धांत का अर्थ है कि जब किसी कंपनी की दिवाला समाधान प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हो जाती है और नया समाधान आवेदक कंपनी को अपने नियंत्रण में लेता है, तो उसे सामान्यतः पुराने प्रबंधन के पुराने कर्ज और दावों के बोझ से मुक्त होकर कंपनी चलाने का अवसर मिलना चाहिए।

बाबू के पास सिंटेक्स के 1.35 लाख शेयर थे। उन्होंने शेयरों के बदले मुआवजा, ब्याज, नए शेयर और हर्जाने देने की अपील की थी।

कंपनी की समाधान योजना के तहत उसकी पूरी पुरानी इक्विटी शेयर पूंजी बिना किसी भुगतान के रद्द कर दी गई थी।

एनसीएलएटी ने कहा कि आईबीसी की धारा 238 अन्य कानूनों से ऊपर अधिकार रखती है। इसलिए कंपनी अधिनियम के तहत किसी कार्यवाही के जरिये मंजूर समाधान योजना को चुनौती नहीं दी जा सकती।

इसके अलावा आईबीसी की धारा 32 ए ‘क्लीन स्लेट सिद्धांत’ को और मजबूत करती है। इसके तहत सिंटेक्स की समाधान पूर्व अवधि की देनदारियां मंजूरी के बाद समाप्त हो जाती हैं।

न्यायाधिकरण ने कहा कि एक बार समाधान योजना मंजूर होकर लागू हो जाने और कंपनी का नियंत्रण नए मालिकों के पास चले जाने के बाद पुराने शेयरधारकों के अधिकार समाप्त हो जाते हैं।

अहमदाबाद एनसीएलटी ने 10 फरवरी, 2023 को सिंटेक्स की समाधान योजना को मंजूरी दी थी। इसके बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज और एसेट केयर एंड रिकंस्ट्रक्शन इंटरप्राइज (एसीआरई) के संयुक्त गठजोड़ ने 3,567 करोड़ रुपये में कंपनी का अधिग्रहण किया था।

एनसीएलएटी ने एस्सार स्टील और घनश्याम मिश्रा मामलों में उच्चतम न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मंजूर समाधान योजना को दोबारा नहीं खोला जा सकता और योजना में शामिल नहीं किए गए पुराने दावे समाप्त हो जाते हैं।

पीठ ने कहा कि शेयर समाप्त होने के बाद बाबू का कंपनी में कोई स्वतंत्र सदस्यता अधिकार भी नहीं बचता है।

टाइटस बाबू ने अक्टूबर, 2017 से जनवरी, 2023 के बीच एसआईएल के 1.35 लाख शेयर खरीदे थे। इसके बाद उन्होंने कंपनी अधिनियम की धारा 59 के तहत एनसीएलटी का रुख करते हुए कंपनी के सदस्यों के रजिस्टर में सुधार की मांग की। साथ ही उन्होंने करीब 82.3 करोड़ रुपये के मुआवजे, 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, रद्द किए गए शेयर के बदले नए इक्विटी शेयर जारी करने तथा मानसिक पीड़ा के लिए हर्जाने की मांग की। उनकी कुल मांग 110 करोड़ रुपये से अधिक की थी।

बाबू का तर्क था कि कंपनी के एक ‘सदस्य’ के रूप में उनके अधिकार सामान्य शेयरधारक से अलग हैं। उनका कहना था कि समाधान योजना के तहत केवल प्रवर्तक समूह से जुड़े शेयरधारकों के शेयरों को शून्य परिसमापन मूल्य दिया गया था, इसलिए उनके शेयरों को उसी आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।

हालांकि, एनसीएलटी ने छह मार्च, 2026 को उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद बाबू ने इस फैसले को चुनौती देते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) का रुख किया था।

भाषा अजय अजय

अजय