नयी दिल्ली, एक जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने सिद्धि विनायक लॉजिस्टिक्स लिमिटेड के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई को बरकरार रखते हुए कहा कि दिवाला प्रक्रिया के तहत लागू स्थगन (मोराटोरियम) का उपयोग धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) में अपराध की कमाई मानी गई परिसंपत्तियों को संरक्षण देने के लिए नहीं किया जा सकता।
अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा कि अगर ईडी द्वारा किसी संपत्ति को कुर्क किया गया है, तो उस पर निर्णय देने का अधिकार केवल पीएमएलए के तहत गठित न्यायिक समिति के पास ही है।
एनसीएलएटी की तीन सदस्यीय पीठ ने अहमदाबाद स्थित पीठ के पहले के आदेश को भी सही ठहराया और कहा कि दिवाला और ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत गठित न्यायाधिकरण ईडी के खिलाफ किसी भी याचिका पर सुनवाई करने का मंच नहीं हैं।
पीठ ने कहा, “यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ता के लिए स्थिति निर्णायक है: संपत्ति को कुर्क करना है या नहीं, यह ईडी के अधिकार क्षेत्र में है और एक बार कुर्की हो जाने पर, उसके खिलाफ किसी भी चुनौती पर निर्णय पीएमएलए के तहत स्थापित न्यायिक तंत्र ही करेगा।”
न्यायाधिकरण ने कहा कि आईबीसी का मकसद केवल कॉरपोरेट दिवाला समाधान करना है। इसमें या तो कंपनी संचालित करते हुए उसका पुनर्गठन किया जाता है (सीआईआरपी) या फिर उसे बंद करके संपत्ति बेच दी जाती है।
इस प्रक्रिया में कर्ज़दारों को भुगतान सिर्फ कंपनी की कानूनी और सही संपत्तियों को बेचकर मिले धन से किया जाता है और किसी भी अवैध तरीके से कमाई गई संपत्ति से भुगतान नहीं किया जाता।
पीठ ने कहा कि अगर सावधानी नहीं रखी गई, तो आईबीसी अवैध संपत्ति को बचाने का माध्यम बन सकता है और पीएमएलए के प्रावधानों के साथ टकराव पैदा कर सकता है।
यह फैसला सिद्धि विनायक लॉजिस्टिक्स के परिसमापक द्वारा दायर उस याचिका पर आया, जिसमें ईडी ने स्थगन के दौरान 2.29 करोड़ रुपये निकालने और पीएमएलए के तहत रोकी गई संपत्तियों को जारी करने की अपील की गई थी।
भाषा यासिर अजय
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