नयी दिल्ली, 12 मई (भाषा) उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने मंगलवार को कहा कि भारतीय विनिर्माताओं को वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए को गुणवत्ता के प्रति जागरूक रहते हुए इसे अपने संचालन के केंद्र रखना होगा।
खरे ने उद्योग मंडल पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) द्वारा यहां आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन को ऑनलाइन संबोधित करते हुए कहा कि आज भारत के पास ‘मेक इन इंडिया’ दृष्टिकोण के तहत एक भरोसेमंद वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरने का ऐतिहासिक अवसर है।
उन्होंने कहा, ‘‘आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धात्मकता अब केवल लागत या पैमाने से ही निर्धारित नहीं होती, बल्कि गुणवत्ता, सुरक्षा, विश्वसनीयता और मानकों का अनुपालन महत्वपूर्ण होता जा रहा है।’’
खरे ने कहा कि गुणवत्ता नियंत्रण आदेश भारत के विनिर्माण परिवेश को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण कदम बन गया है। उन्होंने इन्हें केवल नियामकीय उपाय नहीं बल्कि गुणवत्तापूर्ण विनिर्माण को बढ़ावा देने वाला उत्प्रेरक बताया।
उन्होंने कहा कि गुणवत्ता नियंत्रण आदेश उपभोक्ता सुरक्षा में योगदान करते हैं, उत्पाद की विश्वसनीयता में सुधार करते हैं, निष्पक्ष व्यापार गतिविधियों को सुगम बनाते हैं और घटिया वस्तुओं के आयात को रोकने में मदद करते हैं। इससे भारत का समग्र गुणवत्ता परिवेश मजबूत होता है और आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना में योगदान मिलता है।
खरे ने कहा कि आज तक 723 उत्पादों को अनिवार्य भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) प्रमाणन के लिए अधिसूचित किया जा चुका है।
सम्मेलन के दौरान, पीएचडीसीआई विनिर्माण समिति के प्रमुख और हरियाणा वायर्स के प्रबंध निदेशक सुनील मंगला ने अलग से बातचीत में पीटीआई-भाषा से कहा कि निर्यातकों को अलग-अलग देशों से अनुमोदन प्राप्त करने के बोझ से बचाने के लिए सरकार को बीआईएस मानकों को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाने की दिशा में काम करना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘अमेरिका में आमतौर पर कई उत्पादों के लिए यूएल या एनआरटीएल (राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त परीक्षण प्रयोगशाला) जैसे प्रमाणन की आवश्यकता होती है। यूरोप सीई (यूरोपीय अनुरूपता) और संबंधित मानकों का उपयोग करता है, जबकि जापान जेआईएस (जापानी औद्योगिक मानक) का उपयोग करता है। आज इन बाजारों में बीआईएस प्रमाणन स्वतः ही यूएल, सीई या जेआईएस का स्थान नहीं ले सकता।’’
उन्होंने कहा, ‘‘वर्तमान में, निर्यातकों को इन बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए हम सरकार से बीआईएस को वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त मानक बनाने का आग्रह कर रहे हैं।’’
मंगला ने उत्पाद परीक्षण में लगने वाली लंबी समयसीमा को भी एक बड़ी बाधा बताया और कहा कि प्रमाणन में वर्तमान में तीन से चार महीने लगते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘इसका समाधान परीक्षण प्रयोगशालाओं का तेजी से विस्तार करना या परीक्षण के लिए विश्वसनीय निजी प्रयोगशालाओं का मूल्यांकन और प्रमाणन करना है।’’
खरे ने इस मांग पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए अपने कार्यालय को 15 दिन के भीतर प्रमाणन योग्य निजी प्रयोगशालाओं की सूची तैयार करने का निर्देश दिया।
भाषा
रमण अजय
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