नयी दिल्ली, चार फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को दिल्ली के हयात रीजेंसी होटल के कथित तौर पर कम मूल्यांकन को लेकर एशियन होटल्स (नॉर्थ) प्राइवेट लिमिटेड और दो सार्वजनिक बैंकों के बीच हुए एकबारगी निपटान सौदों की जांच के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई की सहमति जताई।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार, एशियन होटल्स (नॉर्थ) प्राइवेट लिमिटेड, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और पंजाब नेशनल बैंक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।
शीर्ष अदालत गैर-सरकारी संगठन ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर वॉचडॉग’ की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के नवंबर, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें उसकी जनहित याचिका खारिज कर दी गई थी।
उस याचिका में एशियन होटल्स (नॉर्थ) प्राइवेट लिमिटेड और दोनों बैंकों के बीच हुए एकबारगी निपटान (ओटीएस) सौदों की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) से जांच कराने की मांग की गई थी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि एशियन होटल्स (नॉर्थ) प्राइवेट लिमिटेड दिल्ली के हयात रीजेंसी होटल का स्वामित्व रखती है और बैंकों के आर्थिक निर्णयों की व्यावसायिक उपयुक्तता पर न्यायालय ठोस सामग्री पेश न किए जाने तक हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।
याचिकाकर्ता ने 24 जनवरी, 2025 को एशियन होटल्स (नॉर्थ) प्राइवेट लिमिटेड और बैंक ऑफ महाराष्ट्र के बीच हुआ ओटीएस निरस्त करने की भी मांग की थी।
उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि यह एक तरह का ‘बैंक धोखाधड़ी’ का मामला है।
वहीं, एक बैंक की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन वेंकटरमण ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि यह एक वैध व्यावसायिक बैंकिंग लेन-देन है।
उन्होंने कहा, “हमने कर्ज की राशि का 116 प्रतिशत वसूल कर लिया है। अब वह बिना किसी आधार के जांच की मांग कर रहे हैं।”
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत सामान्य रूप से बैंकों की व्यावसायिक विवेकशीलता में हस्तक्षेप नहीं करती, लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक निजी इकाइयां नहीं हैं और उनके पास जो धन है, वह जनता का पैसा है।
उन्होंने कहा, ‘‘यह देखना जरूरी है कि निर्णय जनहित की रक्षा के लिए लिया गया या किसी को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए।’’
पीठ ने कहा कि मामला अदालत के संज्ञान में आने से उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी एवं निष्पक्ष रही हो। अदालत ने बैंकों को कर्ज की पूरी राशि, ओटीएस से जुड़े विवरण और आंतरिक रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।
इससे पहले, उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि यदि बैंकों के खिलाफ ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जाते, तो केवल आरोपों के आधार पर वित्तीय अनियमितता की जांच के आदेश नहीं दिए जा सकते।
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प्रेम अजय
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