(टी. जी. बिजू)
कोच्चि, तीन अगस्त (भाषा) केरल में हर साल जून में मानसून के दस्तक देते ही राज्य के रबर उत्पादक इलाकों का नजारा बदल जाता है।
यह बदलाव फूलों की वजह से नहीं, बल्कि रम्बूटान के पेड़ों पर लगने वाले लाल रंग के फलों से होता है। कुछ साल पहले तक जिन पेड़ों से रबर (लेटेक्स) निकाला जाता था, उनकी जगह अब रम्बूटान के पेड़ों पर लाल रंग के गुच्छों में फल लटकते दिखाई देते हैं।
दशकों तक रबर ने केरल के मध्यवर्ती जिलों और अन्य उत्पादक क्षेत्रों की आर्थिक गतिविधियों को आकार दिया। हालांकि रबर के दाम गिरने, श्रमिकों की कमी और मौसम में बदलाव के कारण छोटे किसान आय के नए स्रोत तलाशने को मजबूर हुए हैं। अब उनमें से अधिकतर लोगों को लगता है कि उन्हें इसका विकल्प मिल गया है।
एक समय केवल घरों के बगीचों में दिखाई देने वाला विदेशी फल रम्बूटान अब केरल की व्यावसायिक फसलों में शामिल हो गया है।
यह बदलाव विशेष रूप से पथनमथिट्टा, कोट्टायम, एर्नाकुलम, त्रिशूर, वायनाड और इडुक्की जैसे रबर उत्पादक जिलों में दिखाई दे रहा है जहां युवा किसान जमीन पट्टे पर लेकर रम्बूटान के बाग लगा रहे हैं।
रम्बूटान-मैंगोस्टीन किसान संगठन के अनुसार, यह फसल अब केरल में लगभग 25,000 एकड़ क्षेत्र में फैली हुई है। इस मौसम में इससे करीब एक लाख टन उत्पादन होने और लगभग 1,000 करोड़ रुपये का कारोबार होने का अनुमान है।
किसानों का साथ ही यह भी कहना है कि इस उद्योग का भविष्य केवल खेती पर निर्भर नहीं है।
उनका मानना है कि सरकार को दक्षिण भारत से बाहर बाजार विकसित करने, ‘कोल्ड-चेन’ ढांचे को मजबूत करने, देश तथा विदेश में केरल के रम्बूटान का प्रचार करने, मूल्य संवर्धित उत्पादों को बढ़ावा देने, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को समर्थन देने तथा हर फसल के मौसम में सोशल मीडिया पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाओं पर रोक लगाने में मदद करनी चाहिए।
कूथट्टुकुलम के निकट तिरुमाराडी स्थित रम्बूटान-मैंगोस्टीन किसान संगठन के अध्यक्ष एम. सी. साजू का कहना है कि रम्बूटान केरल के किसानों के लिए ऐसा अवसर है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा, ‘‘ मैंने दो अलग-अलग तरीकों से रम्बूटान की खेती की है। एक हेक्टेयर में 20×20 फुट की दूरी पर सघन खेती की है, जबकि दूसरे एक हेक्टेयर में 40×40 फुट की दूरी पर पौधे लगाए हैं। दोनों तरीके सफल हैं और दोनों तरह से इसकी खेती की जा सकती है।’’
साजू ने बताया कि यह फसल तीसरे वर्ष से फल देना शुरू कर देती है और कई दशकों तक उत्पादन देती रहती है।
उन्होंने कहा, ‘‘ तीसरे वर्ष से उत्पादन शुरू हो जाता है। तीसरे वर्ष यदि एक पेड़ से लगभग 30 किलोग्राम फल मिलता है तो चौथे वर्ष यह लगभग 50 किलोग्राम और पांचवें वर्ष करीब 70 किलोग्राम हो जाता है। समय के साथ उत्पादन लगातार बढ़ता है और एक पेड़ से 300 किलोग्राम तक फल मिल सकता है।’’
साजू का कहना है कि छोटे किसानों के लिए इसकी आर्थिक संभावनाएं काफी आकर्षक हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘ यदि कीमत 100 रुपये प्रति किलोग्राम भी रहे तो 300 किलोग्राम उत्पादन से एक पेड़ से सालाना 30,000 रुपये की आय हो सकती है। यही इस फसल की सबसे बड़ी खासियत है।’’
साजू ने बताया कि रम्बूटान से ऐसे कई फायदे हैं जो अब पारंपरिक फसलों में नहीं रहे।
उन्होंने कहा, ‘‘ एक हेक्टेयर में दूसरी फसलों से आमतौर पर अधिकतम 2.5 से तीन लाख रुपये तक की आय होती है। रबर का भाव 300 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाए तब भी उससे इतनी आय नहीं होती।’’
एर्नाकुलम जिले के एक अन्य किसान ने कहा कि रम्बूटान ने उनके खेत की अर्थव्यवस्था बदल दी है।
उन्होंने कहा, ‘‘ इस मौसम में मुझे एक हेक्टेयर रम्बूटान से 14 लाख रुपये की आय हुई। मेरा कुल खर्च केवल लगभग 60,000 रुपये रहा। यह चौथा वर्ष है जब मुझे इस फसल से उत्पादन मिल रहा है।’’
किसानों का कहना है कि रम्बूटान की खेती में रबर की तुलना में काफी कम श्रम की जरूरत होती है। रबर की खेती श्रमिकों की कमी और मौसम में बदलाव के कारण कठिन हो गई है, जबकि बाग तैयार हो जाने के बाद रम्बूटान में श्रम की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम रहती है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती फसल कटाई के बाद आती है।
वहीं किसानों को विशेष रूप से खाड़ी देशों में निर्यात की भी अच्छी संभावनाएं दिख रही हैं, क्योंकि वहां की भीषण गर्मियों के दौरान ही केरल में रम्बूटान की फसल तैयार होती है।
इन चुनौतियों पर चर्चा करने और फसल की भविष्य की रणनीति तय करने के लिए किसान, व्यापारी, स्टार्टअप और कृषि विशेषज्ञ आठ अगस्त को कूथट्टुकुलम में आयोजित होने वाले रम्बूटान कॉन्क्लेव-2026 में भाग लेंगे।
भाषा निहारिका
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