रेपो दर स्थिर रखने का आरबीआई का फैसला संतुलित कदम, आर्थिक वृद्धि को मिलेगी गति: विशेषज्ञ
रेपो दर स्थिर रखने का आरबीआई का फैसला संतुलित कदम, आर्थिक वृद्धि को मिलेगी गति: विशेषज्ञ
नयी दिल्ली, पांच जून (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखने का निर्णय संतुलित कदम है और यह कारोबार धारणा को मजबूत बनाने के साथ आर्थिक वृद्धि को गति देगा। उद्योग एवं विशेषज्ञों ने शुक्रवार को यह कहा।
उद्योग मंडल एसोचैम के महासचिव सौरभ सान्याल ने कहा कि रेपो दर को यथावत रखने का यह संतुलित एवं सोच-समझकर उठाया गया कदम कारोबारी धारणा को मजबूती देगा और आर्थिक वृद्धि को गति प्रदान करेगा।
उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि मजबूत बने रहने की उम्मीद है। यह निर्णय मुद्रास्फीति को लक्षित दायरे में रखते हुए आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के बीच संतुलन को दर्शाता है।
सान्याल ने कहा कि बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं, विशेषकर ऊर्जा कीमतों, व्यापार प्रवाह और मुद्रास्फीति पर संभावित प्रभावों के बीच आरबीआई ने नीतिगत लचीलापन बनाए रखा है। यह कदम घरेलू अर्थव्यवस्था में विश्वास को दर्शाता है और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप समय के हिसाब से कदम उठाने की गुंजाइश भी बनाए रखता है।
आरबीआई ने वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितता के बीच महंगाई बढ़ने के जोखिम को देखते हुए शुक्रवार को नीतिगत दर रेपो को उम्मीद के मुताबिक 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा। इसके साथ ही तटस्थ रुख को भी कायम रखा गया है।
भारतीय युवा शक्ति ट्रस्ट की संस्थापक एवं प्रबंध न्यासी लक्ष्मी वेंकटरमन वेंकटेशन ने कहा कि आरबीआई का यह फैसला मजबूत आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ कच्चे तेल की कीमतों, खाद्य मुद्रास्फीति, रुपये में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति शृंखला बाधाओं और वैश्विक अनिश्चितताओं से जुड़े जोखिमों के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
वेंकटेशन ने कहा कि प्रमुख ब्याज दर में स्थिरता से सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को पहले से अनुमान लगाने की सुविधा मिलती है, जिससे उन्हें नकदी प्रवाह की बेहतर योजना बनाने, भंडार प्रबंधन, ऋण भुगतान और मूल्य निर्धारण में आसानी होती है।
उन्होंने कहा कि स्थिर कर्ज लागत से उद्यमियों को विस्तार, नियुक्ति और प्रौद्योगिकी निवेश जैसे निर्णय अधिक आत्मविश्वास के साथ लेने में मदद मिलती है। साथ ही, एमएसएमई क्षेत्र के लिए यह स्थिरता दीर्घकालिक अनुबंधों और कार्यशील पूंजी प्रबंधन में भी सहायक है।
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि मुद्रास्फीति अनुमान में बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि आने वाले समय में एक से दो बार ब्याज दरों में वृद्धि हो सकती है।
उन्होंने कहा कि मानसून और वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव भी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। विदेशी पूंजी प्रवाह (एफपीआई), बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) और एनआरआई जमा पर उठाए कदम रुपये को मजबूत करने के लिए एक सकारात्मक पहल हैं।
डेलॉयट इंडिया की अर्थशास्त्री रुमकी मजूमदार ने कहा कि आरबीआई फिलहाल वृद्धि के लिए अनुकूल घरेलू वित्तीय स्थितियों को प्राथमिकता दे रहा है और इसके बजाय नकदी प्रबंधन, विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप और नीति संचार जैसे व्यापक उपकरणों का उपयोग कर सकता है।
एक्सिस सिक्योरिटीज पीएमएस के मुख्य निवेश अधिकारी नवीन कुलकर्णी ने कहा कि यह निर्णय पहले से अपेक्षित था। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, कमजोर मानसून की आशंका और रुपये में गिरावट से मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि ये सभी कारक आगामी नीतिगत बैठकों में दरों के रुख को प्रभावित कर सकते हैं।
कुलकर्णी ने कहा कि बैंकिंग क्षेत्र में ऋण वृद्धि मजबूत बनी हुई है और परिसंपत्ति गुणवत्ता स्थिर है, हालांकि वैश्विक तनाव का असर आने वाले समय में एमएसएमई, वाहन वित्त और तेल-निर्भर कंपनियों जैसे कुछ संवेदनशील क्षेत्रों पर दिखाई दे सकता है।
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र कुमार पंत ने कहा कि आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, ऊंची ऊर्जा कीमतें और कमजोर मानसून जैसी स्थितियां अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
क्रिसिल की अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे ने कहा कि एमपीसी फिलहाल जोखिमों पर नजर रखते हुए वृद्धि और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाए हुए है और चालू वित्त वर्ष दरों को यथावत रख सकती है।
भाषा योगेश रमण
रमण

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