पश्चिम बंगाल की राजनीति को लेकर आज भी कई हलकों में यह भ्रम बना हुआ है कि यहाँ भाजपा की सत्ता-यात्रा चुनाव आयोग, केंद्रीय बलों या तकनीकी सुविधाओं की वजह से आसान हुई। मानो लोकतंत्र की सबसे भीषण परीक्षाओं में से एक को कहीं किसी अदृश्य हाथ ने “सरल” बना दिया हो। यह दावा न केवल तथ्यहीन है, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं के बलिदान के प्रति अन्याय भी, जिनके खून और आँसू ने इस यात्रा का वास्तविक मार्ग प्रशस्त किया।
संघर्ष का भूगोल: सैकड़ों लाशें, हजारों उजड़े घर
2011 से 2025 का कालखंड बंगाल की धरती के लिए संघर्ष, दमन और राजनीतिक प्रताड़ना की काली स्याही से लिखा गया। कई भाजपा कार्यकर्ता बमों से उड़ाए गए, कई पेड़ों से लटके मिले, अनेक की लाशें नदियों में बहती पाई गईं। नंदीग्राम, बीरभूम, कूचबिहार, बशीरहाट—किस इलाके का नाम लें जहाँ चुनावी “बदले” ने गाँव न उजाड़े हों? हजारों परिवार केवल इसलिए विस्थापित हुए क्योंकि उन्होंने एक राजनीतिक विकल्प चुनने की हिम्मत की थी।
महिला मोर्चा तक को नहीं छोड़ा गया—यौन-हिंसा को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया ताकि भय का स्थायी वातावरण बने। 2021 की चुनाव-उत्तर हिंसा ने स्थिति को इतना भयावह बना दिया कि हाईकोर्ट को सीबीआई जांच का आदेश देना पड़ा।यह सब किसी चुनावी आँकड़े या चार्ट में दर्ज नहीं होता, लेकिन यह बंगाल के संघर्ष की जीवंत व्याख्या है।
मगर मनोबल नहीं टूटा—यही बंगाल भाजपा की असली शक्ति है
इस आंदोलन की आत्मा को समझने के लिए कई बार केवल एक दृश्य ही पर्याप्त है— सुबह बूथ अध्यक्ष की लाश पेड़ से लटकी मिले, और उसी शाम उसका बेटा उसी बूथ पर एजेंट बनकर बैठा दिखे। या वह महिला, जिसका घर हिंसा में राख हो गया, अगले ही चुनाव में उसी झंडे के साथ गली-गली घूमती दिखाई दे। यह मनोबल किसी मशीन, किसी आयोग या किसी “सेटिंग” से नहीं आता। यह उस साहस का परिणाम है जो दशकों से थोपे गए भय को चुनौती देता है— पहले 34 वर्ष के वाम शासन की अदृश्य सलाखें, फिर 15 वर्ष का
सत्तात्मक आतंक— परन्तु जनता ने हार नहीं मानी- मुकदमे, जेल, नौकरी छिनना, सामाजिक बहिष्कार—सबकुछ सहकर भी भाजपा कार्यकर्ताओं ने संघर्ष की लौ को बुझने नहीं दिया।
पंद्रह वर्षों की चढ़ाई — आँकड़ों में दर्ज तप राजनीतिक यात्रा संयोग से नहीं बनती, लम्बी तपस्या से गढ़ी जाती है—
* 2011: 1 विधायक
* 2016: 3 विधायक
* 2019 लोकसभा: 18 सांसद — पूरे देश का ध्यान आकर्षित करने वाला क्षण
* 2021 विधानसभा: 77 विधायक — मुख्य विपक्ष
* 2024 लोकसभा: 12 सीटें
* 2026 विधानसभा: सत्ता
यह केवल बढ़ते हुए ग्राफ नहीं हैं।
इनमें उन माँओं की अस्थियाँ हैं जो बेटों की तेरहवीं कर लौटीं और कहा—“लड़ाई जारी रहेगी।”
इनमें उन बस्तियों की राख है जहाँ लोग वर्षों राहत शिविरों में रहे, पर झुके नहीं।
गलतफहमियों का अंत होना चाहिए
जब कोई कहता है कि “भाजपा को चुनाव आयोग ने जिता दिया”, तो यह कथन उन सभी बलिदानी कार्यकर्ताओं के संघर्ष का अपमान बन जाता है जिन्होंने पार्टी का झंडा ओढ़कर इस धरती में प्राण त्याग दिए। उन जले घरों की राख आज भी गवाही देती है। उन महिलाओं की आँखों में आज भी अग्नि जल रही है जिन्होंने सब कुछ खो दिया पर संगठन नहीं छोड़ा। पश्चिम बंगाल में सत्ता किसी मशीन का उपहार नहीं थी। यह एक-एक वोट के पीछे एक-एक बलिदान की परिणति है। यह विजय दिल्ली से नहीं, बंगाल की गलियों, गाँवों और बलिदानों से निकली है।
उदारता और हृदय-दौर्बल्य : शास्त्र और इतिहास का सन्दर्भ
राजनीति के इस परिप्रेक्ष्य में एक शाश्वत प्रश्न उठता है—क्या हमेशा उदारता ही गुण है? क्या अत्याचार के सामने शांति ही समाधान है?
भारत के शास्त्र और इतिहास इन प्रश्नों पर अत्यंत स्पष्ट हैं।
गीता—दौर्बल्य त्याग कर धर्म के लिए खड़े होने का आदेश – Bhagavad Gita के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं— “क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप”— जो दुर्बलता धर्म से विमुख करे, उसे त्यागो और खड़े होओ। इसका अर्थ स्पष्ट है— अहिंसा तब तक सद्गुण है, जब तक वह धर्म और न्याय की रक्षा कर सके।
महाभारत—अति-उदारता के दुष्परिणाम
Mahabharata के अनेक प्रसंग बताते हैं— भीष्म की प्रतिज्ञा-पालन की अति, युधिष्ठिर की अत्यधिक क्षमा— दोनों ने अधर्म को बढ़ावा दिया। उदारता जब नीति-विवेक से कट जाए, वह विनाश का कारण बनती है।
स्वराज्य और धर्मरक्षा के योद्धाओं का स्पष्ट संदेश
* Maharana Pratap — समर्पण शांति नहीं, आत्मसमर्पण होता। उनके लिए शस्त्र धारण धर्म-रक्षा का अनिवार्य साधन था।
* Shivaji Maharaj — महिलाओं के प्रति पूर्ण अहिंसा, पर अत्याचारियों के प्रति कठोर निर्णय—यह विवेकपूर्ण उदारता थी।
* Guru Gobind Singh — “जब धर्म पर संकट आये, शस्त्र धारण ही धर्म है।”
* Swami Vivekananda — “दया का स्थान न्याय ले”, अन्याय को पोषित करने वाली उदारता दोष है।
* Mahatma Gandhi — “कायरता और हिंसा में चयन करना पड़े, तो मैं हिंसा चुनूँगा”—अर्थात अहिंसा विवेक है, कायरता नहीं।
वैश्विक इतिहास के सबक
* Neville Chamberlain की तुष्टिकरण नीति ने Adolf Hitler को और विस्तार दिया—और द्वितीय विश्वयुद्ध का मार्ग खोला।
* League of Nations नैतिकता दिखाती रही, कार्यवाही न कर सकी—परिणाम: युद्ध।
* Byzantine Empire — अत्यधिक समझौतों ने साम्राज्य को कमजोर कर दिया।
* Tibet — विवेकहीन शांति-नीति ने पूरे तिब्बत को खो दिया।
पश्चिम बंगाल का कमल किसी प्रशासनिक सहूलियत का परिणाम नहीं— यह बलिदानों, साहस, चोटों और लोकतंत्र-रक्षा की तपस्या का प्रस्फुटन है। और शास्त्रों से लेकर वैश्विक इतिहास तक एक ही सत्य प्रतिध्वनित होता है— जहाँ न्याय और धर्म पर आघात हो, वहाँ उदारता नहीं—संकल्प की आवश्यकता होती है। यह विजय संकल्प की है, साहस की है, और उन अमर कार्यकर्ताओं की है जिन्होंने लोकतंत्र को बचाने के लिए अपने प्राण तक दे दिये।
– कैलाशचंद्र
( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
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