(फाइल फोटो के साथ)
(राधा रमण मिश्रा)
नयी दिल्ली, 27 जनवरी (भाषा) आम बजट पेश किये जाने से पहले पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा है कि पुरानी और नई कर व्यवस्था को मिलाकर एक सरल कर ढांचा बनाया जाना चाहिए और स्लैब तीन से ज्यादा नहीं होने चाहिए।
उनका यह भी कहना है कि अर्थव्यवस्था में जरूरी वृद्धि के लिए निवेश आवश्यक है। ऐसे में निवेश के प्रमुख स्रोत घरेलू बचत को बढ़ावा देने के उपाए करने की जरूरत है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 2026-27 का बजट एक फरवरी को लोकसभा में पेश करेंगी।
बजट को लेकर उम्मीदों के बारे में सिन्हा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा, ‘‘बजट में दो बातें महत्वपूर्ण हैं…सरकार कितना घाटा बजट में उठएगी और कर का क्या होगा। इन सब पर निर्भर करेगा कि वृद्धि को कितना बढ़ावा मिलेगा। एक चुनौती राजकोषीय घाटे को लक्ष्य के अंदर रखने की है। दूसरा, राजकोषीय घाटे को लक्ष्य के दायरे में रखना है तो पूंजीगत व्यय का क्या होगा।’’
वर्ष 1990-91 और 1998 से 2002 के दौरान वित्त मंत्री रहे सिन्हा ने कहा, ‘‘अभी सरकारी पूंजीगत व्यय की काफी जरूरत है क्योंकि निजी क्षेत्र निवेश नहीं कर रहा है। यह एक बड़ी चुनौती है कि निजी क्षेत्र का निवेश कैसे बढ़ाया जाए। वित्त मंत्री निजी क्षेत्र से बार-बार निवेश बढ़ाने का आह्वान कर रही हैं। पर निजी क्षेत्र तभी निवेश बढ़ाएगा, जब मांग बढ़ेगी। क्षमता उपयोग 100 या 120 प्रतिशत हो तभी नई क्षमता जोड़ने के लिए निवेश होगा। यह स्थिति अभी आई ही नहीं है। इसीलिए नया निवेश नहीं हो रहा।’’
सिन्हा ने कहा, ‘‘दूसरी बात कर के मोर्चे पर स्थिरता होना बहुत जरूरी है क्योंकि इससे निवेशकों को भरोसा और प्रोत्साहन मिलता है। इससे वह निवेश का निर्णय करते हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘कर के मोर्चे पर पहले से ही काफी छूट दी गयी हे। जीएसटी के मामले में जबतक राज्यों की सहमति नहीं बनती, वित्त मंत्री कुछ नहीं कर सकतीं। जीएसटी परिषद उस पर निर्णय करती है। अब उनके पास सीमा शुल्क, आयकर और कॉरपोरेट कर है। यही कर हैं। अब इसमें आयकर और कंपनी कर में स्थिरता होती है तो उसका बहुत फायदा होता है।’’
सिन्हा ने बजट के बारे में विस्तार से बातचीत में कहा, ‘‘मुझे याद है कि 1995 में पी. चिदंबरम ने तीन दरें 10, 20, 30 प्रतिशत की दरें निर्धारित की थी। उसे आगे मैंने भी जारी रखा। मेरे बाद अन्य वित्त मंत्रियों ने उपकर आदि लगाकर कुछ बदलाव किया लेकिन मूल ढांचे को बरकरार रखा। कहने का मतलब है कि कर के मोर्चे पर स्थिरता होना बहुत जरूरी है क्योंकि इससे निवेशकों को भरोसा और प्रोत्साहन मिलता है। इससे वह निवेश का निर्णय करते हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैं उम्मीद करता हूं कि जहां तक प्रत्यक्ष कर में आयकर और कंपनी कर का सवाल है वित्त मंत्री उसमें स्थिरता का संकेत देगी और दरों को युक्तिसंगत रखेंगी।’’
एक सवाल के जवाब में सिन्हा ने कहा, ‘‘ नई कर व्यवस्था भी भारी भ्रम पैदा करती है। एक पुरानी कर व्यवस्था है और एक नई कर व्यवस्था है। नया पुराना को मिलाकर एक कर व्यवस्था बनाने की जरूरत है जो लोगों को आसानी से समझ में आए। दरों को भी युक्तिसंगत बनाने की आवश्यकता है। स्लैब तीन से ज्यादा होनी ही नहीं चाहिए।’’
नई कर व्यवस्था में छह स्लैब को रखा गया है। इसमें चार लाख रुपये सालाना आय पर कोई कर नहीं लगता है। चार से आठ लाख रुपये पर पांच प्रतिशत, आठ से 12 लाख रुपये पर 10 प्रतिशत, 12 लाख से 16 लाख रुपये पर 15 प्रतिशत, 16 से 20 लाख रुपये पर 20 प्रतिशत, 20 लाख रुपये से 24 लाख रुपये पर 25 प्रतिशत तथा 24 लाख रुपये से ऊपर की सालाना आय पर 30 प्रतिशत कर लगता है।
सीमा शुल्क का जिक्र करते हुए सिन्हा ने कहा, ‘‘हमारे समय से चला आ रहा है कि सीमा शुल्क को आसियान देशों की दरों पर रखा जाए। उस पर बहुत कुछ काम हुआ भी है। लेकिन अभी भी यह ज्यादा है। सीमा शुल्क के सरलीकरण पर ध्यान देने की जरूरत है।’’
पूर्व वित्तमंत्री ने कहा, ‘‘अब सवाल है कि वृद्धि कहां से आएगी। किसी अर्थव्यवस्था में वृद्धि तभी होगी जब निवेश होगा। देश में जो निवेश होगा, वह पैसा कहां से आएगा। वह पैसा आता है कि घरेलू बचत से। घरेलू बचत में पारिवारिक बचत, निजी क्षेत्र की बचत,और सार्वजनिक क्षेत्र की बचत है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ अभी यह खतरनाक तरीके से निचले स्तर पर आ गया है। खासकर परिवार की बचत क्योंकि लोगों के पास पैसा ही नहीं है। अभी खबर आई है कि आरबीआई दो लाख करोड़ रुपये से अधिक बैंकों को दे रहा है। बैंकों के पास पैसा कैसे घट गया? इसका मतलब है कि जमा राशि, कर्ज के हिसाब से नहीं बढ़ रही है।’’
उल्लेखनीय है कि घरेलू बचत दर वित्त वर्ष 2014-15 में जीडीपी का 32.2 प्रतिशत थी जो 2023-24 में घटकर 30.7 प्रतिशत पर आ गयी। यानी इसमें 1.5 प्रतिशत की कमी आई है। यह बाजार मूल्य पर 2024-25 के जीडीपी का लगभग 4.96 लाख करोड़ रुपये बैठता है।
यह पूछे जाने पर कि क्या बजट में बचत को बढ़ावा देने की जरूरत है, विदेश मंत्री की भी जिम्मेदारी संभाल चुके सिन्हा ने कहा, ‘‘घरेलू बचत में दो चीजें हैं। एक है ब्याज दर। मान लीजिए लघु बचत में ब्याज दर बढ़ा दें तो अर्थव्यवस्था में लेन-देन की लागत बढ़ेगी। वहां पर संतुलन बनाने की जरूरत है। वह आकर्षक भी हो और बोझ भी नहीं लगे।’’
उन्होंने कहा,‘‘ दूसरा, जब लोगों के पास पैसा है लेकिन उन्हें भविष्य के लिए अंदेशा है तो वे बैंक में नहीं रखेंगे,शेयर बाजार में पैसा नहीं लगाएंगे। सोना, चांदी और अन्य धातु में लगाएंगे। आप उस समय बचत खुलकर करते हैं जब भविष्य के लिए सुरक्षित हों। ऐसे में लोगों के बीच भरोसा बढ़ाना भी जरूरी है।’’
यह पूछे जाने पर कि नई कर व्यवस्था में कोई छूट नहीं है, ऐसे में बचत पर फर्क पड़ता है, उन्होंने कहा, ‘‘अगर लोगों को छूट मिलेगी तो वे बचत के लिए प्रोत्साहित होंगे। घरेलू बचत को बढ़ावा देने के लिए आयकर में छूट मिलनी चाहिए।’’
रोजगार को लेकर बजट में उम्मीद के बारे में सिन्हा ने कहा, ‘‘ रोजगार को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। ग्रामीण शिक्षित कम शिक्षित, नहीं पढ़े-लिखे और पढ़े-लिखे लोगों में भी रोजगार की समस्या है। पहली बार आईआईटी छात्रों में भी नौकरियां की समस्या देखी गयी। इसका मतलब है कि शिक्षित वर्ग में भी रोजगार के अवसर कम हुए हैं। इसीलिए सभी क्षेत्रों पर ध्यान देना होगा। शहरी, ग्रामीण दोनों बेरोजगारी पर ध्यान देना होगा। अलग-अलग योजनाएं बनानी होगी। अगर वृद्धि होगी तो रोजगार बढ़ेगा।’’
उन्होंने यह भी कहा, ‘‘मैं यह उम्मीद करता हूं कि यह बजट ईमानदारी का होगा। आंकड़ों को लेकर छेडछाड़ नहीं होगा… बजट अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर पेश करेगा…।’’
भाषा रमण निहारिका
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